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रोकें घृणा की राजनीति
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09 फरवरी 2010, 10:49 hrs IST
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शिव सेना के अतिवादी विचार किसी से छिपे नहीं हैं। पार्टी वयोवृद्ध नेता बाल ठाकरे के इर्द-गिर्द घूृमती है, जो इस पर सख्त नियंत्रण रखते हैं। वह बरसों से पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में कटु और व्यंग्यपूर्ण विवादास्पद टिप्पणियां करते रहे हैं। उन्होंने सचिन तेंदुलकर को भी नहीं बख्शा, जब उन्होंने कहा कि वह भारतीय पहले हैं। महाराष्ट्र और शेष देश में ही नहीं समूचे विश्व में लोकप्रियता के कारण सचिन के प्रति बाला साहेब का रूख अधिक सख्त नहीं रहा। उन्होंने सचिन को सलाह दी कि वह स्वयं को क्रिकेट तक ही सीमित रखे, राजनीति में नहीं पडे। उद्योगपति मुकेश अम्बानी ने जब ऎसा ही बयान दिया तो बाला साहेब ने उन पर बरसते हुए उन्हें याद दिलाया कि उनके पिता धीरू भाई अम्बानी उनके घनिष्ठ मित्र थे। अभिनेता शाहरूख खान ने आईपीएल के लिए खिलाडियों की हाल ही हुई नीलामी के बारे में जब यह कहा कि इसमें पाकिस्तान के खिलाडियों से सही व्यवहार नहीं हुआ तो शिव सेना के वरिष्ठ नेताओं ने उनके खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी। शिव सेना सांसद संजय राउत ने कहा कि उनकी पार्टी पाकिस्तानियों की प्रशंसा करने वाले किसी भी व्यक्ति को नहीं बख्शेगी। मनोहर जोशी जैसे घुटे हुए शिवसेना नेता ने शाहरूख से माफी मांगने के लिए कहा।
शिव सेना के नेता खुले आम यह धमकी देने लगे कि जब तक शाहरूख खान माफी नहीं मांगेंगे, वे उनकी फिल्म 'माई नेम इज खान' को रिलीज नहीं होने देंगे। शिव सेना के कार्यकर्ताओं ने मुंबई महानगर में लगे इस फिल्म के पोस्टरों को फाडना भी शुरू कर दिया था। पर्दे के पीछे पार्टी में विचार-विमर्श भी चलता रहा, जिसमें यह महसूस किया गया कि सचिन के बाद अब शाहरूख जैसी लोकप्रिय हस्ती से टकराव नहीं टाला गया तो पार्टी का जनाधार और खिसक जाएगा। इसी कारण बाल ठाकरे को अपने कदम वापस खींचने पडे। शिव सेना अब शाहरूख की फिल्म के प्रदर्शन में रोडे नहीं डालेगी, लेकिन उसने अप्रत्यक्ष रू प से शाहरूख खान को देशद्रोही ठहरा दिया है। बाला साहेब और उनकी पार्टी यह पूरी तरह भूल गए कि पाकिस्तान इस समय 20-20 का विश्व चैंपियन है और शाहरूख आईपीएल में कोलकाता राइडर्स टीम के मालिक हैं, इसलिए उन्हें आईपीएल की नीलामी के बारे में टिप्पणी करने का हक है। बाला साहेब के निशाने पर अब राहुल गांधी भी आ गए हैं। राहुल ने पटना में प्रश्नों के उत्तर में कहा कि यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के सभी राज्यों से आए एनएसजी के जवानों ने अपनी जान की बाजी लगाकर 26/11 के हमले में मुंबई को बचाया। इस पर शिव सेना ने कहा कि उसके कार्यकर्ता मुंबई आने पर राहुल को काले झंडे दिखाएंगे। राहुल के मुंबई जाने पर उनका भव्य स्वागत हुआ। इतना ही नहीं वे पूर्व निर्धारित कार्यक्रम बदलकर आम लोगों के साथ ही लोकल ट्रेन में भी मुंबई में घूमे। शिव सेना के कार्यकर्ता पूर्व निर्धारित रास्तों पर काले झंडे लिए उनका इंतजार करते रह गए।
