हमारे गणतंत्र में अनेक अवगुण पैठ गए हैं तो क्या हुआ आशाओं का समुंदर भी तो रूक-रूककर बार-बार हमारी ओर लहरें ला रहा है। उत्साह बरकरार है तो यकीन मानिए, गुणों का विकास होकर रहेगा तंत्र का निजीकरण न हो प्रशांत भूषण देश के जाने-माने अधिवक्ता संविधान में भारत के लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणराज्य और समाजवादी राष्ट्र होने की परिकल्पना थी, लेकिन सबसे बडी समस्या यह है कि समाजवादी भाव खत्म होता जा रहा है। पूंजीवाद हावी होता जा रहा है। राष्ट्रीय संपत्ति का तेजी से निजीकरण हो रहा है। जो प्राकृतिक संसाधन हैं, उनका निजीकरण हो रहा है। बडी-बडी कंपनियां व कॉरपोरेट इस देश को चला रहे हैं। संविधान की कुछ मूल महत्वपूर्ण भावनाएं पीछे छूटती लग रही हैं। चुनाव में सादगी खत्म हो चुकी है। खूब जमकर खर्च हो रहा है। तंत्र या व्यवस्था में बढते पैसे और बढते लालच का ही नतीजा है कि खबरें भी बिक रही हैं। गणतंत्र के लिए मीडिया को बचाना जरूरी है, लेकिन हम देखते हैं कि बडी-बडी कंपनियां विज्ञापनों के जरिये मीडिया पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश में हैं। हमारे समाज में लोगों के बीच विष्ामता बढती जा रही है। खदान माफिया है, व्हाइट कॉलर व ब्लू कॉलर माफिया सक्रिय हैं। ये लोग सांसदों और विधायकों की खरीद-बिक्री करते हैं। सच्चा लोकतंत्र अब कहां रह गया है, उसका तो निजीकरण हो गया है। कई बार मेरी इच्छा होती है कि सत्ता या सरकार को ही नीलाम कर दिया जाए। जिसके पास ज्यादा पैसे हैं, वह खरीद ले सत्ता। कम से कम जनता का एक भ्रम तो टूटेगा। पता तो चलेगा कि देश को वास्तव में कौन चला रहा है। तो कई बार बहुत निराशा होती है। जिस तबके को देश चलाना है, वह या तो भ्रष्ट हो गया है या फिर भ्रष्ट लोगों से घिर गया है। भारत जैसे विकासशील व गरीब देश में तंत्र का जो फायदा गरीबों को होना चाहिए, वह नहीं मिल पा रहा है। यह स्वीकार करना आसान नहीं है। 'वार अगेंस्ट माओइस्ट' क्या है कहीं यह आदिवासियों को उनकी जमीन, जंगल, गांव, घर से बेदखल करने का अभियान तो नहीं है मूल समस्याओं को सुलझाने की कोशिश क्यों नहीं हो रही है क्या बडी कंपनियों के इशारे पर यह अभियान चलाया जा रहा है माओवादियों के खिलाफ अभियान के नाम पर बडी संख्या में निर्दोष आदिवासियों का अहित किया जाएगा। आदिवासियों का एक बडा समाज बहुत लाचार है। उसके पास ताकत नहीं है कि वह केंद्रीय सत्ताओं के फैसलों को बदल सके, उसकी आवाज को अनसुना किया जा रहा है। अपने देश के अंदर ऎसा संघर्ष अच्छे गणतंत्र की निशानी तो कदापि नहीं हो सकती यह कैसा प्रशासन है या कैसी सोच है, इस पर सबको विचार करना चाहिए। गणतंत्र में न्याय व्यवस्था एक अहम हिस्सा है, लेकिन वह भी चरमरा चुकी है। आम आदमी इसकी व्यवस्था में प्रवेश नहीं कर सकता। आम आदमी में इतनी ताकत ही नहीं है कि इस व्यवस्था में आकर मजबूती के साथ न्यायपूर्ण तरीके से अपनी लडाई लड सके। गरीबों के हित या पक्ष में फैसला आने में वर्षोü लग जाते हैं। कई जज अमीरों की वकालत करते हैं या अमीरों के पक्ष में फैसला देते हैं। गरीबों को नजरअंदाज किया जाता है। जज आखिर किस समाज से आते हैं। आमतौर पर जज संपन्न समाज से आते हैं। उन्हें गरीबों के हालात के बारे में पता नहीं होता, अकसर वे