प्रच्छन्न : धारा
Monday, 04 Mar 2013 9:56:50 hrs IST
Monday, 04 Mar 2013 9:56:50 hrs IST
कुंती ने उन्हें गिना। वह धारा अब छह खंडों में बंट गई थी, फिर भी बड़ी शांति से प्रसन्नतापूर्वक बहती जा रही थी।... और फिर वह हिमालय क्षेत्र समाप्त हो गया। अब समतल भूमि आ गई थी। सामने मिट्टी भी थी, मल भी था। अब मन में उस पवित्रता का भान नहीं होता था। जल की धारा के वहां पहुंचते ही जैसे वह मिट्टी उसमें घुलने को तत्पर हो उठी।... जल में से चीत्कार उठा, '...मां! हमें बचाओ। हमारी रक्षा करो मां। हमें मलिन होने से बचाओ।...'
कुंती को बहुत आश्चर्य हुआ... वे धाराएं उसे मां कह कर पुकार रही थीं। वह उनकी मां कैसे थी?... पर नहीं! वह शायद उनकी मां ही थी।... उसके मन में उन धाराओं के लिए वात्सल्य का ही भाव उपजा था... वह उन धाराओं के मध्य चली गई। उसने उन्हें दुलराया और कहा, 'डरो मत मेरे पुत्रो! जो मिट्टी पर चला ही नहीं, उसकी सात्विकता कोई अर्थ नहीं रखती। तुम लोग नि:शंक होकर इस धूल-धूसरित धरती पर अपनी यात्रा करो, फिर भी स्वयं को मलिन होने से बचाए रहो, तो ही तुम्हारी सात्विकता और पवित्रता का कोई महत्व होगा।...'
धाराएं शांत हो गई। वे अपने मार्ग पर चलती रहीं; और कुंती ने देखा कि उनका जल वैसा का वैसा ही स्वच्छ है। गंगा जल जैसा। मिट्टी उनमें घुल नहीं रही है। धाराओं के नीचे ही बैठी हुई है। जल अलिप्त भाव से बहता जा रहा है और मिट्टी उसमें घुलने का साहस ही नहीं कर पा रही है।... और सहसा उनमें से एक धारा ने अपना मार्ग बदल लिया। वह किसी और ही दिशा में बहने लगी। कुंती के मुख से चीख निकल गई। किंतु उस धारा ने पलटकर भी उसकी ओर नहीं देखा। कुंती उसके पीछे भागी; किंतु धारा का वेग, उसकी गति से कहीं अधिक था। वह दौड़ कर उसके मार्ग में खड़ी न हो सकी। धारा उससे बहुत दूर निकल गई थी।... कुंती रूक गई... मनुष्य जल के समान नहीं बह सकता।... उसने पुकारकर कहा, 'तुम कहीं भी, किसी भी दिशा में प्रवाहित हो पुत्र; किंतु स्वयं को मलिन मत करना।'
धारा ने एक प्रबल अट्टहास किया, और कुंती ने देखा कि उस धारा का जल गंदला होने लगा था। उसमें गंदे पानी के कई नाले आकर मिल गए थे। उस जल में से दुर्गध उठने लगी थी।...
कुंती ने दुख भरे स्वर में उसे पुकारा, 'यह तुमने क्या किया पुत्र?'
'मैं ऎसे ही प्रसन्न हूं मां! तुम मेरी चिंता मत करो।'
'कोई इस मलिनता में प्रसन्न कैसे रह सकता है?' कुंती ने दुखी होकर पूछा।
'मैं ऎसे ही प्रसन्न रह सकता हूं मां!' धारा ने अट्टहास किया... और कुंती ने देखा कि उस धारा ने कर्ण का रूप ग्रहण कर लिया है।...
कुंती का स्वप्न ही नहीं टूटा, उसकी नींद भी टूट गई थी...
क्रमश: नरेन्द्र कोहली
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