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शनिवार, 13 मार्च, 2010
5 इडियट्स
17 जनवरी 2010, 10:23 hrs IST
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चर्चित फिल्म 'थ्री इडियट्स' उन युवाओं की कहानी है, जिन्होंने परंपराओं को तोडते हुए अपने दिल की बात सुनी और कामयाब भी हुए। रियल लाइफ में ऎसे युवाओं की कमी नहीं है, जिन्होंने आईआईएम, आईआईटी जैसे ख्यातनाम संस्थानों से डिग्रियां लेने के बाद लाखों रूपयों के ऑफर ठुकराए और वही किया जो इनके दिल ने कहा। इन ग्रेट 'इडियट्स' को हमारा सलाम।

आईआईएम छोड
बेची सब्जी
कौशलेंद्र, (बिहार)
आईआईएम, अहमदाबाद में 2007 बैच के टॉॅपर कौशलेंद्र के पिता का सपना था कि उनके बेटे का नाम देश के दिग्गज प्रबंधकों में गिना जाए, लेकिन बेटा चाहता था कि वह गरीब किसानों का हमदम बने और अपने पिछडे राज्य बिहार की समृद्घि के लिए कुछ काम करे। बेटे ने पिता का सपना कॉलेज टॉप करके कुछ हद तक पूरा कर दिया। लेकिन अब कौशलेंद्र के सपनों की बारी थी। बकौल कौशलेंद्र,'मैनेजमेंट की पढाई पूरी करने के बाद मैं एक सपना लेकर बिहार पहुंचा था। सपना था सब्जियों में 'ब्रांड बिहार' का नाम दुनियाभर में चमके। मेरा परिवार खुद नालंदा जिले में इंकागरसराय गांव में खेती करता है। आसपास के किसानों की गरीबी को देखकर मेरे मन में शुरूआत से ही पीडा थी। इसलिए मैंने मैनेजमेंट पढाई के वक्त ही फैसला कर लिया था कि लाखों की नौकरी के बजाय अपने इर्द-गिर्द के माहौल को समृद्घ बनाऊंगा। अपने दिल की बात पूरी करने का ख्वाब लिए मैं पटना की गलियों में सब्जी का ठेला लिए घूमता। लोग मुझे देखकर हंसते और कहते, 'देखो, दुनिया का सबसे बडा इडियट, जो मैनेजमेंट टॉपर होने के बाद भी गली-गली सब्जियां बेच रहा है।' लेकिन मुझे पता था कि मुझे क्या करना है। शुरूआत में पटना के कांकेरबाग की तीन किमी की परिधि में सब्जियों की मुफ्त होम डिलीवरी शुरू की। गरीब किसानों से उचित दाम पर सब्जियां लेता और उन्हें बेचता। काम चल निकला। आज मेरे पास सौ से ज्यादा एयरकंडीशनर पुशकार्ट हैं। 5000 किसान और 600 सब्जी विक्रेता मेरे साथ जुडे हुए हैं। आने वाले सालों में यह कारोबार 100 करोड रूपए के पार होगा। मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने दिल की बात पूरी करने में कामयाब रहा।'

