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बुधवार, 10 मार्च, 2010
बेलगामक्षेत्रीय दादागिरी
03 फरवरी 2010, 11:17 hrs IST
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यदि कोई पूछे कि महाराष्ट्र में पिछले कुछ दिनों से हो रही घटनाओं का क्या कारण है, तो उसका सीधा-सा उत्तर है 'मराठी वोट'। हिंसा अचानक बढाकर और 'मुंबई मुंबईकरों की' नारे लगाकर दोनों सेनाओं (शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) ने माहौल बिगाड दिया है। दुर्भाग्य से भाजपा और कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति कर रहे हैं। सत्तारू ढ कांग्रेस दोनों सेनाओं पर लगाम नहीं लगा रही है और भाजपा घावों पर मरहम तो लगा रही है, किन्तु वह आर-पार का निर्णय करने से डरती है। संक्षेप में सभी पार्टियों की निगाहें मुंबई महानगर पालिका के 2012 में होने वाले चुनावों और इस साल के अंत में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनावों पर हैं।

शिव सेना पिछले दिनों सम्पन्न विधानसभा चुनावों में मुम्बई का अपना गढ गंवा चुकी है। बाल ठाकरे हतप्रभ हैं कि उनकी पार्टी मुंबई की एक भी सीट नहीं जीत पाई और पिछले चार दशकों से गढ रहे थाणे में भी हार गई। 'मराठी मानुस' की ओर लौटने का इससे बेहतर रास्ता और क्या हो सकता था बुजुर्गो को यह बाल ठाकरे द्वारा पिछली सदी के सातवें दशक में शिव सेना के गठन के दिनों की याद दिलाता है, जब ठाकरे ने 'लुंगी वालों' को मुम्बई से चले जाने के लिए कहा था, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिल सके। टेलीफोन की डायरेक्टरी में से दक्षिण भारतीयों के नाम देखकर प्रकाशित किए गए। वे पिछले चार-पांच दशकों से युवाओं को आकृष्ट करने में सफल रहे हैं। दरअसल बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे अब बहुत बदल गए मुंबई के चरित्र को समझने में विफल रहे हैं। बाला साहब अपने भतीजे के हाथों स्वयं की ही नकल कर आधार खिसकाने को पचा नहीं पा रहे हैं। दोनों सेनाएं बिहारियों, पिछले कुछ सालों से बांग्लादेशियों व मुसलमानों को ही नहीं, क्रिकेटरों और फिल्म अभिनेताओं को भी निशाने पर लेती रही हैं। उन्होंने घृणा और संकुचित व संकीर्ण मनोवृत्ति को बढाया है, जो शेष देश से उलट है। लेकिन मुम्बई पर 26/11 के हमले के समय वे कहां थे राहुल गांधी ने तो कहा भी है कि उत्तर भारतीयों ने ही मुंबई की आतंककारी हमले के समय रक्षा की।
शिव सेना का पिछले सत्रह वर्ष से अधिक से भाजपा के साथ गठबंधन है। हाल ही के विधानसभा चुनावों में शर्मनाक हार के बाद दोनों पार्टियां एक-दूसरे को आंख दिखा रही हैं। भाजपा को लगता है कि एमएएस ने शिव सेना को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन शिव सेना का मानना है कि भाजपा के कार्यकर्ताओं ने उसके प्रत्याशियों के लिए मन से काम नहीं किया, इसलिए उसे अपेक्षा के अनुरूप सीटें नहीं मिलीं। दोनों के बीच अविश्वास धीरे-धीरे बढ रहा है, देर-सवेर इनके रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं।

