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बहाने नहीं, राहत चाहिए
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21 जनवरी 2010, 10:43 hrs IST
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पिछले वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में संप्रग को मिली अप्रत्याशित जीत और उसके बाद महाराष्ट्र व हरियाणा के विधानसभा चुनावों में भी विजय से पनपे व बढे फीलगुड की हवा आठ महीने बीतते-बीतते निकल गई है। इसका कारण केंद्र की दूसरी संप्रग सरकार से आम लोगों को मिली निराशा है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में इस दौरान हुई बेतहाशा वृद्धि के प्रति सरकार की उदासीनता सबसे अधिक कष्टकर है। आम आदमी का स्वयं को हितचिंतक बताने वाले सत्तारू ढ गठबंधन की खाद्य वस्तुओं की बढती कीमतों के प्रति उदासीनता के चलते ही औसत आदमी के लिए प्रोटीन का एकमात्र स्त्रोत 'दालें' निम्न मध्यम वर्ग की पहुंच से भी बाहर हो गई हैं। देश के करोडों लोग प्रचण्ड कष्ट झेल रहे हैं, उनके जले पर नमक छिडकने का काम कुछ वरिष्ठ नेता यह कहकर कर रहे हैं कि विकास दर उम्मीद से अधिक रहने वाली है। ऎसे नेता खाद्य वस्तुओं की कीमतों के बारे में मौन धारण किए हुए हैं। लोग भूले नहीं हैं कि राज्यसभा में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी माकपा सदस्य बृंदा कारत के तीखे सवाल पर आपा खो बैठे थे। इस मामले में सबसे बडे दोषी शरद पवार हैं, जो वर्ष 2004 से ही देश के कृषि मंत्री हैं और स्वयं को गर्व के साथ पश्चिमी महाराष्ट्र के किसानों का बडा हितैषी दर्शाने से नहीं चूकते हैं।
शायद पवार के दिमाग में इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बातें हैं, जैसे बेहद आकर्षक क्रिकेट या अपने महत्वाकांक्षी भतीजे को किनारे कर बेटी सुप्रिया सुले को अपना उत्तराधिकारी बनाना। अन्न उत्पादन, वितरण और मूल्य निर्धारण के बारे में विचार करने के लिए लगता है कि उनके पास समय नहीं है। और इस बारे में जब भी अपनी जुबान खोलते हैं, आम आदमी की मुश्किलें और बढ जाती हैं। एक समय उन्होंने कहा था कि भारत में चीनी का पर्याप्त भंडार है और इसका निर्यात भी किया जा सकता है और जब चीनी की कीमतें 50 रूपए के आसपास पहुंचने लगीं, तो वे कह गए कि मैं कोई ज्योतिषी नहीं हूं, जो यह बता सकूं कि चीनी के दाम नीचे कब आएंगे। उनके इस कथन पर देश भर में बवाल मच गया। पवार की ही राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के सांसदों तक को लज्जित होना पडा। कांग्रेस के कई सांसदों ने उनके इस बयान की कडी आलोचना की। कांग्रेस प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने सार्वजनिक रूप से कहा, 'मंत्री का काम सिर्फ समस्याएं बताना ही नहीं है, उनके समाधान सुझाना भी होता है। उनका लक्ष्य तो आम आदमी को राहत पहुंचाना होना चाहिए।' द्विवेदी द्वारा व्यक्त भावनाएं निरपवाद नहीं हैं, लेकिन उन्होंने अप्रत्याशित कुछ नहीं कहा है। कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी स्वयं खाद्य वस्तुओं की आसमान छूती कीमतों पर चिंता और नाराजगी जता चुकी हैं। इस गम्भीर समस्या के सम्बन्ध में अब तक उठाए गए कदमों से भी वह खुश नहीं हैं।
