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रविवार, 14 मार्च, 2010
गरीबी में आटा गीला
22 जनवरी 2010, 10:53 hrs IST
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Haiti earthquake
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हैती में आए विनाशकारी भूकम्प के बाद अधिकांश भारतीयों ने इस देश का नाम पहली बार सुना होगा। इस भूकम्प से हैती की राजधानी पोर्ट-एन-प्रिंस तो लगभग पूरी तरह नष्ट हो गई है। इस छोटे से कैरेबियन द्वीप की खोज दिसम्बर 1492 में क्रिस्टोफर कोलम्बस ने की थी। कई शताब्दियों तक यह द्वीप फ्रांस के औपनिवेशिक साम्राज्य का अंग रहा। अमरीका ने इस द्वीप पर 1915 से 1934 के दौरान कब्जा कर लिया था।

हैती की लगभग एक करोड आबादी में 98 प्रतिशत अश्वेत हैं। ये सभी अफ्रीकी गुलामों के वंशज हैं। इस द्वीप में चीनी, कोको और काफी का उत्पादन होता है। हैती संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है। व्यावहारिक दृष्टियों से अगर देखें, तो यह संयुक्त राज्य अमरीका का एक 'उपनिवेश' है। अमरीका हैती की अप्रातिनिधिक सरकारों में मुखिया के रूप में लगातार भ्रष्ट हैतियन नेताओं का समर्थन करता रहा है। हैती विश्व के सबसे पिछडे गरीब और अविकसित देशों में से एक है।

भीषण विनाशकारी भूकम्प के बाद पूरे देश में अराजकता की स्थिति है। लुटेरों, चोरों व आवारागर्दों पर किसी का नियंत्रण नहीं है, जिनके लिए यह सुनहरा अवसर बन गया है। वहां जो थोडा-बहुत बुनियादी ढांचा था, वह भी ढह गया है। हजारों बच्चे अनाथ हो गए हैं, माता-पिताओं ने अपने लाडले बेटे-बेटियों को खो दिया है, जिधर नजर पडती है विधवाएं नजर आती हैं। दुनिया भर के लोग हैती के भूकम्प पीडितों की सहायता करने के इच्छुक हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि देश के एकमात्र हवाई अड्डे पर जल्दी से जल्दी राहत सामग्री कैसे पहुंचे और जरूरतमंदों में उसका उचित वितरण कैसे होक्

हैती इतना गरीब क्यों हैक् इसके कई कारण हैं। हैती के लोगों के कल्याण पर अमरीकी व्यापारिक हितों द्वारा शोषण भारी पडता रहा है। सभी कैरेबियन द्वीपों के देश अल्प विकसित हैं। उन पर शासन करने वाले देशों ने लम्बे समय तक उनका जमकर शोषण किया। अफ्रीका महादेश को ही लें। वहां पचास से अधिक देश हैं, उनमें लगभग सभी अल्प विकसित या विकासशील हैं। मैं पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्द्ध में जाम्बिया में भारत का उच्चायुक्त रहा था। वहां की जमीन उर्वरा है और उसमें अमीर देश बनने की क्षमता है। वहां तांबा बहुतायत में उपलब्ध है। श्वेतों ने वहां तांबे और केवल तांबे पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रखा था। शेष सभी चीजों की उपेक्षा की गई। उस पर शासन करने वाले çब्ा्रटेन, फ्रांस और पुर्तगाल सभी के हाथ उनके खून से रंगे हैं। इन सभी ने गुलामों का व्यापार किया। वे अश्वेतों को पकडकर श्वेत व्यापारियों को बेच देते थे, जो ऎसे जहाजों में भरकर उन्हें अमरीका ले जाते थे, जो पशुओं को ले जाने लायक भी नहीं होते थे। अरबी लोग भी मुनाफे वाले इस गुलामों के कारोबार में लिप्त थे। यह सिलसिला उन्नीसवीं सदी तक चला। न तो विकास हुआ, न स्वास्थ्य की देखभाल हुई, न पढाई-लिखाई और न मिला पीने लायक पानी।

