Mahasamar

प्रच्छन्न : अर्थ
Friday, 01 Mar 2013 9:55:12 hrs IST

और उसने मन ही मन, इस कथा का निर्माण कर, स्वयं को अपनी विजय का विश्वास दिला, प्रायोपवेशन का संकल्प त्याग दिया।...' 'इस प्रकार तो यह भी हो सकता है विदुर! कि अपनी उस अर्द्धचेतना की अवस्था में दुर्योधन के मन ने सचमुच ही कोई माया रची हो, और उसे इस प्रकार का कोई भ्रम हुआ हो।' कुंती बोली, 'जब इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं, तो मनुष्य को इस संसार के यथार्थ का भान नहीं रहता, उसकी मरणासन्न चेतना जाने किन-किन काल्पनिक लोकों की यात्रा करती रहती है।...'

'मुझे तो लगता है कि उसने निद्रा में कोई स्वप्न देखा होगा।' पारंसवी बोली, 'मनुष्य प्राय: अपनी सुषुप्त इच्छाओं को अपने स्वप्नों में सजीव रूप में देखता है।' 'तो क्या निद्रा भंग होने पर दुर्योधन स्वप्न और यथार्थ में भेद नहीं कर सका?' विदुर मुस्करा रहे थे।
'ईश्वर जाने, यह भेद वह कर नहीं सका अथवा करना नहीं चाहता था।' पारंसवी ने उत्तर दिया, 'जब प्रायोपवेशन छोड़ने के लिए उसे कोई बहाना चाहिए ही था, तो वह यह भेद क्यों करता।'

विदुर ने कोई उत्तर नहीं दिया, वे आत्मलीन से बैठे सोचते रहे।
'क्या सोच रहे हो विदुर?' कुंती ने पूछा।
'मैं यह सोच रहा हूं कि यदि यह कथा दुर्योधन की नहीं, किसी और की गढ़ी हुई है, तो उसका अर्थ क्या है?' 'इसका अर्थ वही है, जो दुर्योधन प्रचारित करना चाहता है।' पारंसवी ने तत्काल कहा, 'कोई अन्य अर्थ होता, तो दुर्योधन उसे प्रचारित ही क्यों करता।' 'ठीक है।' विदुर बोले, 'किंतु यह भी तो संभव है कि दुर्योधन जो अर्थ समझ कर उस कथा को प्रचारित कर रहा है, कथाकार का वास्तविक अर्थ वह न हो।'

 विदुर जैसे नए उत्साह से बोले, 'अब देखो! इस कथा में कहा जा रहा है कि दुर्योधन का पक्ष सृष्टि की सात्विक शक्तियों का नहीं, तामसिक शक्तियों का है। उसकी सहायता करने वालों को आसुरी और दैत्य शक्तियों से प्रभावित बताया जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह है कि कहा जा रहा है कि अपने व्यक्तित्व के तामसिक अंशों के कारण पितृव्य भीष्म, आचार्य द्रोण तथा कृपाचार्य, पांडवों से प्रेम नहीं करते... और कर्ण के विषय में क्या कहा जा रहा है? कर्ण में भौमासुर की आत्मा है और वह इस समय संसार में वर्तमान, सबसे उत्कृष्ट सात्विक शक्ति—श्रीकृष्ण—के घोरतम शत्रुओं में से एक की प्रेतात्मा के प्रभाव में है। वह धर्म का शत्रु है, अधर्म का सहायक है।... क्या तुम्हें नहीं लगता भाभी! कि कथाकार ने अपने मन में उपस्थित कर्ण के प्रति घोरतम घृणा को शब्दों में प्रकट कर दिया है? यह कथा कर्ण के प्रति धिक्कार और तिरस्कार है।

 

क्रमश:  नरेन्द्र कोहली

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