प्रच्छन्न : शकुनि
Thursday, 07 Mar 2013 4:18:02 hrs IST
Thursday, 07 Mar 2013 4:18:02 hrs IST
तपस्या से मन के विकार छूटते हैं, ताप से जल के।' 'पर वह किसके पापों का दंड भोग रहा है? वह ऎसा क्यों है? उसे धर्म का मार्ग क्यों दिखाई नहीं पड़ता?'
'कोई किसी के पापों का फल नहीं भुगतता! प्रत्येक जन अपने लिए उत्तरदायी है। वासना मल संचित करती है, और तपस्या उसे धोकर कलुषमुक्त करती है।...'
सहसा पारंसवी की पग ध्वनि सुनाई दी, 'अरे आज तो अंधेरे में ही ध्यान करने बैठ गईं भाभी!'
'हां! आज नींद जल्दी ही टूट गई।' कुंती ने कहा।
वह उठ कर अपने कक्ष में आ गई; किंतु खौल-खौल कर वाष्प बनते सागर के जल में उसे कर्ण का चीत्कार सुनाई देता ही रहा।...
शकुनि के आने का समाचार सुनकर दुर्योधन को तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई। एक बार तो उसके मन में आया कि वह उससे मिलने से ही मना कर दे। पर फिर उसने अपना विचार बदल दिया। अपमान की तुलना में, मातुल के लिए उपेक्षा ही अधिक कष्टदायी होगी। मना करने के स्थान पर मातुल को प्रतीक्षा कराना ही उपयुक्त होगा।...पर पता नहीं कि प्रतीक्षा से मातुल को कोई कष्ट होगा भी या नहीं। संभव है कि मातुल मदिरा का चषक लेकर अपने आनन्द लोक में डूब जाएं; और यदि किसी दासी को बुलाकर अपने पास बैठा लिया तो उनका तो दिन ही सार्थक हो जाएगा। उन्हें न उपेक्षा का पता लगेगा, न प्रतीक्षा का। दुर्योधन उनको जो यातना देना चाहता है, उसका तो उनको आभास भी नहीं हो पाएगा।
'उनको मेरे एकांत कक्ष में बैठाओ।' उसने सूचना लाने वाली दासी को आदेश दिया, 'किंतु इस समय न तो उनको मदिरा देना; और न ही कोई दासी उनके एकांत को बाधित करने वहां जाए। उन्हें वहां एकांत में बैठ कर विचार करने की सुविधा दो।' 'जो आज्ञा महाराज!' दासी चली गई; किंतु दुर्योधन भी पहले के समान सहज नहीं रह सका। शकुनि के आने मात्र से उसकी सारी विचार तरंगें, अव्यवस्थित हो गई थीं।... जब से वह द्वैतवन से लौट कर आया था, उसकी सारी प्रसन्नता उसका साथ छोड़ गई थी। उसे अपनी पत्नियों की ओर देखते हुए भी डर लगता था। उनके मन में उसके प्रति क्या सम्मान रह गया होगा। सारा हस्तिनापुर जानता था कि चित्रसेन ने उसे पराजित कर, रस्सियों से बांध लिया था; और तब पांडवों ने उसकी रक्षा की थी। उसके शत्रुओं ने उसकी रक्षा की थी। वह जिन्हें अपमानित करने गया था, उन्होंने उसके सम्मान की रक्षा की थी। वह जिन्हें पीडित करने गया था, उन्हें ही मन भर कर आनन्दित कर आया था।...
क्रमश: नरेन्द्र कोहली
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