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सोमवार, 15 मार्च, 2010
पैसे का अपना खेल
02 फरवरी 2010, 10:40 hrs IST
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india vs pakistan
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ग्लोबल दौर में सीमाएं खत्म नहीं हुई हैं। खत्म होने का भ्रम जरूर होता है। आईपीएल के आने से पहले देश के लिए क्रिकेट हो रहा था। आईपीएल ने एक नई निष्ठा बनाने की कोशिश की। देश कोई भी हो, लेकिन भक्ति टीम के प्रति होगी। पैसे से बनी इन टीमों को लेकर इतना आत्मविश्वास था कि राष्ट्रवादी भावनाओं के खत्म होने की बात की जाने लगी और सही अर्थो में खेल भावना की विकास यात्रा की भविष्यवाणी की जाने लगी। लेकिन बीच सफर में अदृश्य-सी दिखतीं सीमाओं के कंटीले तार फिर से दिखने लगे हैं। शिव सेना पाकिस्तानी खिलाडियों के खिलाफ खडी हो गई है, अच्छे खेल और दोस्ती की बात करने वाले शाहरूख और आमिर खान को निशाना बनाया गया। 

पैसे के बाजार में ग्यारह पाकिस्तानी खिलाडियों की नीलामी नहीं हुई। नीलाम न होने की नियति 54 खिलाडियों की तय हो चुकी थी। बताया जा रहा है कि सिर्फ बारह खिलाडी ही नीलाम हो सकते थे। तब भी ये दलील इस सवाल का जवाब नहीं देती कि नीलाम हुए बारह खिलाडियों में एक भी पाकिस्तानी क्यों नहीं था। आईपीएल के ललित मोदी ने पहले क्यों कहा कि हम किसी को जवाब देने के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। राजस्थान रॉयल्स की सह-मालकिन शिल्पा शेट्टी ने भी कहा कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के खिलाडी भी तो नहीं बिके हैं, उनके बारे में हल्ला क्यों नहीं मच रहा है। कायदे से शिल्पा, शाहरूख और प्रिटी जिंटा का जवाब यह होना चाहिए था कि पाकिस्तान खिलाडी हमारी टीम की रणनीति के हिसाब से फिट नहीं बैठ रहे थे। बाद में शाहरूख ने क्यों कहा कि वो चैम्पियन हैं, शानदार हैं, लेकिन कुछ बात तो है, इससे इनकार नहीं कर सकता। क्या शाहरूख को नीलामी के पहले शक हो गया था, अगर हां, तो उन्होंने विरोध क्यों नहीं किया

आईपीएल की यह घटना बताती है कि जो खेल राष्ट्रवादी ढांचे में सरकारें खेला करती हैं, अब बाजार के ढांचे में ग्लोबल भाव लिए टीमें भी खेलने लगी हैं। कितनी अजीब बात है। देश के गृहमंत्री कहते हैं कि यह क्रिकेट के साथ नाइंसाफी है। आईपीएल के कमिशनर ललित मोदी कहते हैं कि हम किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। उन्हें कौन समझाए कि जनाब मोदी, यहां बात क्रिकेट की हो रही है, आपकी नहीं। अगर आपकी यह राय है, तो यह बहुत खतरनाक है। जो आदमी क्रिकेट के प्रति जिम्मेदार नहीं है, उसे खेल को लेकर इस हद तक प्रयोग करने की छूट कैसे दी जा सकती है

याद कीजिए, उस दौर को जब भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मैच को स्टेडियम के भीतर युद्ध के रूप में देखा जाता था। लेकिन दोनों देशों के खिलाडियों ने इस घोर तनाव को कम करने में जो भूमिका अदा की है, उसे किसी कुबेरशाह की किसी ख्वाब भरी रातों के लिए कुर्बान नहीं किया जा सकता। दोनों तरफ के खिलाडियों ने क्या-क्या नहीं बर्दाश्त किया एक गलत शॉट पर उनकी निष्ठा, देशभक्ति संदेह के दायरे में आ जाती थी। फिर भी वे खेलते गए। नतीजा सीमा पर बना तनाव क्रिकेट के मैदान से गायब होने लगा। सरहद के आर-पार लाखों लोग इस रिश्ते को पहचानने लगे, उसकी कद्र करने लगे। आईपीएल की इस कारस्तानी ने पूरी प्रक्रिया को पीछे धकेला है। पाकिस्तान में जो रोष पैदा हुआ है, उसे खत्म होने में समय लगेगा।

