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शनिवार, 13 मार्च, 2010
कौन चलाएगा पार्टी
01 फरवरी 2010, 10:47 hrs IST
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कितना बचा समाजवाद
भारत में समाजवादी आंदोलन का जो इतिहास है, उसे अमर सिंह दूसरी तरह से दोहरा रहे हैं। समाजवादी आंदोलन में कांग्रेस की जो भितरघात होती रही है, उसका लंबा इतिहास है। आजादी के लिए चल रहे संघष्ाü के दिनों में जेपी, युसूफ मेहर अली, अच्युत पटवर्धन जैसे कुछ युवा समाजवादी नेताओं ने नासिक जेल में बंद रहने के दौरान ही कांग्रेस के अंदर ही एक सोशलिस्ट पार्टी बनाने का फैसला किया था। ये समाजवादी नेता कांग्रेस के युवा नेताओं में गिने जाते थे। जेपी जेल से बाहर आए, तो नासिक जेल में हुए फैसले को जमीन पर उतारने के लिए सम्मेलन बुलाया। आचार्य नरेन्द्र देव ने सम्मेलन की अघ्यक्षता की। मुंबई में जब कांग्रेस का अघिवेशन हुआ, उससे एक दिन पहले कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी। कांग्रेस को समाजवादी बनाने के लिए पार्टी बनाई गई थी।

जब आजादी मिली, तब कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं को लगने लगा कि कांग्रेस को समाजवादी नहीं बनाया जा सकता, तो बाहर हो जाना चाहिए। नासिक में उन्होंने सम्मेलन करके निर्णय किया और कांग्रेस से अलग होकर सोशलिस्ट पार्टी बनी। 1948 से 1955 के दौरान समाजवादी नेताओं के पंडित नेहरू से व्यक्तिगत संबंध थे। अशोक मेहता, जेपी इत्यादि समाजवादी सरदार पटेल के मुकाबले पंडित नेहरू को सोशलिस्ट मानते थे। कहा जाता है कि सरदार पटेल पर अंकुश के लिए पंडित नेहरू समाजवादियों का इस्तेमाल करते थे। कांग्रेस ने हमेशा सत्ता का लालच देकर, भावनात्मक रिश्तों का वास्ता देकर समाजवादियों से लाभ लिया, इसलिए हिन्दुस्तान में समाजवादी आंदोलन कभी एकजुट नहीं रहा। पार्टी बनती थी, बिगडती थी। इस टूट से केवल राम मनोहर लोहिया अविचलित व अडिग थे। लोहिया ने ही पंडित नेहरू के इरादों को ठीक से समझा, लेकिन लोहिया के समर्थक भी कांग्रेस के आकर्षण में पडते रहे हैं। कल्पनाथ राय, सत्यदेव त्रिपाठी, जनार्दन द्विवेदी इत्यादि अनेक नेता समाजवादी आंदोलन में रहे, लेकिन बाद में कांग्रेस में आ गए। वास्तव में समाजवादी आंदोलन को कांग्रेस जब चाहती है, भुना लेती है।

आज जो समाजवादी पार्टी है, उसका उत्तर प्रदेश से बाहर कोई वजूद नहीं है। उत्तर प्रदेश की जो राजनीतिक परिस्थितियां हैं, उसमें अब सपा के सत्ता में आने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। आज अमर सिंह को याद पडा है कि सपा ने उनका गुर्दा खराब करवा दिया, जबकि मेरा मानना है कि अमर सिंह ने सपा का गुर्दा खराब कर दिया। एक गुर्दे वाली पार्टी को गुर्दा विहीन कर दिया। कांग्रेस में जाने के लिए अमर सिंह अपने पूर्व नेता मुलायम सिंह पर लगातार हमले कर रहे हैं। इस हमले से जो राजनीति पैदा होगी, उससे सपा कमजोर होगी। गृह कलह में फंसेगी। समाजवादियों का इतिहास दोहराया जा रहा है।