संवेदनहीन होकर फैसला करते हैं। गरीब आदमी अमीर की व्यवस्था को समझने में नाकाम हो रहा है और अमीर को गरीब की जीवन व्यवस्था से कोई मतलब नहीं है। मिसाल के लिए, मुंबई में एयरपोर्ट विस्तार का मामला है। दो लाख झुग्गियों को हटाने के प्रयास चल रहे हैं, तीन-चार लाख लोग बेघर हो जाएंगे। इतने लोगों को बेघर करके एयरपोर्ट का विस्तार करने की साजिश है। गरीबों के घर से ज्यादा जरूरी है कि अमीरों की हवाई यात्रा को पहले से ज्यादा सुखद बनाया जाए हमारे लोकतंत्र में गरीबों की उपेक्षा के ऎसे कई उदाहरण मिल जाते हैं। अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अब कोई भी सुधार आसानी से नहीं होगा। सुधार के पक्ष में जनभावना विकसित करना पडेगी। न्यायपालिका में तो धीरे-धीरे जवाबदेही का भाव आ रहा है, लेकिन इस दिशा में सुधार तेजी से होना चाहिए। व्यवस्था में बदलाव जनदबाव से ही आएगा। स्थितियां बहुत निराशाजनक नजर आ रही हैं, लेकिन ऎसा भी नहीं है कि हमारे देश में सुधार नहीं हो सकते। लोकतांत्रिक व्यवस्था में बडे-बडे सुधार करने होंगे। मेरा मानना है, प्रतिनिधि आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था के बजाय प्रत्यक्ष लोकतंत्र वाली व्यवस्था होना चाहिए। लोग खुद मत देकर सीधे फैसला करें कि क्या होना चाहिए और क्या नहीं होना चाहिए। लोग अपने हित में स्वयं कानून बनाएं। लोग ही महत्वपूर्ण फैसले कर उन्हें लागू करना सुनिश्चित करें। प्रत्यक्ष लोकतंत्र में सांसदों और विधायकों की महत्ता कम हो जाएगी। हमारे देश में ऎसा होना चाहिए। जनता जैसा चाहती है, वैसा होना चाहिए।
सहिष्णुता से होगा सुधार अशोक वाजपेयी प्रसिद्ध कवि व आलोचक संसार में लगभग सारे धर्म आक्रामक हो चुके हैं। आस्थाओं के रूप में भले नहीं, लेकिन संगठनों के रूप में आक्रामक हो चुके हैं। असहिष्णु हो चुके हैं। वे स्वयं अपनी बहुलता से इनकार करने लगे हैं। समझ में आता है कि आप दूसरों के प्रति असहिष्णु हों, लेकिन ये तो अपनी ही बहुलता के प्रति असहिष्णु हो रहे हैं। सारे धर्मो से उनका बुनियादी अध्यात्म लगभग गायब या अपदस्थ हो चुका है। ऎसा धर्म गणतंत्र के लिए भी चुनौतियां पेश कर रहा है। हर जगह धार्मिक विघटन और धार्मिक विकृतियां बढ रही हैं। अब धार्मिकता व बाजारू आक्रामकता एक-दूसरे को कोसते रहते हैं। धर्म का जो सत्य है, वह एक जगह है और उसके नाम पर जो व्यवहार हो रहा है, वह दूसरी जगह है और प्रचार करने वाले तीसरी जगह हैं। इन सबको एक तान करके आप कोई सार्वजनिक परिसर बना सकते हैं, ऎसा मुश्किल तो है, लेकिन ऎसा करना अनिवार्य भी है। मेरा मानना है कि अध्यात्म (जो विराट से जुडने की स्वाभाविक आकांक्षा या कामना है) को धर्म के चंगुल से मुक्त कराना चाहिए। ऎसी कोशिश कबीर ने मध्यकाल में की थी। स्वतंत्र अध्यात्म का प्रस्ताव करने की जरूरत है। इसे कबीर ने 'निज ब्रह्म विचार' कहा था। बहरहाल, गणतंत्र के गुणों की बात अगर हम राजनीतिक क्षेत्र से शुरू करें, तो मुख्यत: तीन गुणों की अनिवार्यता है। पहला गुण- एक स्पष्ट, लेकिन परिवर्तन के प्रति खुली हुई मूल्य दृष्टि। दूसरा- जवाबदेही और तीसरा- जिम्मेदारी। दुर्भाग्य से हमारी ज्यादातर राजनीति और लोकतांत्रिक राजनीति तो पिछले पचास-साठ वर्षो के बाद अब प्रबंधन की राजनीति हो गई है। दूसरी ओर