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दागदार होती खाकी
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31 जनवरी 2010, 10:55 hrs IST
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देश की पुलिस इन दिनों मुठभेड यानी एनकाउंटर को लेकर खासी चर्चा में है। ऎसी मुठभेडें, जिसमें पुलिस के आला अफसरों ने बिना किसी विघिक तरीका अपनाए इंसानी जिंदगियां छीनीं। फर्जी मुठभेडों के चलते पुलिस की छवि दिन-ब-दिन दागदार होती जा रही है।
एनकाउंटर स्पेशलिस्ट यानी मुठभेड विशेषज्ञ कहलाने वाले मुंबई के एक पुलिस इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा को हाल ही में दो कांस्टेबल के साथ वर्सोवा पुलिस ने गिरफ्तार किया। उनकी गिरफ्तारी गैंगस्टर लखन भैया के साथ हुई फर्जी मुडभेड की जांच के लिए मुंबई हाईकोर्ट द्वारा गठित जांच समिति स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम ने की। इसके साथ ही फर्जी मुठभेड को लेकर कुछ समय से शांत चर्चाओं का तूफान फिर उठ खडा हुआ है। हालांकि पुलिस और अपराघियों की फर्जी मुठभेड के मामले में बहुत कम लोग ही संदेह के घेरे में लिए जा सके हैं, लेकिन पुलिस की बदनामी के लिए ये नाम कम नहीं हैं। वर्ष 1990 से 2000 के मध्य मुंबई में मुठभेड के दौरान हत्या साधारण बात थी। इस समय मुठभेडें अंडरवल्र्ड में आंतरिक उठापटक तथा लूट-खसोट करने वाले गिरोह की सक्रियता के कारण हुई। इसके खिलाफ आवाज तो तब भी उठी, पर आतंक के सफाए की दलील उस पर भारी पड गई। एनकाउंटर्स का सच सामने लाने का किसी ने प्रयास भी किया तो शायद इसलिए सफलता नहीं मिली कि वह दौर इस नई व्यवस्था का शैशव काल था। इस बात में हालांकि कोई संशय नहीं कि कानून तोडने का हक किसी को भी नहीं दिया जा सकता, चाहे वह पुलिस ही क्यों न हो। और तो और आला अघिकारियों के लिए तो नैतिक आचरण ज्यादा जरूरी है, लेकिन मुठभेड के दौरान मरने वाले अपराघियों के मामले में इसकी अनदेखी शुरू से ही हुई है।
26 नवंबर 2005 की अलसुबह सोहराबुद्दीन नामक व्यक्ति को अहमदाबाद के बाहरी क्षेत्र में पुलिस ने मार गिराया। इसके बाद घोषणा की गई कि मारे गए व्यक्ति का संबंध लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठन से था और वो मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मारने की फिराक में था। इस घटना के एक साल बाद पिंटू शर्मा नामक एक युवक पुलिस की गोली का शिकार हो गया। शुरूआत में पुलिस इसे छोटा-मोटा अपराधी बता रही थी, मुठभेड के पश्चात उसे आतंककारियों से संबंधित बताया गया। इसी तरह 2007 में एक 18 वर्षीय लडका अब्दुल रहमान श्रीनगर में सुरक्षा बलों द्वारा ऎसी ही मुठभेड में मार दिया गया। बाद में उसे जैश-ए-मोहम्मद का सदस्य घोषित किया गया।
