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घटी सजगता, बढा खतरा
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04 फरवरी 2010, 11:06 hrs IST
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कैंसर का प्रकोप बढता जा रहा है। दुनिया में लगभग हर आठवीं मौत कैंसर की वजह से होने लगी है। एड्स, मलेरिया और तपेदिक से सम्मिलित रूप से जितनी मौतें होती हैं, उससे ज्यादा मौतें अकेले कैंसर की वजह से होने लगी हैं, लेकिन इसके बावजूद लोगों में जागरू कता नहीं आ रही है। कैंसर का इलाज इतना महंगा होता है कि परिवार में अगर किसी एक सदस्य को यह रोग हो जाए, तो परिवार की जमा-पूंजी खत्म हो जाती है, लाखों रूपए स्वाहा हो जाते हैं और ज्यादातर परिवारों में अंतत: जनहानि भी हो जाती है। हर गली, हर मोहल्ले में कैंसर के मरीज मिल जाते हैं, इस बीमारी ने न जाने कितने परिवाराें को तबाह किया है।
खतरनाक होने के बावजूद इसके प्रति उदासीनता बहुत चौंकाती है। आखिर हम क्यों इस बीमारी को सहजता से ले रहे हैं एड्स के खिलाफ प्रचार अभियान पर खूब ध्यान दिया जाता है और लोगों का ध्यान जाता भी है, लेकिन कैंसर के खिलाफ प्रचार अभियान अब उपेक्षित होने लगा है। हमारी मानसिकता में आ रहा यह बदलाव घातक है। एक दौर था, जब कैंसर को लेकर फिल्में भी बनी थीं, जिससे लोगों में जागरूकता आई थी, लेकिन अब वैसी बात नहीं रही। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी स्वीकार किया है कि कैंसर के प्रति जागरूकता घट रही है।
खान-पान की गलत आदतों तथा बदलती जीवन शैली के कारण दुनिया भर में कैंसर का प्रकोप तेजी से बढ रहा है। एक रिपोर्ट से पता चलता है कि हर साल विभिन्न रोगों से मरने वाले 5 करोड 80 लाख लोगों में से 13 प्रतिशत केवल कैंसर का शिकार हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की कैंसर की ताजा हालत पर जारी ताजा रिपोर्ट के अनुसार यदि यही हालात रहे, तो इस साल कैंसर की वजह से 76 लाख लोगों के मरने का अनुमान है। खतरा यों ही बढता रहा, तो 2030 तक मरने वालों की संख्या 1 करोड 70 लाख तक पहुंच जाएगी। वर्ष 2020 तक कैंसर एक आम बीमारी का रूप धारण कर लेगा और इससे पीडित लोगों में 75 प्रतिशत लोग भारत में होंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रदूषण और धूम्रपान के अलावा खानपान की आदतों और जीवनशैली में आ रहे बदलावों की वजह से यह बीमारी बढ रही है। अगर इस बीमारी का शुरूआती दौर में पता लगा लिया जाए, तो 60 से 80 फीसदी मामलों को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन जागरूकता की कमी की वजह से ऎसा नहीं हो पाता। ऎसे में कैंसर की रोकथाम के लिए देश भर में कैंसर के बारे में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है।
कुछ वर्ष पहले कैंसर को खतरनाक बीमारी मानने की आम धारणा थी, लेकिन अब इसका खौफ कम हो गया है। इस वजह से सतर्कता में कमी आई है। लोग पहले की तुलना में ज्यादा लापरवाह हो गए हैं। कैंसर से होने वाली मौतों तथा कैंसर की रोकथाम के प्रति जागरूकता कायम करने के लिए हर साल 4 फरवरी को विश्व कैंसर दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कैंसर के 40 प्रतिशत मामलों में संतुलित भोजन, नियमित व्यायाम, धूम्रपान से परहेज और बेहतर जीवनशैली की मदद से काबू किया जा सकता है। वर्तमान में कैंसर से मरने वालों में ज्यादा तादाद तंबाकू का सेवन करने वालों की है।
