|
खान मेरा सबसे बडा ख्वाब
|
|
06 फरवरी 2010, 12:31 hrs IST
|
|
|
फिल्मों के साथ करण जौहर का रिश्ता उस उम्र से है, जब बच्चे तितलियां पकडने के लिए बाग-बगीचों में दौडा करते हैं या पतंगें उडाने के लिए अपने छत की मंुडेरों पर जमा रहते हैं। इस लिहाज से कहा जा सकता है कि सिनेमा करण की रगों में लहू के साथ बह रहा है। शुरूआती दौर में करण ने 'कुछ कुछ होता है' और 'कभी खुशी कभी गम' जैसी फील गुड फिल्में बनाई, जिनमें सिर्फ हीरो-हीरोइन अपने होते थे, बाकी सारा परिवेश परी कथाओं जैसा होता था। करण की नायिकाएं यश चोपडा की फिल्मों की तरह शिफॉन की साडियां पहने नजर आती थीं और नायक 'हर घडी बदल रही है रूप जिंदगी' गाते हुए भी खुद बिलकुल बदला हुआ नजर नहीं आता था। लेकिन वक्त बदला, तो करण का नजरिया भी बदला और इसी का नतीजा है 'माई नेम इज खान', जिसे करण जौहर मार्का फिल्म मानने का दिल नहीं करता। इसकी वजह यह है कि पहली बार करण ने सच्ची घटनाओं पर आधारित एक फिक्शन फिल्म बनाने की कोशिश की है। करण अपनी इस कोशिश में कहां तक कामयाब हुए हैं, इसका खुलासा तो अगले हफ्ते होगा, जब यह फिल्म सिनेमाघरों में पहंुचेगी, पर इस इंटरव्यू में करण 'माई नेम इज खान' से जुडे चंद खास पहलुओं की चर्चा कर रहे हैं। आपकी फिल्म का टाइटल ही कई सवाल खडे करता है....क्या यह आतंकवाद पर आधारित फिल्म है यह फिल्म आतंकवाद के इश्यू पर नहीं है, बल्कि यह एक सीधी-सादी प्रेम कहानी है, जिसमें दो अहम किरदार हैं- रिजवान खान और मंदिरा। रिजवान एक मासूम और सच्चा इंसान है, जो अपने प्रेम की वजह से एक ऎसे सफर पर निकल पडता है, जिसमें मंजिल बहुत दूर और बहुत मुश्किल नजर आती है। यह फिल्म न तो किसी धर्म पर आधारित है और न ही आतंकवाद से जुडे सवाल उठाती है। फिल्म एक इंसान पर आधारित है। बचपन में रिजवान की मां ने उसे बताया कि दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक वो जो अच्छा काम करते हैं और दूसरे वो जो बुरा काम करते हैं। रिजवान बस सीधी बात को मानता है। वो बहुत ही सीधा है, बातों का वो सीधा मतलब निकालता है, उसे दुनियादारी नहीं आती। चर्चा है कि आपकी इस फिल्म में 9/11 की घटना का भी संदर्भ है दरअसल 9/11 फिल्म का एक बहुत ही छोटा-सा हिस्सा है। कुल मिलाकर फिल्म पांच साल के रिजवान से लेकर उसके मैच्योर होने तक की कहानी है। इसमें मुंबई से लेकर अमरीका तक का सफर दिखाया गया है। जब वो आठ साल का था, तब हुए एक हादसे का उसके ऊपर गहरा असर पडता है। इसी दौरान 9/11 का हादसा भी होता है। लेकिन मेरी फिल्म 9/11 पर नहीं, बल्कि रिजवान नामक किरदार पर है। फिल्म में उसका सफर दिखाया गया है। आपकी पिछली फिल्मों के मुकाबले 'माई नेम इज खान' किस लिहाज से अलग है यह फिल्म तथ्यों पर आधारित फिक्शन है। फिल्म का फॉर्मेट एक एपिक की तरह है, जो हमारे लीड कैरेक्टर रिजवान की जिंदगी को चार से चालीस साल की उम्र तक दिखाता है। फिल्म उन घटनाओं को बताती है, जो उसे सामाजिक और राजनीतिक रूप से झेलनी पडती हैं। फिल्म देखेंगे, तो आप महसूस करेंगे कि काश, असली जिंदगी में भी कोई रिजवान खान होता, जो दुनिया को बहुत हद तक बदल सकता। बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी मिले, इसके अलावा इस फिल्म को लेकर आपकी उम्मीदें क्या हैं हम चाहते हैं कि इस फिल्म के जरिए हमने जो मैसेज देने की कोशिश की है, वह ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। मुहब्बत का जो पैगाम रिजवान की मार्फत हम देना चाहते हैं, उसे भी लोग समझें। मैं जब कच्ची उम्र में था, तब अपने बारे में सोचता था, लेकिन अब मैं दुनिया के बारे में सोचता हूं। मैं चाहता था कि एक ऎसी फिल्म बनाऊं जहां लोगों को लगे कि दुनिया में यह भी हो रहा है। यही वजह है कि मैंने 'माई नेम इज खान' बनाई है। इस फिल्म को बनाने में आपको तीन साल वक्त लगा, यह देरी किस वजह से हुई यह फिल्म मेरे दिल के बहुत करीब है, आप कह सकते हैं कि यह मेरी जिंदगी का सबसे बडा ख्वाब है। इस लिहाज से हम कोई कसर नहीं छोडना चाहते थे। दो साल का वक्त तो हमने रिसर्च में खर्च किया। हमारी फिल्म के हीरो रिजवान को हमने 'एस्पर्जर सिंड्रोम' का शिकार बताया है, तो इस बारे में भी हमें पूरी जानकारी जुटाना था। चर्चा है कि आपने 'माई नेम इज खान' की रिलीज को लेकर कोई खास तैयारी की है फॉक्स सर्चलाइट पिक्चर्स जैसी बडी कंपनी इस फिल्म से जुडी है और इसके सहयोग से हम इस फिल्म को ओवरसीज में कुछ ऎसे सेंटर्स पर भी रिलीज करना चाहते हैं, जहां अब तक हिंदी फिल्मे रिलीज नहीं होतीं। मोरक्को, मिस्र, पोलैंड और जर्मनी के अलावा मिडिल ईस्ट के सेंटर्स पर भी यह फिल्म रिलीज करने की प्लानिंग है। लोग कहते हैं कि करण जौहर और शाहरूख खान अब एक-दूसरे की आदत बनते जा रहे हैं...। दरअसल हमारा जो रिश्ता है, वो फिल्मों से भी बडा है। हम परिवार के स्तर पर एक-दूसरे के नजदीक हैं। शाहरूख का घर मेरा घर है और मेरा घर उनका घर है। हम दोनो का रिश्ता एक अटूट बंधन की तरह है, जिसे जमाने की हवा भी बदल नहीं सकती। जो इमोशन हम परदे पर दिखाते हैं और जिन रिश्तों की बातें हम फिल्मों में करते हैं, वे तमाम आपको हमारी दोस्ती में नजर आएंगे। करण जौहर के सिनेमा को लेकर हमेशा उत्सुकता का माहौल रहता है....इस दबाव को आप कैसे संभालते हैं ऑफकोर्स थोडा प्रेशर तो होता ही है, लेकिन मैं इसे भी एंज्वॉय करता हूं, क्योंकि फिल्म बनाना मेरे लिए एक सफर के समान है। जब मैंने 'कुछ कुछ होता है' बनाई, उस समय मुझे लगा कि इस तरह की फिल्म की डिमांड है। मैं 'डीडीएलजे' में आदित्य चोपडा का सहायक था और मुझे फिल्म मेकिंग से प्यार था। यही कारण है कि उस फिल्म में आपको लगभग सभी फिल्ममेकर्स की झलकियां देखने को मिलती हैं। फिर मुझे लगा कि मां-बाप हमारे जीवन में क्या मायने रखते हैं, इस पर भी फिल्म बनाई जा सकती है, इसलिए मैंने 'कभी खुशी कभी गम' बनाई। फिर मुझे एहसास हुआ कि जिससे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हों, अगर वो दुनिया में न हो, तो कैसा लगेगा तब मैंने 'कल हो ना हो' बनाई। इसी दौरान मेरे पिताजी यह दुनिया छोडकर चले गए। उनकी मौत के बाद दो साल तक मैंने कुछ नहीं किया। मैं रिश्तों को लेकर सोचता रहता था और इसी दौरान मैंने 'कभी अलविदा ना कहना' बनाई। और अब मैं दुनिया के बारे में सोचता हूं, तो मुझे 'माई नेम इज खान' का आइडिया आया। -श्याम माथुर
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|