उसने सांप्रदायिकता, धार्मिक उन्माद, जातिवाद इत्यादि बुराइयों को बढावा भी दिया है और उनको पुष्ट भी किया है। राजनीति अब लोभ, लालच, प्रपंच आदि का बहुत ही खुला और बेशर्म मंच बन गई है। जब हमारे सांसदों और विधायकों के संपत्ति के विवरण प्रकाशित होते हैं, तो किसी को यह कहने में कोई शर्म नहीं आती कि वह करोडपति है। पर दूसरा पक्ष भी है कि बहुत सारी ऎसी आवाजें और ऎसे लोग हैं, जिनका पहले अधिक से अधिक प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व होता था, अब उनका ठोस प्रतिनिधित्व होने लगा है यानी जो हाशिये वाले लोग हैं, वे भी मुख्यधारा में आ रहे हैं। दलितों और çस्त्रयों को बडी संख्या में प्रतिनिधित्व मिल रहा है। हमारे देश में एक बडी उपलब्धि तो स्वयं लोकतंत्र का बना रहना है। आपातकाल में कुछ समय का अंधेरा छोड दें तो लोकतंत्र लगातार बना हुआ है, जबकि अंग्रेज भी यह मानते थे, दुनिया भी मानती थी कि भारत एक नहीं रह पाएगा। मेघनाद देसाई सही कहते हैं कि धीरे-धीरे भारत ने अपनी विविधता को सहेजने का और उसको लोकतांत्रिक ढांचे में जगह देने का हुनर सीख लिया है। यह अच्छी बात है। रामचंद्र गुहा ने एक दिलचस्प बात आंबेडकर के हवाले से कही है कि लोकतांत्रिक गणतंत्र तो हम बना लेंगे, लेकिन सामाजिक गणतंत्र बनाना कठिन है, लेकिन वह उतना ही जरूरी है, स्वयं राजनीतिक गणतंत्र के बने रहने के लिए भी। हमारा दुर्भाग्य है कि वैसा सामाजिक लोकतंत्र हम नहीं बना पाए हैं। कोशिश तो हुई है, लेकिन वह पूरी तरह से फलीभूत नहीं हुई है। तो हमारे यहां राजनीतिक लोकतंत्र की उपस्थिति और एक सशक्त सामाजिक लोकतंत्र की अनुपस्थिति या कमजोर उपस्थिति के बीच एक द्वंद्व है। हमारे लोकतंत्र की एक और खूबी है। कुल मिलाकर लोकतंत्र ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की, उसको अवसर दिया। तभी दलित साहित्य है। çस्त्रयां बोल रही हैं। जब हम आसपास के देशों को देखें तो उनको यह सुविधा नहीं मिली है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता न होने से वहां विरोधी विचारों को काटा-छांटा या दबाया जाता है। सांस्कृतिक या साहित्यिक क्षेत्र में पहले भी द्वंद्व हमेशा से रहा है, कलाओं में खासकर आभिजात्य और लोकप्रिय के बीच। वह द्वंद्व पिछले अरसे में अधिक तीखा हुआ है। गनीमत यह है कि आभिजात्य के लिए अब भी जगह बची हुई है, लेकिन लोकप्रियता का जो दबाव है, वह भी बढता जाता है। आभिजात्य का अभिप्राय परिष्कार, शास्त्रीयता, जटिलता, सूक्ष्मता व मूल्यों की कद्र से है। इससे कला सुरक्षा होती है, इससे कला की चरितार्थता भी होती है। हमारे यहां सांस्कृतिक जगह बरकरार है। ऎसी बहुत सारी भाषाएं और बोलियां हैं, जिनके बारे में स्पष्टता हमारे सांस्कृतिक परिसर में नहीं थीं, जैसे उत्तर-पूर्व की बोडो, मणिपुरी जैसी भाषाएं हैं, जैसे कोंकणी इत्यादि को लोकतांत्रिक सांस्कृतिक परिसर में स्थान मिला। इधर, एक बडा खतरा बाजार की ओर से भी आ रहा है। हालांकि बाजार के कुछ गुण भी हैं, तो उसे पूरी तरह से ठुकराया नहीं जा सकता। बाजार एक तरह की बराबरी भी ला रहा है। बाजार तब बुरा हो जाता है, जब वह लोकतांत्रिक बहुलता को कोसने के लिए एक प्रकार की तानाशाही को पुष्ट करता है।
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