आज धूम्रपान व बढते प्रदूषण के कारण कैंसर का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। जो लोग धूम्रपान करते हैं और साथ ही साथ तंग व छोटे-छोटे मकानों में रहते हैं अथवा धुएं, धूल, कपास के रेशों, विभिन्न धातुओं के गर्दो से भरे माहौल में काम करते हैं, उन्हें फेफडे का कैंसर होने की आशंका बहुत अधिक होती है। अनेक अध्ययनों से पता चला है कि विश्व में प्रति मिनट कम से कम छह व्यक्ति धूम्रपान के कारण कैंसरग्रस्त होकर मौत के शिकार बन जाते हैं। फेफडे और ग्रास नली के कैंसर के 80 प्रतिशत मामलों के लिए केवल धूम्रपान जिम्मेदार है। एक अध्ययन के अनुसार मुंह, गले और फेफडे के कैंसर के हर 10 रोगियों में से नौ रोगी वे होते हैं, जो जर्दा, तंबाकू सेवन और धूम्रपान के आदी होते हैं। मूत्राशय, गुर्दे, अग्नाशय, पेट, गर्भाशय और भोजन की नली के कैंसर का भी तंबाकू सेवन से सीधा संबंध है। मल या मूत्र की आदत में बदलाव, लगातार खांसी, शरीर के किसी हिस्से में सूजन, रक्त स्त्राव, कब्ज जैसी समस्याएं होने पर किसी तरह की लापरवाही नहीं बरतते हुए तत्काल चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। प्रारम्भिक अवस्था में ही इलाज कराने से कैंसर पीडित को बचाया जा सकता है। अध्ययनों से पता चला है कि जीवनशैली में बदलाव लाकर कैंसर के खतरे को 60 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। अगर कैंसर पर रोकथाम के प्रयास किए गए, तो कैंसर के एक तिहाई मामलों पर लगाम लगाई जा सकती है।
हमारे देश में पुरूषों की तुलना में महिलाओं के लिए कैंसर कुछ ज्यादा निर्मम साबित हो रहा है। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि पुरूषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी से अधिक पीडित हो रही हैं। भारत में कुछ साल पहले तक महिलाओं में गर्भाशय का कैंसर सबसे अधिक होता था, लेकिन अब इसका स्थान स्तन कैंसर ने ले लिया है।
कैंसर का इलाज सर्जरी, रेडियोथेरेपी और केमोथेरेपी से किया जाता है। सर्जरी के तहत कैंसरग्रस्त भाग को ऑपरेशन करके बाहर निकाल दिया जाता है। रेडियोथेरेपी में विकिरण चिकित्सा दी जाती है, जबकि केमोथेरेपी में दवाओं से इलाज किया जाता है। ये दवाएं कैंसर की कोशिकाओं को खत्म करती हैं। ये दवाएं सिर्फ उन्हीं कोशिकाओं को नष्ट करती हैं, जो तेजी से विभाजित हो रही होती हैं। हालांकि इससे कभी-कभी कुछ सामान्य कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती हैं और इसके कुछ दुष्प्रभाव भी होते हैं। स्तन कैंसर और गर्भाशय के कैंसर में इलाज की इन्हीं पद्धतियों का सहारा लिया जाता है। लोगों को सचेत होना होगा। सावधानी से बढकर कोई उपाय नहीं है। परहेज, व्यायाम और संतुलित जीवन शैली कोई हल्का विष्ाय नहीं है, अगर हम इस विषय को हल्के से लेंगे, तो कैंसर का खतरा बढता जाएगा।
सुशीला कुमारी लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं
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Very Good, Plz write this kind of helpful article more and more
Thanks ...
04 फरवरी 2010, 18:40 hrs IST ,
by Manish from Hyderabnad
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