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फिल्में मालामाल लेखक कंगाल
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07 फरवरी 2010, 10:42 hrs IST
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सलमान खान अभिनीत फिल्म 'वीर' को लेकर गुडगांव के लेखक पवन चौधरी ने आरोप लगाते हुए मुकदमा दायर किया है कि 'वीर' की कहानी का कॉन्सेप्ट उनकी किताब 'ए ट्रिलॉजी ऑफ विजडम' के हिंदी संस्करण से चुराया गया है। चौधरी के इस आरोप ने मुंबइया फिल्म जगत में लेखक और स्क्रिप्ट राइटर्स के दयनीय हालात को सामने ला दिया। यह फिल्मी जगत की कडवी सच्चाई है कि लाखों-करोडों रूपयों में बनने वाली फिल्मों के लेखकों को चंद हजार रूपयों में ही संतोष करना पडता है। कई बार तो फिल्म के बजट की एक फीसदी रकम भी लेखक के हिस्से में नहीं आती।
सत्तर के दशक तक हिंदी साहित्य जगत की कुछ नामचीन हस्तियों ने बॉलीवुड का रूख किया और वहां जगह भी बनाई। उसमें राजिंदर सिंह बेदी, कमलेश्वर, मोहन राकेश, अचला नागर और संतोष आनंद जैसे लोग थे। पैसा तो उस जमाने में भी ज्यादा नहीं मिलता था लेकिन इन लेखकों का सम्मान बहुत था। इसी दौरान सलीम-जावेद की जोडी मुंबइया फिल्मी दुनिया में स्टार लेखक जोडी के तौर पर उभरी, जिसे मुंहमांगे पैसे मिले। कहा जाता है कि उनके दरवाजे पर निर्माताओं की लाइन लगी रहती थी। ये जोडी उन दिनों बडे-बडे स्टार्स से भी ज्यादा ताकतवर हुआ करती थी। लेकिन अजीब इत्तेफाक है कि अस्सी के दशक में जब मसाला फिल्मों की शुरूआत हुई तो अच्छे स्क्रिप्ट राइटर की पूछ खत्म हो गई। सलीम-जावेद की जोडी मतभेद के कारण टूट चुकी थी। लेकिन ये ऎसी फिल्मों का दौर था, जब समानांतर फिल्मों या आर्ट सिनेमा की फिल्मों को छोडकर मुंबइया फिल्में हॉलीवुड फिल्मों की डीवीडी देखकर उनसे जोड घटाकर बनाई जाती थी। सबसे बडा राइटर वो होता था, जो इस 'चौर्यकला' को बखूबी मुंबइया फिल्मों की शक्ल दे दे। इस दौर मेें निर्माता राइटर को डीवीडी और कैसेट्स देकर बढिया स्क्रिप्ट लिख डालने का फरमान सुनाते थे।
इस स्थिति ने सही मायनों में अच्छे और प्रतिभाशाली स्क्रिप्ट राइटर्स और लेखकों को ही नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि बॉलीवुड सिनेमा को विश्व स्तर पर उभरने का मौका नहीं दिया। जाहिर है इन मसाला फिल्मों से दर्शकों को ऊबना तय था। दर्शक जल्द ऊबे भी। कुछेक अपवादों को छोड दिया जाए तो ज्यादातर लेखक बहुत कम मेहनताने पर काम करने को मजबूर हैं। वहीं छोटे-छोटे शहरों से कुछ बेहद प्रतिभाशाली लेखकों ने बॉलीवुड में अपने लिए एक खास मुकाम बनाया है। कुछ लेखक स्टार जैसी स्थिति हासिल कर चुके हैं लेकिन ऎसे लेखक उंगलियों पर गिने जाने लायक हैं। इनमें जयदीप साहनी, अनुराग कश्यप, अब्बास टायरवाला, अंजुम राजबली, इम्तियाज अली जैसे राइटर हैं। इन सभी को अब एक स्क्रिप्ट के लिए पांच लाख से बीस लाख रूपए तक मिल जाते हैं, जबकि बॉलीवुड में एक औसत लेखक को एक फिल्म के लिए 50 हजार से एक लाख रूपए तक मिल पाते हैं। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि एक अच्छी स्क्रिप्ट तैयार होने में छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लगना कोई बडी बात नहीं। इस हिसाब से यह कमाई भी बहुत ज्यादा नहीं। लेकिन आमतौर पर इन स्टार लेखकों का दर्द भी एक जैसा ही है। मुंबई में फिल्म राइटर्स के लिए बडी लडाई लडने वाले अंजुम राजबली कहते हैं कि फिल्म लेखक को लेकर बॉलीवुड कभी गंभीर नहीं रहा। सालों से हिंदी लेखक के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता आया है। 20 करोड बजट की फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने वाले को पांच लाख भी नहीं मिल पाते। हद तो तब हो जाती है जब मोटा बजट लगाकर बनाई जाने वाली फिल्मों में स्क्रिप्ट को एकदम ही अनदेखा कर दिया जाता है।
हॉलीवुड में इसका उलटा होता है। फिल्म बननी शुरू होने से एक-डेढ साल पहले तक स्क्रिप्ट और लोकेशंस फाइनल की जाती हैं। जिस स्क्रिप्ट पर काम शुरू होता है, वो फिर बिल्कुल फिक्स होती है। हॉलीवुड में फिल्म के बजट का पांच से दस फीसदी स्क्रिप्ट पर खर्च होता है। फिल्म के सफल होने पर भी लेखक का हिस्सा तय रहता है। 'ब्लू' (50 करोड), 'चांदनी चौैक टू चाइना' (50 करोड) जैसी मोटी बजट की फिल्मों के पिटने के पीछे अच्छी स्क्रिप्ट का ही अभाव है। वहीं 'वेडनेस डे', 'आमिर', 'देव डी' जैसी छोटी बजट की फिल्मों के हिट होने के पीछे वजह भी मजबूत, कसी हुई और बेहतरीन स्क्रिप्ट और कहानी रही है। इसके बावजूद कई बडे प्रोडक्शन हाउसेज और प्रोडयूसर अब तक स्क्रिप्ट की महत्ता नहीं समझ पाए हैं। 'खोसला का घोंसला', 'चक दे इंडिया', 'राकेट सिंह- सेल्स मैन ऑफ द इयर' जैसी फिल्में लिखने वाले जयदीप साहनी कहते हैं कि अब धीरे-धीरे बेहतर स्क्रिप्ट और अच्छे लेखक के महत्व को समझा जा रहा है। लेकिन अब भी लेखकों को हॉलीवुड की किसी हिट फिल्म की डीवीडी पकडा कर बंपर स्क्रिप्ट तैयार करने के लिए देना जारी है।
बॉलीवुड में सफल स्क्रिप्ट राइटर्स में शुमार होने वाले कमलेश पांडे, जिन्होंने 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्म लिखी, कहते हैं,'कई बार फिल्म निर्माताओं ने मुझे अनुचित करार करने के लिए बाध्य किया, लेकिन क्या करता, क्योंकि उस समय मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। कभी-कभी ऎसा भी हुआ कि मैने स्क्रिप्ट बेची और फिल्म पर अपना नाम गायब पाया।' अंजुम राजबली कहते हैं कि कुछ समय पहले हॉलीवुड राइटर्स एसोसिएशन ने हडताल करके वहां के प्रोडयूसर्स के होश उडा दिए थे। लेकिन बॉलीवुड में फिल्म राइटर्स एसोसिएशन के 8000 से ज्यादा सदस्य होने के बावजूद अब तक वह स्थिति नहीं बन पाई है। हालांकि इधर एसोसिएशन ने नए मॉडल कांट्रैक्ट से प्रोड्यूसर्स को अवगत करा दिया है। चेतन भगत, पवन चौधरी जैसे कई मामलों ने एसोसिएशन के सदस्यों को अपने अधिकारों के प्रति ज्यादा सचेष्ट रहने की प्रेरणा भी दी है। राजबली को उम्मीद है कि आने वाले समय में निसंदेह स्थितियां बदलेंगी।
-संजय श्रीवास्तव-
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