ये सभी हत्याएं सुर्खियां बनीं और इनमें समानता यह थी कि तीनों ही पुलिस मुठभेड में मारे गए। इस बारे में मानवाघिकार समर्थकों की भौंहें तनती, तब तक उच्चतम न्यायालय ने गुजरात में 2003 से 2006 के बीच सोहराबुद्दीन तथा 21 अन्य एनकाउंटर्स की जांच सीबीआई को सौंप दी। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय सोहराबुद्दीन के भाई रूबाबुद्दीन द्वारा दायर की गई उस याचिका पर आया, जिसमें सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौशर बी और उसके मित्र तुलसी प्रजापति की फर्जी मुठभेड में हत्या में लिप्त पुलिस के अधिकारियों के संबंध में जांच का निवेदन किया गया था। देश की सबसे बडी अदालत के इस आदेश के साथ ही यह बात और मजबूत हो गई कि पुलिस एनकाउंटर में कहीं न कहीं कुछ गडबडी जरूर है। वैसे, फर्जी तथा मनमर्जी की मुठभेड का मामला चिंताजनक जरूर हैं, लेकिन आश्चर्यजनक नहीं।
फर्जी एनकाउंटर के मामलों में यह भी सामने आया कि कई पुलिस अघिकारी अपराघियों के इशारों पर काम करते हैं। अंडरवल्र्ड डॉन छोटा राजन ने कुछ समय पहले खुलासा किया था कि मुंबई पुलिस का एक हाई प्रोफाइल एनकाउंटर स्पेशलिस्ट उसके लिए काम करता था तथा कुछ साल पहले छोटा राजन के कहने पर उसने अंधेरी में मोहन शेडगे तथा सांता क्रूज में राजू पिल्लई नाम के दो लोगों को मारने की सुपारी ली थी। अपराघियों की पार्टियों में नाचने-झूमने और उनसे गलबहियां करने वाले पुलिस अघिकारियों के चर्चे आज भी अखबारों की सुर्खियां बन रहे हैं। धन के प्रलोभन में आकर इंसानी जिंदगी का दांव लगाने वाले पुलिस अघिकारी इस महकमे में नैतिक रूप से गिरावट का भी उदाहरण हैं। पुलिस विभाग में इस गिरावट का आलम यह है कि हरियाणा के पूर्व पुलिस महानिदेशक छेडछाड के मामले में दोषी हैं, वहीं अन्य कई आईजी हत्या तथा तस्करी के अभियुक्त हैं। तेलगी स्टाम्प घोटाले में मुंबई पुलिस के कई आला कमिश्नर और आईजी भी इसी तरह लिप्त थे। अन्य राज्यों में भी पुलिस के नाम ऎसे ही कारनामे हैं।
जून 2006 में दिल्ली पुलिस के सब इंसपेक्टर के खिलाफ एक महिला को जेल में बंद करने की धमकी देकर बलात्कार करने तथा रिश्वत मांगने का मामला प्रकाश में आया था, तो सीबीएसई पेपर लीक मामले में सीबीआई ने दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच के एक जांच अधिकारी को अन्य दो लोगों के साथ पकडा। यह जांच अधिकारी अभिभावकों से रूपए लेते हुए रंगे हाथों पकडा गया था। इसी तरह उत्तर प्रदेश पुलिस का एक कांस्टेबल एक महिला को 3 हजार रूपए देकर अपने तीन रिश्तेदारों को सामूहिक बलात्कार के मामले में फंसाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। महाराष्ट्र पुलिस के 6 पुलिसकर्मी पांच अपराधियों के साथ मुंबर्ई तथा पडोसी ठाणे जिले में अपनी ड्यूटी समय में आपराधिक गतिविधियां करते धरे गए। वहीं एक कांस्टेबल 26 अप्रेल 2005 को मरीन ड्राइव पुलिस चौकी में एक नाबालिग लडकी से बलात्कार का दोषी पाया गया। ऎसी घटनाएं यह एहसास करानेे के लिए काफी हैं कि चारित्रिक एवं नैतिक पतन के दौर में फर्जी मुठभेड के आधार पर तमगे हासिल करने वाले पुलिस अघिकारियों की भी कमी नहीं होगी।
आंकडों का सच 26 मार्च 2007 में जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वहां आतंकवाद के कारण 42 हजार 147 लोगों में से 20 हजार 647 आतंकवादी तथा 5 हजार 24 जवान जनवरी 1990 से फरवरी 2007 के बीच मारे गए। जबकि इसी अवघि में 33 हजार 885 लोगों में से 12 हजार 124 जवान तथा 21659 नागरिक घायल हुए। ये आंकडे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि बाहरी ताकतों के साथ हमें घर में भी खतरा झेलना पड रहा है।