अमर सिंह समाजवादी विचार के कभी नहीं रहे, लेकिन मुलायम ने उन्हें प्रश्रय दिया। आम जनता की नजर में अमर सिंह कोई जमीनी नेता नहीं हैं, उनकी छवि सत्ता के दलाल वाली रही है। अब जब सत्ता नहीं है, तो दलाली किस बात की होगी, तो वे कांग्रेस के आसपास जाने की कोशिश में हैं। वैसे अमर सिंह का जाना या आना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण तो यह है कि समाजवादी पार्टी आज दिशाहीन, रीढहीन, सिद्धांतहीन हो गई है। सपा की वैचारिक, चारित्रिक धार कुंद हो गई। पुराने विचार पर लौटना मुश्किल है। लगता नहीं है कि मुलायम के नेतृत्व में समाजवादी आंदोलन की धार लौटेगी।

मुलायम बडे नेता रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। एक समय उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चला था। यह भी आरोप है कि उन्होंने खूब पैसा बनाया है और अमर सिंह उस पैसे का प्रबंधन करते थे। बताते हैं कि रामगोपाल यादव ने जब सपा की बैठक में कहा कि अमर सिंह को पार्टी से निकालिए, तब मुलायम ने पूछा कि पार्टी चलाएगा कौन पैसे कहां से आएंगे केवल मुलायम ही नहीं, ज्यादातर लोग यही मानते हैं कि अमर सिंह ही सपा को चला रहे थे। पिछले दस-बारह सालों से अमर सिंह ही पार्टी का प्रशासन-प्रबंधन सम्भाल रहे थे। अब मुलायम की çंचंता बढ जाएगी। अमर साथ थे, तो कई बातें छिपी हुई थीं। कहीं अमर सिंह मुंह न खोल दें, ऎसा अंदेशा मुलायम को शायद हमेशा बना रहेगा। केवल मुलायम ही नहीं, पार्टी के दूसरे नेताओं को भी चिंता सता रही है। सपा अमर सिंह को चुप रहने की हिदायत दे रही है या ब्लैकमेल कर रही है, लेकिन मुझे नहीं लगता कि अमर सिंह के खिलाफ सपा के पास ज्यादा कुछ होगा। अमर सिंह की शैली के बारे में सब जानते हैं। हां, यह झगडा बढेगा, तो जिस नेता के पास राजनीतिक परमाणु बम होगा, वह उसका इस्तेमाल करेगा, भले ही इसमें स्वयं उसका विनाश हो जाए। अमर सिंह की राजनीति से ऎसी आशंकाएं हैं।

परिवारवाद हावी
मुलायम सिंह पर परिवारवादी होने का आरोप हकीकत है। अमर सिंह के सपा से बाहर निकलने के बाद मुलायम ने इसे दुरूस्त करने की कोशिश भी की है। दरअसल, अमर सिंह की सलाह पर ही मुलायम अपने परिवार वालों को तरजीह दे रहे थे। यह एक मोहक षड्यंत्र था, जिसे मुलायम समझ नहीं पाए। पिछले दस-बारह साल से अमर सिंह ही यह तय करते आए थे कि पार्टी के मंच पर कौन नाचेगा और कौन भाषण देगा या कौन क्या करेगा। अब वे यह नहीं कह सकते कि वे सपा के पापों में हिस्सेदार नहीं थे। सच्चे समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने परिवार को आगे बढाने का आरोप पंडित नेहरू पर लगाया था। यह कांग्रेस पर विपक्ष का सबसे बडा आरोप हुआ करता था। लेकिन अब मुलायम से राजनाथ सिंह तक, लगभग सब नेता अपने-अपने परिवार को आगे बढाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस की विपक्षी पार्टियों में भी परिवार हावी हो रहे हैं। कांग्रेस से भिन्न देखने की जो विपक्ष की कोशिश रही है, उसको बहुत नुकसान पहुंचा है। मुलायम का परिवारवाद भी स्वयं उनकी पार्टी के लिए चुनौती साबित होगा।

रामबहादुर राय
लेखक जाने-माने
पत्रकार हैं
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