प्रच्छन्न : अस्तित्व
Wednesday, 06 Mar 2013 9:15:20 hrs IST
Wednesday, 06 Mar 2013 9:15:20 hrs IST
उसके मन में फिर उसके प्रश्न का उत्तर जन्मा... 'सारी सृष्टि का सृजन मैंने ही किया है। उन सबका संबंध मुझसे एक-सा ही है। तुझे क्या अधिकार है कि तू कुछ लोगों को अपना समझे और कुछ को पराया? तू तो सर्वहित की प्रार्थना कर। धर्म की जय की कामना कर। सबके लिए सुख और शांति मांग।... शरीर संबंधों से कोई अपना और कोई पराया नहीं हो जाता। सब में समान दृष्टि का विकास कर। तेरा कुछ नहीं है। तेरा कोई नहीं है। जो कुछ है, मेरा है। जो कोई है, मेरा है। उन सबके सुख-दुख के लिए मैं उत्तरदायी हूं। आत्मा ने वासनावश शरीर धारण किया है। वासनाओं को भोग कर, उनसे मुक्त हो, वह पुन: अपना स्वरूप ग्रहण करेगी। उस आत्मा को तू पहचान लेगी कुंती! कि उनमें कौन तेरा पुत्र है और कौन तेरा नहीं है?'
'पर प्रभु!' कुंती के मन ने तर्क किया, 'कैसा स्वच्छ रूप था उसका और कैसा मलिन हो गया है।'
'सागर में भी वही जल है, कुंती! जो हिमालय के पवित्र श्ृंगों पर आकाश से बरसता है। वह सरिताओं के रूप में बहुत आतुर होकर सागर से मिलने के लिए दौड़ता है। जब सागर में पहुंचता है, तो पाता है कि वह अमृत-सा मीठा न होकर क्षार से ओतप्रोत हो चुका है। इतना खारा हो चुका है कि मनुष्य उसे पी भी नहीं सकता।...'
'उसका तो अस्तित्व ही व्यर्थ हो गया प्रभु! जीवन नष्ट हो गया।' 'क्यों सागर का जल क्या व्यर्थ हो गया? यहां कुछ भी नष्ट नहीं होता।' कुंती के कानों में जैसे कोई मधुर संगीत गूंजा, 'सूर्य उस जल को तपाएगा। उस ताप से खौल-खौल कर जल, उस मल का त्याग कर, वाष्प बन जाएगा। वह पुन: उतना ही मीठा और उतना ही पवित्र हो जाएगा, जितना वह आरंभ में था।...' 'उसे तपना तो पड़ेगा प्रभु! उतना ताप अंगीकार करना होगा, जितना अग्नि करती है। जल को खौल-खौल कर वाष्प बनना पड़ेगा।'
क्रमश: नरेन्द्र कोहली