आईपीएल एक नया मौका बन कर आया था। क्रिकेट को राष्ट्रीय पहचान के शस्त्रागार से निकाल कर खेल के मैदान पर पहुंचाने के लिए। एक ही टीम में भारत, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया के खिलाडी। फुटबॉल की क्लब टीमों की तरह। लेकिन आईपीएल निष्ठाओं से ऊपर खेल को ले जाने की लडाई हार गया। मोदी को लगता है कि खिलाडी खरीद लिए तो क्रिकेट भी उनकी जेब में आ गया। मुंबई हमलों के बाद आईपीएल टूर्नामेंट दक्षिण अफ्रीका ले जाकर मोदी यह दंभ दिखा चुके हैं। शायद इस बार कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते हों। शाहरूख के बयान के बाद शिव सेना के हंगामे से यही जाहिर होता है। अगर इतना ही डर था, तो वे इस बार आईपीएल महाराष्ट्र के बाहर करा लेते, क्या फर्क पडता सारा मामला सुरक्षित तरीके से पैसे बनाने का लगता है। वर्ना सारी टीमों को पाकिस्तान के खिलाडी कैसे बेकार लगे

इससे पहले कि आप किसी और भंवर जाल में फंस जाएं। पाकिस्तान के खिलाडियों और बोर्ड के बयानों पर भी गौर करना चाहिए। जब यह खबर आई कि डेक्कन चार्जर्स ने रज्जाक को लेने की बात की, तो पाकिस्तानी खिलाडियों का रवैया बदल गया। शाहिद आफरीदी ने कहा कि बीती बातें भूल जानी चाहिए। एक तरफ, पाकिस्तान की आवाम का गुस्सा, तो दूसरी तरफ, खिलाडियों का बदलता रवैया। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने अब किसी भी खिलाडी को अनापत्ति प्रमाणपत्र देने से मना कर दिया है। बोर्ड क्यों रोकना चाहता है, अगर कोई खिलाडी भारत जाने के लिए तैयार है

इन तमाम दावों के बीच कुछ ऎतिहासिक तथ्यों पर भी गौर करना चाहिए। उन्नीसवीं सदी के शुरू में बांबे में कई क्रिकेट टीमें थीं। पारसी क्लब, गौड सारस्वत क्रिकेट क्लब, क्षत्रिय क्लब, गुजराती यूनियन क्रिकेट क्लब, मराठा क्रिकेट क्लब इत्यादि। हिन्दू क्रिकेट क्लबों में जाति के हिसाब से खिलाडी होते थे। ये सारे क्लब तमाम तरह की कम्पनियों से प्रायोजित होते थे। कहीं आईपीएल के क्लब एक किस्म का जातिवादी रवैया तो नहीं अपना रहे हैं पाकिस्तान के खिलाडियों के साथ भेदभाव बरत कर।

1911 में जब कई टीमों के खिलाडियों को मिलाकर राष्ट्रीय टीम बनी, तब पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह कप्तान बने, लेकिन इंग्लैंड पहुंचते ही महाराज पार्टियों में व्यस्त हो गए। एक-दो मैचों में खेलने के बाद उनका ज्यादातर समय लंदन की शाम की रंगीनियों में बीता। ऑल इंडिया टीम चौदह मैचों में से दस हार गई। दो ड्रा रहे और दो में जीत मिली। एकमात्र कामयाबी बालू पलवनकर के नाम रही, जिसने खूब विकेट लिये। एक दलित खिलाडी अपने खेल में लगा था और एक राजा खेल के बहाने राजसी ठाठबाट में। ये क्रिकेट का इतिहास है। पैसे ने क्रिकेट को नहीं बनाया। आईपीएल पैसे की धौंस न दिखाए। ललित मोदी को बालू पलवनकर और महाराजा भूपेंद्र सिंह का इतिहास जरूर देखना चाहिए। ललित मोदी के पास पैसे होंगे, लेकिन इसी दम पर यह कहना कि वो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं हैं, यह क्रिकेट प्रेमियों का अपमान है।

रवीश कुमार
लेखक जाने-माने टीवी एंकर
व एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडिटर हैं
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