|
|
|
|
|
|
|
बजट से राहत की उम्मीद
|
|
05 फरवरी 2010, 10:36 hrs IST
|
|
|
अर्थव्यवस्था में सुधार के नतीजतन और अधिक राजकोषीय घाटे और बढती मुद्रास्फीति के कारण अगला बजट बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। विश्वव्यापी मंदी को ध्यान में रखकर दिए गए वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज को वापस लेने के बारे में सरकार के निर्णय की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही है। इसके अतिरिक्त भावी आर्थिक सुधारों और विशेष रूप से वित्तीय क्षेत्र में सुधारों के सम्बन्ध में सरकार से बहुत अपेक्षाएं हैं।
केन्द्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को ध्यान रखना होगा कि बजट सभी क्षेत्रों के लिए होता है इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि बजट में अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों का ध्यान रखा जाए। किसी भी महत्वपूर्ण क्षेत्र में असंतोष छोडना ठीक नहीं होगा। वैसे इस बार कृषि और लघु उद्योगों की ओर बजट का विशेष ध्यान हो सकता है, ये दोनों ही क्षेत्र विपरीत आर्थिक परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। उन्हें प्रतिस्पर्द्धा में बनाए रखने के लिए वित्तीय सहायता देना जरूरी है। ऎसा करना देश में संतुलित विकास ही नहीं, रोजगार के अवसर बढाने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। आज भी देश में कृषि पर निर्भर लोगों की संख्या बहुत ज्यादा है, अत: कृषि क्षेत्र में सुनियोजित विकास के लिए सरकार को बजट में कुछ न कुछ करना होगा।
बढता घाटा: अब किसी को शक नहीं है कि वैश्विक आर्थिक मंदी ने हमारी विकासशील अर्थव्यवस्था की रफ्तार को बहुत प्रभावित किया है। राजकोषीय घाटा बढ रहा है, क्योंकि जहां सरकार का खर्च बढा है, वहीं सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर कम हुई है। पिछले बजट में बुनियादी ढांचे में खर्च बहुत बढाया गया था, इस बार लोग देखना चाहेंगे कि सरकार सामाजिक क्षेत्र या सोशल सेक्टर में कितना खर्च करती है। प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार उपयोग की दृष्टि से देखें, तो पिछले साल बुनियादी ढांचा विकास के लिए आवंटित राशि और प्रयुक्त राशि के बीच बहुत बडी खाई है। समग्र विकास और विकास की रणनीति के लिए बुनियादी ढांचा हालांकि बहुत महत्वपूर्ण है, इसके बावजूद हो सकता है, इस मद में बजट आवंटन नहीं बढे। वैसे सरकार पर इस मद में खर्च दिखाने का राजनीतिक दबाव होगा।
विनिवेश की जरूरत : पिछले बजट में विनिवेश का कोई उल्लेख नहीं था, जिसका बाजार या शेयर बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव पडा था। लेकिन पिछले एक साल में विनिवेश कार्यक्रम को पटरी पर लाने के लिए कई कदम उठाने की शुरूआत हुई है। यदि सभी पहलुओं से देखें, तो विनिवेश प्रक्रिया इस बार बहुत आगे बढ सकती है। सरकार का खर्च बढ रहा है, उसे रोकना मुश्किल है। केवल राजस्व वसूली से खर्च पूरे नहीं हो सकते। अत: योजनाओं के लिए खर्च जुटाने के लिए विनिवेश की प्रक्रिया की पक्षधर केन्द्र सरकार पहले से रही है। कुछ सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश को वह अपनी मजबूरी भी बता सकती है। मुखर्जी के लिए यह एक बडी चिंता का विषय होगा कि आखिर पैसा कहां से आएगा।
