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गुरुवार, 11 मार्च, 2010
सबके अपने-अपने कुंभ
20 जनवरी 2010, 10:51 hrs IST
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Kumbh Fair
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कुंभ में जाते तो हैं, लेकिन क्या लेकर लौटते हंै अपने पापाें को तज कर और गंगा को अंजुरी में भरकर सूरज की तरफ उडेलने के बाद हम अपनी उस सामूहिकता का क्या करते हैं, जिसके लिए कुंभ में जाना अनिवार्य माना जाता है। मन्थन और मनन की प्रक्रिया के बिना कुंभ का कोई मतलब नहीं। देश भर के  गंावाें से लाखों लोग हरिद्वार के गंगा घाटों पर इसलिए जमा हो जाएंगे कि उन्हें डुबकी लगा कर लौटना है। अपनी तमाम सीमाओं को छोड समूह में घुल-मिल जाने के लिए कुंभ होता है या समूह में जाकर अपनी सीमा रेखा को और गहरा करने के लिए कुंभ होता है  खण्ड-खण्ड और कई उपधाराओं में बंटी सनातन धारा को फिर से एक अमृत कलश चाहिए, जिसे पीने से बराबरी का सन्देश सनातन बन जाए।

हर की पौडी पर राजस्थान के लोगाें की भीड देखकर रूक गया। दीवार पर पीले रंग की पुताई की गई थी। काले मोटे अक्षराें में लिखा था - पण्डित गंगाराम। अनुसूचित जाति का एकमात्र पण्डा। जिज्ञासा ने बेचैन कर दिया। यहां राजस्थान के कौन लोग आते हैं पण्डा जी ने जवाब दिया, ये सभी दलित हंैं और हम सिर्फ दलितों का संस्कार करते हैं। हमारे अलावा कोई और हरिजनाें का संस्कार नहीं करता है। सालों पहले पण्डित गंगाराम जी ने सन्त रविदास से दान लिया था, तब से हम ही हरिजनाें का दान लेते हैं। 

अब कई सवालाें के जवाब जरूरी थे। पण्डा जी ने कहा कि यूपी और बिहार के  हरिजन कम आते हैं। राजस्थान से ज्यादा आते हंै। वहां दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है। उनमें जज, आईएएस और मन्त्री सब हो गए हैं। यही लोग आकर हमें भारी चढावा दे जाते हैं। सोचने लगा कि राजस्थान के दलितों की आर्थिक हैसियत बदल गई है, तो सामाजिक हैसियत क्यों नहीं बदली क्यों उन्हें हरिद्वार के घाट पर अनुसूचित जाति के एकमात्र पण्डे के यहां आना पडता है अन्तिम संस्कार के वक्त ऎसी गैरबराबरी किसी भी धार्मिक सामूहिकता के लिए बडी चुनौती होनी चाहिए, लेकिन हम गजब के संस्कारवान लोग हैं! सामने खडी चुनौती को नजरअंदाज कर पतली गली बनाकर निकल लेते हैं!

राजस्थान से आए एक सज्जन ने कहा कि हमारे पास सब कुछ है, लेकिन जब ऎसा व्यवहार होता है, तो दिल टूट जाता है। अगर हम गलती से भी दूसरे पण्डे के पास चले गए, तो जाति का पता लगते ही वह दान-पुण्य कराने से इनकार कर देता है। हरिद्वार के घाटों की सुंदरता इस हकीकत से बदसूरत लगने लगी। हैरान भी हुआ कि इतनी गैरबराबरी झेलने के बाद कर्मकाण्डों में विश्वास कैसे बचा हुआ है। कहीं ऎसा तो नहीं कि राजस्थान के दलितों का वैकल्पिक राजनीतिक धारा में विश्वास कम रहा है।

कोई धर्म सनातन कैसे बनता है क्या सिर्फ हजारों सालों से चलते रहने की इस अनथक यात्रा में अपने गुण-दोषों के परिष्कार करने से कुंभ में जाने वाले सभी लोग क्या उस घाट पर जाकर अनुसूचित जाति के पण्डे से अपना संस्कार कराएंगे। मुजफ्फरनगर के अमित वर्मा ने साफ इनकार कर दिया। पण्डित गोपाल रूआंसे हो गए। कहने लगे कि हम भी ब्राह्मण हैं, लेकिन दूसरे ब्राह्मण हमारे हाथ का पानी तक नहीं पीते। घाटाें और नदी की देखरेख करने वाली संस्था गंगा सभा हमें सदस्य नहीं बनाती है।