इंजीनियरिंग छोड बना
'धरतीपुत्र'
आर. माधवन, (चेन्नई)
मुझे बचपन से ही पेड-पौधे लगाने और सब्जियां उगाने में रूचि थी, लेकिन परिवार की मर्जी के कारण आईआईटी की राह चुननी पडी। यहां से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री पाने के बाद मैंने ओएनजीसी में नौकरी पाई लेकिन मेरा शौक हमेशा साथ रहा। मैं समुद्र से तेल निकालने के लिए ऑयल रिंग पर काम करता था। यहां 14 दिन लगातार काम करने पर अगले 14 दिन का सवैतनिक अवकाश मिलता है। मैं यह काम कई साल तक करता रहा और छुट्टी के 14 दिन में खेती-किसानी के नए प्रयोग सीखकर उन्हें आजमाता। नौकरी के दौरान ही एक दिन मैंने अपने पिताजी से कहा कि मैं नौकरी छोड खेती करना चाहता हूं। इस पर वे काफी नाराज हो गए। लेकिन मुझे मेरे दिल की बात किसी भी कीमत पर पूरी करनी थी। मैंने अपनी बचत के पैसे से चेन्नई के निकट चेंगलपट्टू गांव में छह एकड जमीन खरीदी। 1989 में जब मैंने खेती शुरू की, तो गांव में पैंट-शर्ट पहनने वाला मैं पहला किसान था। लोग मुझे अचरज भरी निगाहों से देखते। इस बीच, 1996 का वर्ष मेरे जीवन का 'टर्निग पॉइंट' साबित हुआ। इस साल मैंने इजराइल की यात्रा की और 'बूंद-बूंद सिंचाई' (ड्रिप इरिगेशन) और जल-प्रबंधन की तकनीक सीखी और उसे अपने खेतों में लागू किया। नतीजा आश्चर्यजनक रहा। मेरे जीवन में एक और स्वर्णिम क्षण तब आया जब पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम मेरा खेत देखने आए। कलाम से तय 15 मिनट की मेरी मुलाकात दो घंटे में बदल गई और उनक ी जुबान से निकला- 'भारत को कम से कम दस लाख माधवन की आवश्यकता है।' आज मुझे खुशी है कि मैंने मेरी दिल की आवाज सुनी और कामयाब हुआ।

कैम्ब्रिज छोड संवारी
गरीब बच्चों की तकदीर
आनंद कुमार, (बिहार)
बिहार में पटना जिले के चांदपुर बेला गांव में रहने वाले छत्तीस वर्षीय आनंद कुमार न केवल अपने गांव के बल्कि अपने राज्य  के हीरो हैं। पिता की ख्वाहिश थी कि बेटा आईएएस अफसर बने, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। बचपन में ही आनंद के सिर से पिता का साया उठ गया। विधवा मां के साथ पूरे परिवार की जिम्मेदारी आनंद पर आ गई। ऎसे माहौल में ही उन्होंने गणित विषय में कॉलेज टॉप कर स्नातक किया। गणित में पीएच.डी करने के बाद उनका कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में बतौर फैकल्टी चयन हो गया। लेकिन उनका दिल कुछ और ही कह रहा था, उन्होंने केम्ब्रिज न जाकर अपने गांव के गरीब बच्चों का करियर संवारना ज्यादा मुनासिब समझा। लोगों ने उनके इस फैसले को गलत भी बताया लेकिन आनंद को खुद पर पूरा यकीन था। आनंद के मुताबिक 'मैंने गरीब लेकिन प्रतिभावान छात्रों के लिए 2002 में 'सुपर-30' नाम से एक योजना शुरू की। इसमें मैं देशभर के तीस गरीब छात्रों का चयन कर उन्हें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) की तैयारी करवाता हूं। यह हमारी मेहनत का ही नतीजा है कि 2006 और 07 में 28-28 और 2008 में सभी 30 छात्रों ने आईआईटी में प्रवेश पाया।' इस योजना में छात्रों पर होने वाले खर्च को निकालने के लिए उन्होंने 'आनंद रामानुजम स्कूल ऑफ मैथेमैटिक्स' शुरू किया, जिसमें सामान्य छात्र पढाई कर सकते हैं। इससे प्राप्त पैसे को 'सुपर-30' के छात्रों को बेहतरीन सुविधा देने में लगाते हैं। भारत के डिस्कवरी, जापान के एनएचके और कतर के अल जजीरा समेत कई टीवी चैनल्स ने उन पर कई घंटों की डाक्यूमेंट्री बनाई है। आनंद कहते हैं,'मुझे आज खुशी है कि मैंने अपने दिल की बात मानी और ईश्वर ने मेरा साथ दिया।'

