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शनिवार, 13 मार्च, 2010
मेनन की नियुक्ति के मायने
28 जनवरी 2010, 11:00 hrs IST
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Shiv shankar Menon
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एम.के. नारायणन के स्थान पर विदेश सेवा के अधिकारी रह चुके शिवशंकर मेनन की राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) पद पर नियुक्ति से इस पद की जवाबदेही और कत्तüव्यों के सम्बन्ध में कई प्रश्न उठे हैं। विशेषकर इसकी पृष्ठभूमि में गृहमंत्री चिदम्बरम का यह सुझाव भी है कि आंतरिक सुरक्षा के लिए अलग से एक विभाग होना चाहिए। मूल रूप से एनएसए की भूमिका विभिन्न विभागों से मिली जानकारियों को सम्मिलित कर प्रधानमंत्री और सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति के समक्ष संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करने की थी, ताकि वे आसानी से निर्णय कर सकें। एक बार जब विकल्प तय हो जाए, तो उसके क्रियान्वयन में समन्वय की जिम्मेदारी एनएसए की होती है। एनएसए नीति निर्माता नहीं, समन्वय और नीति समन्वयक का कार्य करता है। वर्ष 1989 तक, जब एनएसए का पद नहीं था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सम्बन्धित मामलों में समन्वय का काम मंत्रिमंडलीय सचिव और प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव संयुक्त रू प से करते थे। इनमें से कुछ तो प्रधानमंत्री के साथ अपने समीकरणों के चलते नीति समन्वयक के बजाय नीति प्रवर्तक बन बैठे।

विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री काल में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे नीतिगत मुद्दों पर समन्वय के लिए एनएसए पद बनाया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक रह चुके एम.के. नारायणन लगभग एक वर्ष तक इस पद पर रहे। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री बनने तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं हुई। वर्ष 1999 में सरकार ने योजना आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष के.सी. पंत की अध्यक्षता में गठित कार्यबल की अनुशंसा पर पूर्ण विकसित राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद रचनातंत्र बनाया।

वाजपेयी ने एनएसए पद बनाने को तो स्वीकृति दे दी, लेकिन इस पद पर अलग से किसी की नियुक्ति के बजाय उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में अपने प्रमुख सचिव ब्ा्रजेश मिश्र को ही एनएसए बना दिया। वाजपेयी और मिश्र के व्यक्तिगत समीकरणों के कारण यह प्रणाली बहुत अच्छी चली, अन्यथा इससे समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

भारत में गुप्तचर एजेंसियों के कामकाज में प्रशासनिक समन्वय मंत्रिमंडलीय सचिव के अंतर्गत होता है, लेकिन परिचालन समन्वय के लिए यह व्यवस्था अनौपचारिक ही होती है। वाजपेयी सरकार ने गुप्तचर प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए वर्ष 2000 में रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग के पूर्व प्रमुख जी.सी. सक्सेना के नेतृत्व में कार्यबल गठित किया था। इस कार्य बल ने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव को ही एनएसए के रू प में कार्य करना चाहिए, जिसे सहज ही स्वीकार कर लिया गया।

मनमोहन सिंह के शासनकाल में वर्ष 2004 में एनएसए और प्रमुख सचिव के पदों को अलग-अलग कर दिया गया। पूर्व विदेश सचिव जे.एन. दीक्षित को एनएसए और एम.के. नारायणन को आंतरिक सुरक्षा सलाहकार नियुक्त किया गया। विदेश नीति निर्माण सम्बन्धी सभी मामलों में प्रधानमंत्री को परामर्श देने के अतिरिक्त दीक्षित ने परिचालन गुप्तचरी समन्वयक का काम भी किया।

आंतरिक सुरक्षा सलाहकार नारायणन का गुप्तचरी समन्वय से कोई लेना-देना नहीं था। दीक्षित के जनवरी 2005 में निधन के बाद नारायणन को एनएसए नियुक्त किया गया। उन्हें आंतरिक और बाह्य सुरक्षा व गुप्तचरी समन्वय से सम्बन्धित सभी मामले सौंपे गए।