जाति के अलावा हैसियत के आधार पर भी हरिद्वार के घाटों का वर्गीकरण हो चुका है। आश्रमों और धर्मशालाओं के अपने-अपने घाट हंैं। वीवीआईपी के लिए अलग घाट बनाए गए हैं। आश्रमों के भीतर भी सनातन सामूहिकता दरकती नजर आती है। सांसारिक मोहमाया का भ्रम तोडने वाले जबरदस्त संदेश और बाबाओं की अपनी भंगिमाएं। आश्रमों की सज्जा ऎसे की गई है कि जैसे वो कोई शहरी मॉल हों।

तय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन-से बाबा अच्छे हैं। समन्वय की जगह प्रतिस्पर्धा दिखती है। हरिद्वार में प्रवेश करते ही चौक पर बाबाओं के बडे-बडे होर्डिüग। साबुन-तेल वाले विज्ञापनाें के मॉडल की मानिन्द बाबा लोग भी मॉडलों जैसे लगते हंै। वो अपना प्रचार क्यों करवा रहे हंै क्या हर बाबा अपने आप में ब्राण्ड हैं अगर अध्यात्म का रास्ता एक ही है, तो सामूहिक प्रयास क्यों नहीं है, ताकि दलितों और सवर्णों सबका धार्मिक अनुभव एक-सा हो। समाज में बराबरी हो।

लेकिन गंगा जी के लिए होर्डिüग नहीं हैं गंगा प्रदूषित हो रही है। जिन धार्मिक मंचों से गंगा के लिए आवाज उठती है, वो इतने राजनीतिक हो गए हैं कि सबकी माता होने के बावजूद गंगा को लेकर सामूहिकता नहीं बन पाती है। गंगा को लेकर कोई चिन्तन नहीं है। गंगासागर की तरफ जाने वाले मार्ग में गंगा की हालत देखी नहीं जाती। वैसे पिछले वर्षोü से गंगा के अस्तित्व पर ही सवाल उठ रहे हैं, गंगा सिकुड रही है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। गंगा को नहीं बचाया गया, तो क्या कुंभ बचेगा

हरिद्वार के ठीक ऊपर पहाडों से देखिए। वृक्ष कट गए हैं। वृक्षों की जगह होर्डिüग उग आए हैं। मुख्यमंत्री के चेहरे से लेकर किसी पूरी-भाजी वाले का बोर्ड भी दूर से दिख जाएगा। बाजार इस तरह से हावी है कि हरिद्वार कहीं से नहीं लगता है आध्यात्मिक स्थल।

दरअसल, तीर्थोü की सात्विकता को बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं हुए हैं। कुंभ के लिए हरिद्वार पहले से ज्यादा कंक्रीट में बदल चुका है। अकेले हरिद्वार में इक्तालीस पुल बन गए हैं। गंगा के किनारे के हर घाट को कंक्रीट में बदल दिया गया है। मल्टीलेवल पार्किग, तरह-तरह के होटल और रंग-बिरंगे आश्रम पहले से ज्यादा बन चुके हैं। इसकी चिन्ता किसी को नहीं होगी। सांकेतिक रूप से पर्यावरण और गंगा को लेकर नारे जरूर लगाए जा रहे हैं, लेकिन तीर्थोü के होटल में बदलने को लेकर कोई चिन्तित नहीं है। अब तीर्थ जाना वीकेण्ड मनाना होता है। चिन्तन और मनन की प्रक्रिया खत्म होती जा रही है। ऎसा नहीं है कि आने वालों की श्रद्धा कम हो गई हो। वो आज भी उतनी ही श्रद्धा से डुबकी लगाते हैं, अपने पीतरों को याद करते हैं और पूजा-आरती करते हैं। कंुभ का असली मतलब तो यही है कि हम समाज को बेहतर बनाने के लिए सामूहिक चिन्तन करें। बराबरी लाने के लिए संघर्ष करें। तीर्थोü का उत्साह तब कई गुना हो जाएगा।

रवीश कुमार
लेखक जाने-माने टीवी एंकर व एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडिटर हैं
Comments
aslee pujaa to hai maanvtaa. log jaati bhedbhaav me apnaa samay barbaad karte rhte hai.jeetejee jin ...
20 जनवरी 2010, 21:36 hrs IST , by punita from delhi
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