नाइजीरिया का तेल विदेशी कम्पनियों के हाथ में था। यही हाल घाना की कॉफी, केन्या की चाय और दक्षिण अफ्रीका के सोने का था। श्वेत देश कुछ समय पहले तक अफ्रीकी और अरब देशों में मानवाधिकार न होने की बातें किया करते थे। तथ्य यह है कि अमरीका, çब्ा्रटेन, फ्रांस, हॉलैण्ड, स्पेन, पुर्तगाल और जर्मनी का मानव अधिकारों के बारे में रिकॉर्ड पिछले दो सौ वर्षों में बहुत ही शर्मनाक रहा है। रैड इंडियन समुदाय के लोगों को अमरीका से निर्दयतापूर्वक बाहर कर दिया गया। सभी यूरोपीय उपनिवेशों में अश्वेतों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता था। ये देश गरीब नहीं थे। इन्हें गरीब बनाया गया। साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी शक्तियों ने इन्हें गरीब बनाए रखा, लेकिन हमें अफ्रीकी देशों के स्वतंत्र होने के बाद के रिकॉर्ड पर भी गौर कर लेना चाहिए। इनमें से अधिकांश अपनी जनता का भला नहीं कर पाए हैं। इन देशों को उपनिवेशवादी देशों पर दोषारोपण करते रहने के बजाय अपने हालात सुधारने चाहिए। कई अफ्रीकी देशों में जबर्दस्त भ्रष्टाचार है। सभ्य समाज निष्क्रिय है। विधायक अपना दायित्व ढंग से नहीं निभा रहे हैं। इस कारण उपनिवेशवादी शक्तियां पीछे के रास्ते से इन देशों में फिर प्रवेश कर रही हैं। कैरेबियन और अफ्रीकी देशों में नव-उपनिवेशवाद एक वास्तविकता है।

इन देशों को उठ खडे होना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों की मुख्य धारा में आ जाना चाहिए अन्यथा वे सदा के लिए पराजित हो जाएंगे। विनाशकारी भूकम्प के बाद लूटपाट की घटनाएं तो लगभग सभी जगह होती हैं। अधिकांश देशों में पुलिस, सेना या संयुक्त राष्ट्र की निगरानी टोलियां इन पर जल्दी ही काबू पा लेती हैं। पोर्ट-एन-प्रिंस के निवासियों में से एक तिहाई या तो जान से हाथ धो बैठे हैं या लापता हैं। आदेशों पर अमल कौन सुनिश्चित करेगाक् अस्पतालों में कडी सुरक्षा कौन कर पाएगाक् दवाइयां, खाद और पानी का उचित वितरण कैसे होगाक् कोई नहीं जानता। हिंसा और भुखमरी बढ रही है। अमरीका ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए दस हजार सैनिक हैती भेजे हैं। यह बहुत कठिन काम है।

हैती द्वीप और इसके अभागे निवासियों को जल्दी ही एक और बडी मुसीबत झेलनी पड सकती है। बीमारियां फैलने का अंदेशा है। इसकी चपेट में भी गरीब ही ज्यादा आएंगे। आधुनिक विज्ञान ने बहुत सफलताएं अर्जित की हैं। उसने कई अकल्पनीय आविष्कार किए हैं। भूकम्प विज्ञान हमें भूकम्प की तीव्रता तो बताता है, लेकिन वह अभी तक यह अनुमान नहीं लगा पाता कि किस स्थान पर कितनी तीव्रता का भूकम्प आने वाला है। कभी सुनामी का कहर टूटता है, तो कभी ज्वालामुखी अपने तेवर दिखाता है और कभी आ जाता है विनाशकारी भूकम्प। इनमें से किसी भी आपदा की चेतावनी जारी नहीं होती। प्रकृति की विनाशलीला असीम होती है।

विश्व में सबसे अधिक भूकम्प चीन में आते हैं। भारत भी ऎसे भूकम्पों से अछूता नहीं है। पिछले दशक के प्रारंभ में गुजरात में और उससे पहले लातूर में विनाशकारी भूकम्प आया था। आशा है कि आने वाले दशकों में वैज्ञानिक ऎसी आपदाओं की सटीक भविष्यवाणी कर सकेंगे। लेकिन जब तक ऎसा नहीं होगा, ऎसी आपदाओं से बडे पैमाने पर लोग जान-माल से हाथ धोते रहेंगे।

नटवर सिंह
लेखक पूर्व विदेश मंत्री हैं
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