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तेज हो सैन्य आधुनिकीकरण
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07 अक्तूबर 2009, 10:58 hrs IST
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चीन और पाकिस्तान के खतरे के मद्देनजर सैन्य विशेषज्ञों द्वारा भारतीय सेना के लगातार आधुनिकीकरण पर जोर दिया जा रहा है। तीनों सेनाओं के आधुनिकीकरण के लिए कुछ कदम उठाए जरूर गए हैं, लेकिन इस काम में बेहतर समन्वय बिठाने में मौजूदा ढांचे के विफल रहने के कारण कार्यक्रम निर्धारित से बहुत पीछे चल रहा है। पिछले कुछ सालों में खतरे के तरीकों में बहुत बदलाव हुआ है लेकिन न तो ढांचा और न संगठन नई सुरक्षा चुनौतियों के अनुरूप खुद को ढाल पा रहा है। बढते खतरों का मुकाबला करने के लिए सेनाओं का पुनर्गठन समय की पुकार है। ये खतरे हैं- चीन, पाकिस्तान, पाकिस्तान से कार्रवाई करने वाले आतंककारी, जातीय अलगाववादी गुट, नक्सलवादी- माओवादी गुट और स्वदेशी आतंककारी। इन हालात में हमें पारम्परिक युद्ध क्षमता बढाने के साथ ही चीन व पाकिस्तान की क्षमताओं को ध्यान में रखकर प्रतिकार की परमाणु क्षमता विकसित करने की जरूरत है।
इसके अलावा आतंककारियों, विद्रोहियों और नक्सलवादी-माओवादी जैसे उग्र सामाजिक-आर्थिक आंदोलनों से निपटने के लिए अपारम्परिक युद्ध क्षमता तैयार करने की भी जरूरत है। भारत एक उभरती महाशक्ति है, इसलिए हमें अपनी सीमाओं से आगे भी सोचते हुए शांति कायम रखने के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में हाथ बंटाकर अंतरराष्ट्रीय शांति सेनाओं में भी शिरकत करनी होगी, जो हमारे समुद्रों में जल-दस्युओं और आतंककारियों के नकेल डालकर शांति बनाए रख सकें।
पारम्परिक खतरों से निपटने के लिए हमें अपनी सशस्त्र सेनाओं का आधुनिकीकरण करना होगा, उनका ढांचा बदलना होगा, अलग-अलग कमान ढांचों के बजाय एकीकृत सैन्य केन्द्र व मुख्यालय बनाने होंगे और चीन व पाकिस्तान की प्रक्षेपास्त्र क्षमताओं को ध्यान में रखकर हमें भी अपनी प्रक्षेपास्त्र क्षमता बढानी होगी। पाकिस्तान व चीन की वायुसेना व नौसेना से खतरों का मुकाबला करने के लिए हमें अपनी वायुसेना व नौसेना का स्तर बढाना होगा। चीन ने अपने उपग्रह रोधी (एंटी सेटेलाइट) हथियारों का परीक्षण कर लिया है और हम अभी तक अपेक्षित सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम विकसित नहीं कर पाए हैं। आधुनिक युद्ध प्रणाली में साइबर युद्ध नया पहलू है। चीन ने इस क्षेत्र में अच्छी- खासी प्रगति की है। वह तो अमरीका के रक्षा कम्प्यूटरों को भी हैक करने में सक्षम है।
चीन की साइबर युद्ध शिक्षा पश्चिमी देशों से भावी युद्ध की चुनौतियों का मुकाबला करने को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, जो ऎसी क्रांतिकारी तकनीकों पर निर्भर है, जिससे उसे हथियार प्रणाली, गुप्तचरी, निगरानी और सर्वेक्षण तंत्र में श्रेष्ठता प्राप्त होगी। भारत को नए विभाग विकसित कर और बहु-एजेंसी बुनियादी ढांचा तैयार कर चीन से साइबर युद्ध के खतरे से निपटने के उपाय करने होंगे। सशस्त्र सेनाओं के नए तौर-तरीके, तकनीक और प्रक्रियाएं अपनाकर उन्हें अपनी युद्ध शिक्षाओं में शामिल करना होगा। अपने