प्रच्छन्न : कुंती
Saturday, 02 Mar 2013 11:17:48 hrs IST
Saturday, 02 Mar 2013 11:17:48 hrs IST
यह कर्ण के चरित्र तथा कृत्यों का जन सामान्य द्वारा किया गया मूल्यांकन है... दुर्योधन से मिल कर जो कुछ वह कर रहा है, उसके प्रति अपनी वितृष्णा प्रकट करने के लिए लोक मानस ने इस रूप में कर्ण के चरित्र को यह दर्पण दिखाया है।...'
कुंती के मन पर एक अनाम-सा अवसाद घिर आया, 'शायद तुम ठीक कह रहे हो विदुर!'
इस चर्चा में कुंती का और मन नहीं लगा।... ऎसा क्यों है कि कर्ण अपनी भूल समझ नहीं पा रहा? क्यों वह पतन के गर्त में गिरता जा रहा है? क्यों वह पांडवों से घृणा करता है? क्यों वह कृष्णा का विरोधी है? वह उस दुर्योधन से कैसे प्रेम कर सकता है, जिसमें प्रेम करने योग्य कुछ भी नहीं है?
कुंती को जैसे रात भर नींद नहीं आई। जो थोड़ी देर वह सोई भी, उसे लगता रहा कि वह सो नहीं रही, कठिन श्रम का कोई बहुत जटिल काम कर रही है। एक अनन्त यात्रा, अनवरत यात्रा...। वह यात्रा भी बड़ी विचित्र थी। उसके पास न कोई अश्व था, न कोई रथ; किंतु वह निरंतर गतिशील थी। वह समझ नहीं पाई कि जब न उसके पास कोई वाहन था और न ही वह चल रही थी, तो वह गतिशील कैसे थी। उसे जैसे इच्छागति का कोई वरदान मिल गया था। उसका मन जहां, जिस ओर जाना चाहता था, वह उसी ओर प्रवाहित हो जाती थी, जैसे मनुष्य का शरीर न हो, पवन का कोई झकोरा हो।...
वह उन स्थानों पर घूम रही थी, जिन्हें वह पहचानती भी नहीं थी। वहां वह पहले कभी नहीं गई थी। फिर भी वह वहां इस प्रकार आ-जा रही थी, जैसे उस सारे क्षेत्र का उसे पूरा ज्ञान हो। उसके साथ मार्गदर्शक कोई नहीं था; किंतु फिर भी वह बिना किसी असुविधा के अपना मार्ग खोज लेती थी। और फिर कुंती ने देखा कि वह हिमालय के किसी बहुत ऊंचे श्ृंग पर पहुंच गई है। स्थान बहुत ही पवित्र है, बहुत सात्विक। वहां पहुंचकर जैसे मनुष्य के मन का सारा मल कहीं तिरोहित हो जाता है। उसके मन में कोई कलुष रह ही नहीं पाता। कोई कामना नहीं, कोई वासना नहीं। मन भी जैसे पारदर्शी धवल हिम का ही एक अंग हो जाता है।... उसी स्थान का एक हिमखंड सहसा पिघलने लगा। वह जल पहले तो कुछ दूर तक एक ही धारा के रूप में बहता रहा; किंतु फिर एक शिलाखंड से टकराकर वह अनेक धाराओं में बंट गया।...
क्रमश: नरेन्द्र कोहली
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