तब से ही यह प्रश्न कुछ लोग उठाते रहे हैं कि आंतरिक सुरक्षा मामलों के किसी विशेषज्ञ को विदेश नीति निर्माण से सम्बन्धित मामलों का प्रभार सौंपना बुद्धिमत्तापूर्ण कैसे हो सकता है, क्योंकि विदेश नीति सम्बन्धी मामलों में कूटनीति का अनुभव आवश्यक होता है। बेशक आंतरिक और बाह्य सुरक्षा मामलों के लिए अलग-अलग पेशेवर पृष्ठभूमि, अनुभव और केन्द्र व राज्य स्तर पर नेटवर्किंग की आवश्यकता होती है।

अब प्रश्न उठता है कि क्या- प्रधानमंत्री कार्यालय में एनएसए के साथ ही आंतरिक सुरक्षा के लिए अलग से सलाहकार होना चाहिए। गुप्तचरी समन्वय और सम्बन्धित मामलों के लिए जवाबदेह कौन होगा या अमरीका या çब्ा्रटेन जैसे कई देशों की तरह क्या हमें भी समन्वयक और गुप्तचर सलाहकार अलग-अलग बनाने चाहिए।

पिछले दिनों चिदम्बरम ने तीन बडे परिवर्तन सुझाए हैं। इनमें गृह मंत्रालय को अमरीका के होमलैंड सुरक्षा विभाग की तरह आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार मानने का प्रस्ताव है। इसके अतिरिक्त इस वर्ष के अन्त तक नेशनल काउण्टर टेररिज्म सेंटर (एनसीटीसी) बनाने और वीजा प्रणाली पर नियंत्रण के लिए प्रवासी नियंत्रण उपकरण में आमूलचूल परिवर्तन का भी उन्होंने सुझाव दिया है। डेविड कोलमेन हेडली और तहव्वुर हुसैन राणा को आसानी से वीजा मिल जाने से इसकी कमियां ध्यान में आई थीं। ये दोनों शिकागो में रहते थे और लश्कर-ए-तोएबा से जुडे थे। 26 नवम्बर 2008 को मुंबई पर हुए हमले की तैयारी के सिलसिले में ये दोनों कई बार भारत आए थे।

यदि उक्त परिवर्तन लागू हो गए तो नए एनएसए के पास आंतरिक सुरक्षा और गुप्तचरी समन्वय की जिम्मेदारी नहीं रहेगी, तब वह अधिक प्रभावी तरीके से विदेश सम्बन्धों, चीन के साथ सीमा विवाद, परमाणु समझौते जैसे मुद्दों से निपट सकेंगे। शिवशंकर मेनन के चयन से लगता है कि पी. चिदम्बरम के सुझाव शीघ्र लागू होने वाले हैं। लेकिन ऎसा होने पर आंतरिक सुरक्षा से जुडे मामलों में  समन्वय के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में अपेक्षाकृत कनिष्ठ अधिकारी की नियुक्ति करनी होगी। यह व्यवस्था तब तक संतोषजनक तरीके से चलती रहेगी, जब तक केन्द्रीय गृहमंत्री पद पर योग्य और दृढ व्यक्ति होगा।

यह कहा जा सकता है कि चिदम्बरम के सुझाए आंतरिक सुरक्षा ढांचे में परिवर्तन के प्रस्तावों से एनएसए पर बोझ घटेगा और यदि गुप्तचर प्रणाली के आवश्यकता से अधिक केन्द्रीकरण से बचा गया, तो उसमें निश्चित ही सुधार होगा। साथ ही चीन और पाकिस्तान से जुडे गुप्तचर तंत्र को कमजोर नहीं होने देना होगा।

अफसर करीम
लेखक भारतीय सुरक्षा सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हैं
Comments
Dear Sampadak your editorial on posting of Manon is good and specially on the basic structure as we ...
28 जनवरी 2010, 12:12 hrs IST , by Ghanshyam Upadhyay from Dowani, Kapasan Chittorgarh
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