मुद्रास्फीति की चिंता: बढती मुद्रास्फीति भी प्रमुख मुद्दा है। मौद्रिक नीति के तहत उपाय भी शुरू हो गए हैं। हाल में सीआरआर में बढोतरी की गई है, ताकि बाजार में तरलता को कम किया जा सके। अब मौद्रिक नीति को सीधे उच्च मुद्रास्फीति दर से निपटना होगा। ऎसा वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज को वापस लेकर ही किया जा सकता है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में इसके आसार बहुत कम हैं, क्योंकि दावे के साथ यह नहीं कहा जा सकता कि हमारी अर्थव्यवस्था मंदी से पूरी तरह उबर चुकी है।
इसके अलावा महंगाई से निपटने के लिए सरकार को दूसरे तरीके भी आजमाने चाहिए, जिसमें आपूर्ति को सुलभ बनाया जाना शामिल है। जन वितरण प्रणाली के जरिये जरूरी उत्पादों की कीमतों को नियंत्रित करने के ईमानदार प्रयास होने चाहिए। वैसे जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बढाने के लिए दूरगामी प्रयास भी करने होंगे। टैक्स की बात: हमारा देश जीएसटी अर्थात गुड्स एंड सर्विस टैक्स के लिए तैयार हो रहा है। प्रत्यक्ष कर संहिता का प्रस्ताव पहले से ही सार्वजनिक चर्चा में है। परोक्ष टैक्स में बहुत मामूली फेरबदल संभावित है, जबकि प्रत्यक्ष टैक्स में फेरबदल की संभावना नहीं है। परोक्ष कर में पहले जो रियायतें दी गई थीं, उनको वापस लिया जा सकता है। परोक्ष करों में ये रियायतें मंदी से उबरने के अभियान के तहत दी गई थीं। गौर करने की बात है कि केन्द्र सरकार ने मंदी की मार से बचने के लिए तीन आर्थिक पैकेज दिए थे। वेतनभोगी वर्ग की नजर आयकर स्लैब पर है। चूंकि प्रत्यक्ष कर संहिता पर काम चल रहा है इसलिए इस बार आयकर स्लैब में किसी परिवर्तन की संभावना न के बराबर है।
उद्योग जगत की चाह : मंदी से निपटने के लिए उद्योग क्षेत्र को जो रियायतें दी गई थीं, उनकी वापसी के लिए उद्योग जगत सहजता से तैयार नहीं होगा। उद्योग जगत का मानना है कि मंदी का खतरा पूरी तरह टला नहीं है और आर्थिक स्थितियां अतिरिक्ति रियायतों को जारी रखने के अनुकूल हैं। अगर रियायतों को वापस लिया गया, तो उद्योग जगत फिर मुश्किल में फंस सकता है। इतना ही नहीं, उद्योग जगत निर्यात क्षेत्र में और मदद की उम्मीद लगाए ब्ौठा है, ताकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में वह प्रतिस्पर्द्धा में बना रह सके।
आम लोगों के लिए: अगर आम लोगों और गरीबों के मद्देनजर देखें, तो राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का विस्तार शहराें तक होना चाहिए। यह मांग काफी दिनों से हो रही है। इससे शहरी गरीबों को भी रोजगार के संकट से राहत मिलेगी। मंदी की वजह से कई शहरों में भी रोजगार घटा है, जिससे गरीबों को मुश्किलों का सामना करना पड रहा है। केन्द्रीय वित्त मंत्री को बजट के मार्फत ऎसी आर्थिक गतिविधियों को बढावा देना चाहिए, जिससे गरीबों को अर्थव्यवस्था में सकारात्मक भागीदारी करने में सुविधा हो। वे अलग-थलग न रहें। इसके अलावा जनवितरण प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत है, यह सीधे गरीबों की जरूरत से जुडी प्रणाली है। बहरहाल, इस बार सबसे ज्यादा जरूरी होगा, मुद्रास्फीति दर को नियंत्रित और स्थिर करना, ताकि आम लोगों को महंगाई या कीमतों की मार से राहत मिले।
एन.आर. भानुमूर्ति लेखक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|