मोटी तनख्वाह छोड की
दिल की बात
ई.शरत बाबू, (चेन्नई)
मेरा जन्म चेन्नई की माडिपक्कम झुग्गी बस्ती में हुआ। घर में भाई-बहिनों सहित हम पांच लोग थे और कमाने वाली अकेली हमारी मां। वह इडली बेचकर हमारा पेट पालती थी। मैं मां की मदद करता और अपनी पढाई भी। मुझमें जब करियर के प्रति समझ विकसित हुई, तभी यह तय कर लिया था कि मुझे गरीबों की मदद करनी है और मैं उन्हें रोजगार के अवसर दूंगा। यही कारण था कि आईआईएम में बडी-बडी कंपनियों की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी के ऑफर ठुकराकर मैं अपनी कंपनी की आधारशिला रखने की सोच रहा था। अगस्त 2006 में मैंने अपने सपनों को आकार देते हुए कुछ दोस्तों की मदद से 'फूडकिंग कैटरिंग सर्विस प्राइवेट लिमिटेड' की स्थापना की। मैंने कंपनी की पहली यूनिट आईआईएम अहमदाबाद में शुरू की और अक्टूबर 2006 में दूसरी, लेकिन खास फायदा नहीं हुआ। इस पर मैंने और कडी मेहनत शुरू कर दी और तडके तीन बजे तक काम करने लगा। जब तीसरी यूनिट शुरू की, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरी सारी यूनिट्स छोटे कैफेटेरिया हैं। मुझे वॉल्यूम में और बडा काम चाहिए। कुछ प्रयासों के बाद आखिर मार्च 2007 में मुझे राजस्थान में बिरला इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस (बिट्स) पिलानी में फूडकिंग की यूनिट खोलने का ऑफर मिला। हमने यहां काम शुरू किया और अच्छा फायदा मिला। इससे मेरा जोश और बढ गया। पहले साल में मुझे 27 लाख रूपए का घाटा हुआ था, लेकिन अब इससे दुगुने  का मासिक टर्नओवर है और कंपनी का सालाना टर्नओवर करोडों में है। वैसे, झुग्गी झोंपडी से फूडकिंग का सीईओ बनने तक के सफर में मैंने यह पाया है कि इंसान खुद पर विश्वास रखे तो कोई काम मुश्किल नहीं है।

विदेश जाने के बजाए थामा
विक्षिप्तों का हाथ
एन. कृष्णन, (मदुरै)
वर्ष 2002 में जब मैंने फाइव स्टार होटल में चीफ शेफ की नौकरी छोड विक्षिप्तों को भोजन कराने की अपनी इच्छा घरवालों के सामने जाहिर की तो मानो घर में भूचाल आ गया। पिताजी बिल्कुल नहीं चाहते थे कि उनका बेटा पागलों के पीछे खाना लेकर घूमता फिरे। मेरा चयन विशेष प्रशिक्षण के लिए स्विट्जरलैंड जाने वाले शेफ के दल में हो गया था। शुरूआत में अपने घर के किचन में खाना बनाता और बाइक पर ले जाकर आसपास के 30-40 विक्षिप्तों को खिलाता था। खाने के लिए पैसे की जरूरत मैं अपनी बचत के रूपए से पूरी करता था। लोगों तक खाना पहुंचाने की सहूलियत के लिए वर्ष 2003 में एक दानदाता ने हमें वैन भेंट की। इसके बाद तो मेरा काम और भी बढ गया। मैंने अपने साथ दो रसोइए और रख लिए और ज्यादा दूरी तय कर अघिक लोगों तक खाना पहुंचाने लगे। फिलहाल हम रोजाना करीब 170 किलोमीटर गाडी दौडाकर 400 लोगों को तीन वक्त का भोजन देते हैं। हम केवल उन्हीं लोगों को खाना खिलाते हैं, जो न तो खुद मांग सकते हैं और न ही उन्हें अपनी भूख का एहसास होता है। खर्च होने वाला कुछ पैसा दानदाताओं से मिलता है, तो कुछ  पुरस्कारों की राशि और मेरी बचत पर आने वाले ब्याज से होता है। भले ही आज मैं कोई बडा बिजनेसमैन या शेफ नहीं बन पाया लेकिन अपने दिल का काम करके जो सुकून मिलता है उसके आगे दौलत-शोहरत कुछ भी नहीं है।

हेतप्रकाश व्यास/देवकीनंदन व्यास -
Comments
bahot ho accha jannne ko mila ...
23 जनवरी 2010, 07:42 hrs IST , by mahendra kumar from Australi , Melbourne
they are not 5 idiots,they are 5 super heros ...
22 जनवरी 2010, 18:06 hrs IST , by vishal singh from Hanumangarh jn.
Aise insaan kam hi paida hote hain. They are the real hero. Mera inko aur Rajasthanpatrika ko hardik badhaai. ...
20 जनवरी 2010, 10:21 hrs IST , by Shailendra Sharma from Kota
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