कम्प्यूटर संजाल को हैकर्स और साइबर हमलों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए सेना में साइबर कमान स्थापित करनी होगी। भारत की नई प्रणालियां और कमान व नियंत्रण संजाल तथा असैनिक बुनियादी ढांचा साइबर स्पेस के ज्यादा से ज्यादा उपयोग पर निर्भर करेगा। हमारे पास रक्षात्मक के साथ ही आक्रामक प्रणाली भी होनी चाहिए जिससे दुश्मन की कमान, नियंत्रण व गुप्तचर प्रणाली को ध्वस्त किया जा सके। साथ ही साइबर संसार में अभी प्रयुक्त हो रही नवीनतम साफ्टवेयर प्रणाली को और विकसित करना होगा।
पाकिस्तान से खतरे दो तरह के हैं। एक तो परमाणु हमले का खतरा और दूसरा आतंकवाद के साथ छाया युद्ध का खतरा। इन खतरों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए हमें अपनी परमाणु क्षमता बढानी होगी और आंतरिक सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाना होगा। छाया युद्ध और आतंकवाद से प्रभावी तरीके से निपटना पारम्परिक युद्ध के मुकाबले बहुत कठिन होता है। यदि हम पाकिस्तान के शत्रुतापूर्ण इरादों पर नजर डालें तो साफ है कि वह भारत के साथ बातचीत जारी रखने की नीति के साथ ही उन कट्टरपंथी गुटों का समर्थन कर रहा है, जो आतंककारी गतिविधियां चलाते हैं। पाकिस्तान के नीति निर्माता आतंककारी हमलों के जरिए जम्मू-कश्मीर पर बातचीत के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। पाकिस्तान के कट्टरपंथी गुटों का मानना है कि भारत से कश्मीर को छीनने के लिए जिहाद छेड देना चाहिए। वे जम्मू-कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि भारत और पाकिस्तान दोनों पर जबर्दस्त अंतरराष्ट्रीय दबाव है कि वे जम्मू-कश्मीर की समस्या का दोनों को स्वीकार्य हल ढूंढें। पाकिस्तान से बातचीत के बावजूद हालात बदलने की उम्मीद नजर नहीं आती।
पाकिस्तान में कट्टरपंथी गुटों का बढता प्रभाव और दोनों देशों के बीच युद्ध शुरू कराने की उनकी क्षमता परमाणु युद्ध का रूप ले सकती है, इस बात की भारत अनदेखी नहीं कर सकता।
अल कायदा और उसके सहयोगी वैश्विक इस्लामी गुटों का प्राथमिक उद्देश्य तो इस्लामी मूल्यों पर हमला करने वाले पश्चिमी जगत से बदला लेना है। वह अमरीका को अपना दुश्मन नम्बर एक मानते हैं जो उनकी नजर में मुसलमानों के संहार और इस्लाम को नष्ट करने में जुटा है। 'हिन्दू भारत' को वह अमरीका के गठबंधन का तीसरा भागीदार मानते हैं और इसी आधार पर आतंककारी हमलों को जायज ठहराते हैं। कई आतंककारी गिरोहों को वैश्विक जिहादी ढांचे से हर तरह की मदद मिलती है।
भारत को इन खतरों की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए अपने सैनिकों की संख्या बहुत बढाने के साथ परमाणु हथियारों का जखीरा भी बढाना होगा। सेना और अर्द्ध सैनिक बलों में नई विशेष इकाई गठित करनी होंगी जो पारम्परिक और गैर पारम्परिक सभी तरह के खतरों से निपटने में सक्षम हों। स्पष्ट है कि बाहरी और आंतरिक सुरक्षा जरू रतों को पूरा करने के लिए अच्छी खासी रकम की जरू रत पडेगी। उभरती महाशक्ति होने के कारण भारत को यह कीमत तो चुकानी ही होगी।
अफसर करीम [लेखक भारतीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हैं]
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