शिव सेना विघटनकारी राजनीति और विवादास्पद मुद्दों से फली-फूली है। बाल ठाकरे ने 1966 में जब पार्टी की स्थापना की थी, तब उन्होंने मुंबई में बसे दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाया था। अब 44 साल बाद उत्तर भारतीय उनके निशाने पर हैं। उद्योगपतियों और कांग्रेस के अप्रत्यक्ष समर्थन से बाला साहेब ने मजदूर संगठनों में अपना प्रभुत्व स्थापित किया था, जहां पहले कम्युनिस्ट हावी थे। शिवसेना ने फिल्म जगत के साथ भी घनिष्ठ सम्पर्क बनाए। सडकों पर हिंसा उसके कार्यकर्ताओं के काम करने के तरीकों में शामिल है। मराठी मानुस का मुद्दा वह समय-समय पर उठाती रही है, हालांकि अब यह मुद्दा पहले जितना असरदार नहीं रहा है। बाला साहेब की बढती उम्र और पार्टी के अप्रासंगिक हो जाने के भय से शिव सेना चिंतित लगती है। बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) का गठन कर शिव सेना की मुश्किलें और बढा दी हैं। मनसे ने शिव सेना से भी सख्त रूख अपनाकर उसके आधार में सेंध लगाई है। इसलिए शिव सेना अपना आधार बचाए रखने के लिए अतिवादी रूख अपना रही है।
मराठी बोलने वालों को ही मुंबई में टैक्सी चलाने की अनुमति देने का दुर्भाग्यपूर्ण फैसला कर महाराष्ट्र में कांग्रेस-राकांपा की साझा सरकार ने शिव सेना और मनसे में नई जान फूं क दी। इस पर हुए बवाल के बाद सरकार ने हालांकि इसमें संशोधन कर मराठी के साथ ही हिन्दी या गुजराती बोलने वालों को भी शामिल कर लिया था। इससे स्पष्ट है कि महाराष्ट्र के सभी पार्टियों से जुडे राजनीतिज्ञ खतरनाक रवैया अपना रहे हैं। आम धारणा है कि मनसे को कांग्रेस और राकांपा ने इसलिए आगे बढाया है ताकि शिव सेना का असर घट सके। उत्तर भारत के टैक्सी चालकों और दुकानदारों पर हमले रूकवाने में सरकार नाकाम रही थी। केन्द्र सरकार की भर्ती परीक्षाओं के लिए मुंबई आने वाले उत्तर भारतीय छात्रों पर भी हमले हुए। हमला करने वाले कुछ छुटभैये कार्यकर्ताओं पर तो कार्रवाई की गई, लेकिन शिव सेना और मनसे के बडे नेताओं का बाल भी बांका नहीं हुआ। नि:संदेह यही कारण है कि इन दोनों पार्टियों के नेता हिंसा की राजनीति करते हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मूल अधिकार और लोकतंत्र का आधार है, जिस पर ये नेता चोट करते रहे हैं।
अब समय आ गया है जब निजी स्वार्थो के लिए जनता को गुमराह करने वालों और हिंसक रूख अपनाने वालों के साथ सख्ती की जाए। लोकतांत्रिक भारत में घृणा की राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे की पसन्द-नापसंद के आधार पर फैसले नहीं हो सकते। जब तक ऎसे मामलों में कानून सख्ती से लागू नहीं किया जाएगा क्षेत्र, संप्रदाय या वर्ग आधारित नेता घृणा की राजनीति करते रहेंगे। देश ने अब तक बहुत सह लिया है, अब इस सबको रोकने और उन्हें जवाबदेह बनाने का समय आ गया है।
अरूण भगत [लेखक गुप्तचर ब्यूरो के निदेशक रहे हैं]
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