इस संदर्भ में विचार के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंत्रिमंडल की बैठक बुलाई, जिसमें पवार से उन्होंने अपने सुपरिचित शालीन तरीके से कह दिया कि उन्हें अपना दायित्व गम्भीरतापूर्वक निभाना चाहिए। शरद पवार को ही मंत्रिमंडल के फैसलों की जानकारी मीडिया को देने का जिम्मा सौंपा गया। यह काम उन्होंने बेमन से किया। उससे पहले उन्होंने मीडिया के लोगों से कहा कि उनकी टिप्पणियों को 'संदर्भ से काटकर और तोड-मरोडकर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।' मीडिया से बातचीत में उनके भाव और स्वर पहले के अक्खड स्वर से एकदम उलट थे, जिसमें वे कह रहे थे कि अनाजों की कीमतें आठ-दस दिन में घटने लगेंगी। वे यह भी कह रहे थे कि इसके लिए केन्द्र सरकार जिम्मेदार नहीं है। वह सारा दोष राज्यों की सरकारों पर मढ देते थे। उन्होंने इस 'खुशखबरी' पर भी जोर देने की कोशिश की कि खाद्य वस्तुओं की मूल्य वृद्धि की रफ्तार, जो पिछले कुछ सप्ताहों से 20 प्रतिशत के आसपास चल रही थी, अब नीचे आने लगी है। इसके बाद उन्होंने घोषणा की कि सरकार ने चीनी, गेहूं, चावल, दालों और खाद्य तेलों के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने का निर्णय किया है, जिससे बाजार में इनकी उपलब्धता बढ सके।
पवार ने राज्य सरकारों की आलोचना के लिए इस तथ्य का सहारा लिया कि नौ लाख टन कच्ची चीनी का आयात पहले ही किया जा चुका है। यह चीनी कांडला और मूंदडा बंदरगाहों पर पडी है, जो उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों में प्रसंस्करण के लिए मंगाई गई थी, लेकिन बारम्बार आग्रह के बावजूद मायावती की सरकार ने इसकी अनुमति नहीं दी। प्रधानमंत्री ने इस समस्या पर विचार के लिए अगली 27 जनवरी को मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाई है। इसका सीधा-सा उपाय है कि चीनी उत्पादक राज्यों में से जो भी इस चीनी का प्रसंस्करण करने के लिए तैयार हों, वहां से इसे प्रसंस्कृत किया जाए।
उधर उत्तर प्रदेश की तुनकमिजाज मुख्यमंत्री मायावती ने विधान परिषद चुनावों में अपूर्व जीत के बाद पवार को इसका उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि केन्द्र की संप्रग सरकार पूंजीपतियों और कालाबाजारियों का हित साधने में लगी है। वे तो गरीब किसानों की हितैषी हैं, इसलिए उन्होंने कच्ची चीनी को तब तक राज्य में प्रसंस्कृत करने की अनुमति नहीं दी है, जब तक कि किसानों के उपजाए गन्ने की पिराई पूरी नहीं हो जाती। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी मायावती के सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि यदि राज्य सरकारें ही इस समस्या के लिए पूरी तरह जिम्मेदार होतीं, तो विभिन्न राज्यों में मूल्य स्थिति भी अलग-अलग होती। साथ ही, उन्होंने पूछा कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की राज्य सरकारों के बारे में पवार क्या कहेंगे अन्य मुख्यमंत्रियों ने भी पवार के बयान की आलोचना की है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि केन्द्र सरकार ने आखिरकार खाद्य वस्तुओं की जमाखोरी और मुनाफाखोरी के खिलाफ कार्रवाई का निर्णय किया है। क्या इससे मायावती के आरोप की पुष्टि नहीं होती है कुछ लोग कह सकते हैं, 'कभी नहीं से देर भली', लेकिन संप्रग सरकार से यह क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि उसने ये प्रारंभिक कदम पहले क्यों नहीं उठाए। चीनी की कीमत घटने के संकेत हैं, तो दूध के कीमतों के बढने की बारी है। कुछ भी हो, हमारी सरकार को ध्यान रखना चाहिए, कार्रवाई शब्दों से ज्यादा मायने रखती है और उसका अब भी इंतजार है।
इंदर मल्होत्रा लेखक जाने-माने पत्रकार हैं
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