Mahasamar

प्रच्छन्न : कुंती
Tuesday, 05 Mar 2013 10:47:50 hrs IST

वह उठ कर बैठ गई...यह तुमने क्या किया कर्ण?.. कुंती अपने पर्यक पर अंधेरे में चुपचाप बैठी रही। वह जैसे अवसाद के सागर में डूबी जा रही थी। वह समझ रही थी कि यह उचित नहीं हो रहा है। किंतु उपाय ही क्या था? वह कर्ण को समझा ही तो सकती थी। पर जिन गुरूओं के पास उसने शिक्षा पाई है, क्या उन्होंने उसे उचित-अनुचित का बोध नहीं दिया?... अवश्य दिया होगा। वह तो परशुराम सरीखे गुरू के पास भी रह आया है। तो वह गंगा जल और गंदे नाले के जल का अंतर क्यों नहीं समझता। लोग अपने उस कुटीर को भी स्वच्छ रखना चाहते हैं, जिसमें वे रहते हैं; और यह अपने सारे जीवन को ही मलिन करता जा रहा है।... कुंती को लग रहा था कि जैसे उसके अपने मन का कोई अंश मलिन और तन का कोई अंग गलित हो गया है।...
कुंती उठ खड़ी हुई।... अभी ब्रह्म मुहूर्त में विलंब था। उसने अंधेरे में ही मुंह हाथ धोकर स्वयं को स्वच्छ किया और आकर मंदिर में बैठ गई। उसने आंखें मूंद लीं। किसी मंत्र का उच्चारण नहीं किया, कोई प्रार्थना नहीं की। ध्यान करने का भी कोई प्रयत्न नहीं किया। फिर भी उसे लगा कि उसका एक-एक रोम प्रार्थना कर रहा है, 'हे प्रभु! उसे धर्म के मार्ग पर लाओ। हे प्रभु! मेरे पुत्र की रक्षा करो...।'
सहसा वह स्तब्ध-सी रह गई।... उसके मन में कोई कह रहा था, 'कुंती! क्या वह तेरा ही पुत्र है, मेरा नहीं है। तू तो इस प्रकार प्रार्थना कर रही है, जैसे तेरा सृजन तो प्रभु ने किया है, और उसका सृजन तूने किया है। मेरे और उसके मध्य, तू कैसे आ गई कुंती? उसका भी मुझसे वही संबंध है, जो तेरा मुझसे है।'
कुंती की समझ में नहीं आया कि यह क्या हो गया। क्या उसे अपने पुत्रों की रक्षा की प्रार्थना भी प्रभु से नहीं करनी चाहिए?

क्रमश:  नरेन्द्र कोहली

Tell a Friend
Comments

No comments yet. Be the first to express your views.


Write to Editor
 
Email (Ex: a@a.com)
(Case Sensitive)