क्या हो सकते हैं उपाय कुछ समय पहले डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस के सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि पुलिस को एक साफ-सुथरी छवि रखने तथा लोगों का विश्वास जीतने का प्रयास करना चाहिए, लेकिन इसके लिए जरूरी यह भी है कि पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए नियम बनाए जाए। अपने कत्तüव्य के प्रति लापरवाह लोगों को हाथोंहाथ घर भेज दिया जाए, वरना अभी तो सरकारी कर्मचारियों में यह भावना घर कर गई है कि चाहे वे कुछ करें या न करें, उनकी नौकरी सुरक्षित है।
एनकाउंटर मतलब... पुलिस एनकाउंटर का मतलब किसी आरोपी या अपराधी की जान लेना नहीं है। भारतीय संविधान और पुलिस मैन्युअल दोनों ही इसकी इजाजत नहीं देते। कायदों के मुताबिक किसी अपराधी को जिंदा पकडने के लिए कमर के नीचे ही गोली मारी जा सकती है। फर्जी एनकाउंटर में आमतौर पर एनकाउंटर करने वाले अघिकारी वाहवाही लूटने या तमगा हासिल करने के लिए किसी बेगुनाह की जान ले लेते हैं। इसके अलावा एनकाउंटर करने वाले अधिकारियों पर लगातार ये आरोप भी लगते रहे हैं कि वे एक खास गिरोह की सूचना पर दूसरे गिरोह के सदस्यों को निशाना बनाते हैं। कानून बनाने की हिमायत भारतीय संविधान में अपराघियों के अघिकार तय करने वाले अनुच्छेद 20 में एनकाउंटर जैसी गतिविधियों की अनुमति नहीं है, लेकिन कानून व्यवस्था के जानकारों का मानना है कि इसके बगैर दुर्दात आतंकवादियों या आपराधिक गिरोहों से निपटना मुश्किल हो जाता है। ऎसे में अब एनकाउंटर के लिए विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाने की भी हिमायत की जा रही है। इसके तहत पर्याप्त साक्ष्य होने पर अदालत से 'सरेंडर कम एनकाउंटर' वारंट जारी करने का प्रावधान बनाने की पैरवी की जा रही है। अगर यह प्रावधान बनता है तो अपराधी को एक माह में आत्मसमर्पण करना होगा अन्यथा पुलिस को उसे मुठभेड में मारने का अधिकार होगा। इस मुद्दे पर हालांकि संसद में कोई चर्चा नहीं हुई है।
एनकाउंटर एक्सपर्ट का सच
दया नायक 87 से ज्यादा एनकाउंटर कर चुके दया पर अंडरवल्र्ड माफिया से साठगांठ करने का आरोप लगता रहा। दया का वेतन प्रतिमाह 12 हजार रूपए था, लेकिन उन्होंने दुबई में एक होटल और पत्नी के नाम स्विट्जरलैंड में फ्लैट खरीद लिया। दुबई का होटल पार्टनरशिप में है और दया भी इसमें मालिक हैं।
प्रफुल्ल भोंसले 60 से ज्यादा अपराघियों को एनकाउंटर में मार गिराने वाले प्रफुल्ल को ख्वाजा युनूस की हत्या के मामले में वर्ष 2004 में गिरफ्तार किया गया।
प्रदीप शर्मा एनकाउंटर करने पर वाहवाही लूटने वाले मुंबई पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट प्रदीप शर्मा भी फर्जी एनकाउंटर के मामले में पिछले दिनों फंस गए। उन्हें 11 नवंबर 2006 को विलेपार्ले के रूईया पार्क में छोटा राजन गैंग से जुडे रामनारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया को फर्जी एनकाउंटर में मारने का दोषी पाया है।
असलम मोमिन प्रदीप शर्मा की टीम के सदस्य असलम मोमिन को भी अंडरवल्र्ड के साथ निकट संबंधों के चलते 2005 में नौकरी से बर्खास्त किया जा चुका है।
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