विगत में शिव सेना तीखे तेवर अपना कर भाजपा को मुश्किलों में डाल चुकी है। दोनों पार्टियों के मतभेद तब उजागर हुए जब शिव सेना ने राष्ट्रपति के चुनाव में भैरोंसिंह शेखावत के बजाय श्रीमती प्रतिभा पाटील को वोट देने का निर्णय किया। भाजपा विदर्भ को अलग राज्य बनाने के पक्ष में है, जबकि शिव सेना इसके खिलाफ है। बाल ठाकरे और उद्धव ठाकरे अपने भडकाऊ बयानों से जनता को विस्मित करने में विश्वास करते हैं। सचिन तेंदुलकर के मुंबई सम्बन्धी बयान के बाद बाल ठाकरे द्वारा की गई टिप्पणी सर्वविदित है। पिछले दिनों बाला साहेब ने मुकेश अंबानी की आलोचना की और शाहरूख खान के आईपीएल सम्बन्धी बयान पर कडी आपत्ति की।

दोनों पार्टियां पिछले कुछ वर्षो में बहुत बदल गई हैं। भाजपा एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल है और शिव सेना क्षेत्रीय दल। भाजपा ने तो अपने मूल मुद्दों को एक ओर कर दिया, लेकिन शिव सेना के लिए ऎसी कोई मजबूरी नहीं है। भाजपा में तो नेतृत्व परिवर्तन हुआ है, लेकिन बाला साहब ठाकरे आज भी शिव सेना के एकछत्र नेता हैं। भाजपा और शिव सेना के आपसी समीकरण में भी धीरे-धीरे परिवर्तन हुए हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी नेतृत्व बदला है। संयोग से संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत, भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी और बाला साहेब तीनों ही महाराष्ट्र के हैं। क्षेत्रीय भावनाओं को उभारना शिव सेना के लिए तो अनुकूल हो सकता है, भाजपा और संघ अपने देशव्यापी संगठन के कारण ऎसा नहीं कर सकते।

संघ प्रमुख मोहन भागवत के हाल के इस बयान से शिव सेना बौखलाई कि भारत सभी भारतीयों का है और मुंबई भी भारत का अंग है। भागवत ने संघ के स्वयंसेवकों को निर्देश दिया कि वे मुम्बई में रह रहे उत्तर भारतीयों की रक्षा के लिए आगे आएं। संघ और भाजपा का उत्तर भारत में व्यापक संगठन है। भाजपा को इसी साल होने वाले बिहार विधानसभा के चुनावों में भी उतरना है, जहां उसकी सहयोगी जनता दल (यू) से तनातनी चल रही है। महाराष्ट्र की राजनीति का असर बिहार पर पडना अवश्यम्भावी है। भाजपा के लिए राजग में जनता दल (एकीकृत) को बनाए रखना आवश्यक है। जमीनी स्तर पर शिव सेना और भाजपा के कार्यकर्ताओं में अब याराना नहीं है, फिर भी वे गठबंधन को बनाए रखने की कोशिश में हैं।

नवीनतम विवाद महाराष्ट्र सरकार के इस फैसले से पैदा हुआ कि टैक्सी के नए परमिट उन्हीं को दिए जाएंगे, जो मराठी लिख, बोल और पढ सकते हैं। इससे कांग्रेस का राजनीतिक खेल सामने आ गया। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने अगले दिन इस निर्णय को उलट दिया, लेकिन उससे जो नुकसान होना था, वह तो हो ही गया। कांग्रेस की भी निगाह महानगर पालिका के चुनावों और वोट बैंक पर है।

ऎसे में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मराठा नेता और राकांपा प्रमुख शरद पवार इस मामले में चुप क्यों हैं केन्द्र और प्रदेश की सरकार को सुस्ती छोडकर मुंबई के हालात सामान्य करने के लिए कदम उठाने चाहिए और यह आश्वस्त करना चाहिए कि भारत के लोग देश के किसी भी भाग में चैन से रह सकते हैं। कोरी बयानबाजी से कुछ नहीं होने वाला। मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण को कमजोर और असहाय दिखने के बजाय दृढता दिखानी चाहिए। यदि वह कार्रवाई करेंगे, तो पूरा देश उनका साथ देगा।

कल्याणी शंकर
लेखिका वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं
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