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सोमवार, 15 मार्च, 2010
सत्ता बांटे रेवडी..
29 जनवरी 2010, 10:46 hrs IST
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इस बार का गणतंत्र दिवस खास था। उम्मीद थी कि इस वर्ष पk पुरस्कार नितांत निरापद रहेंगे, इन पर किसी प्रकार की अंगुली या विवाद नहीं उठेंगे, लेकिन दुर्भाग्य से विगत की भांति इस वष्ाü भी कुछ नामों को लेकर सार्वजनिक विवाद सामने आए हैं। इस वर्ष छह पkविभूषण, 43 पkभूषण और 81 पkश्री की पदवियां देश के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित विशिष्ट व्यक्तियों को दी गई हैं। आरोप लगे हैं कि कतिपय दागी और अयोग्य व्यक्तियों को पुरस्कृत किया गया है। बिहार के जानकी बल्लभ शास्त्री जैसे बडे साहित्यकार, विद्वान ने पkश्री की खुलकर आलोचना भी की है।

उनकी पीडा थी कि उनके शिष्यों को पkविभूषण से नवाजा जा चुका है, लेकिन उन्हें पkश्री दिया गया। पिछले वर्षो में भी उन्होंने इसे लेने से इनकार कर दिया था। फिल्म उद्योग में बीस साल पुराने आमिर खान को पkभूषण दिया गया है, लेकिन भारत की योग्यतम अभिनेत्रियों में शुमार रेखा को निचले स्तर के पk पुरस्कार पkश्री से सम्मानित किया गया है, जो चालीस साल से भी ज्यादा समय से फिल्म उद्योग में सक्रिय हैं। आखिर चयन का पैमाना क्या है संत सिंह चटवाल और सैफ अली खान के चयन का विरोध हो रहा है। मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा भी विरोध कर रही है। लोग अभी भूले नहीं होंगे, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस अमरीका निवासी चिकित्सक को पk सम्मान मिला था, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के घुटने का ऑपरेशन किया था। नि:संदेह, जब शिखर नेताओं की निजी सेवा में रत रहने के लिए पुरस्कार दिए जाते हैं, तो इससे पुरस्कारों की सार्थकता प्रभावित होती है।

प्राय: यह भी देखा गया है कि प्रत्येक सरकार अपनी विचारधारा के आधार पर भी पदवियां देती आई है। कांग्रेस के शासनों में कांग्रेस समर्थित लोगों को पदवियां मिलीं, जबकि भाजपा नेतृत्व वाले शासन में भाजपा से प्रतिबद्ध लोगों को पदवियां दी गई। होना यह चाहिए कि इन पुरस्कारों को वैचारिक, दलीय व निजी प्रतिबद्धताओं से मुक्त रखा जाए।

गौर करने वाली बात है कि वामपंथी और कम्युनिस्ट नेता वैचारिक आधार पर ऎसी पदवियां स्वीकार करने के विरूद्ध रहे हैं।
कुल मिलाकर, इन राष्ट्रीय सम्मानों के प्रति जो सम्मान का भाव होना चाहिए, वह आज धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। इस संदर्भ में पिछले वष्ाü की दुर्भाग्यपूर्ण घटना को याद किया जा सकता है, जब क्रिकेट टीम के कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी और गेंदबाज हरभजन सिंह ने इन सम्मानों के प्रति उदासीनता दिखाई और लेने नहीं गए। जब मीडिया में इन दोनों खिलाडियों की खिंचाई हुई, तो इन्होंने अपने दृष्टिकोण में मजबूरन संशोधन किया। ऎसी घटनाओं से सवाल उठते हैं कि आखिर ये पदवियां या तमगे क्यों दिए जाते हैं। जब इन पुरस्कारों की शुरूआत की गई थी, तब भी निखिल चक्रवर्ती सहित कई विद्वानों ने यह कहकर विरोध किया था कि यह औपनिवेशिककाल की ही विरासत है। सामंती और औपनिवेशिक शासनों में राजसत्ता अपने दरबारियों को विभिन्न पदवियों, उपाधियों से उपकृत करती थी। उदाहरण के लिए, ठिकानेदार, सामंत, सर, लॉर्ड, नाइटहुड जैसी पदवियां सामंती और औपनिवेशिक शासनों की याद दिलाती हैं। लेकिन आज जब हमारा देश लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार कर चुका है, तब इस तरह के सम्मानों की उपादेयता व प्रासंगिकता कितनी है प्रतिभासंपन्न और योग्य व्यक्तियों का सम्मान किया जाना चाहिए। प्रत्येक राजसत्ता से यह आशा भी की जाती है कि वो विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभाशाली व्यक्तियों के प्रति आदरभाव रखे। उनका सम्मान करे, लेकिन इस प्रक्रिया में यह देखा जाना जरूरी है कि जिनका सम्मान किया जा रहा है, उनमें पात्रता है या नहीं। क्या इसमें यह देखा जाना आवश्यक नहीं है कि जो राजसत्ता के विरोध में होते हैं और प्रतिरोध के प्रतीक हैं, क्या वे सम्मानित नहीं होने चाहिए अगर हिन्दी साहित्य व पत्रकारिता का ही उदाहरण लें, तो  इसमें अधिकांशत: उन्हीं व्यक्तियों को पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जो प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से सरकार समर्थक रहे हैं। जो सरकार को प्रिय नहीं, उसकी उपेक्षा होती है। इसी संदर्भ में डॉक्टर नामवर सिंह, नागार्जुन इत्यादि कई बडे नाम याद आते हैं, इसके विपरीत ऎसे कई लेखकों को पkश्री से नवाजा जा चुका है, जो इनके समकक्ष कहीं आस-पास दिखाई नहीं देते हैं। अन्य क्षेत्रों के बारे में भी ऎसे ही सवाल उठते रहे हैं। एक और बात, इन पुरस्कारों में केवल पदवी होती है, कोई राशि नहीं होती। इसको आप लगा भी नहीं सकते हैं, लेकिन छुटभैय्ये लोग नाम के साथ पkश्री लिखते हैं।

प्रश्न यह है कि इन पदवियों के चयन व वितरण की प्रक्रिया को निरापद कैसे बनाया जाए। अभी तक किसी को ज्ञात नहीं है कि इन पदवियों के लिए व्यक्तियों का चयन कैसे किया जाता है। बेहतर यह है कि चयन प्रक्रिया को अधिकाधिक लोकतांत्रिक व पारदर्शी बनाया जाए, ना कि नेताओं और नौकरशाहों की स्वेच्छाचारिता पर छोड दिया जाए। जहां तक मेरी जानकारी है, बडे मंत्री नेता और विभिन्न विभागों के नौकरशाहों और निचले स्तर के बाबू लोग अपने-अपने ढंग से नामों का चयन करते हैं। विशेष रूप से पkश्री के मामले में जो कसौटियां निर्धारित की गई हैं, उनका पालन नहीं किया जाता है। जब नामों की घोषणा हो जाती है, तब पता चलता है कि कसौटियों का उल्लंघन किस प्रकार किया गया। सरकार को चाहिए कि इन विवादों से बचने के लिए विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित समितियां केन्द्र और राज्य स्तर पर स्थापित करे। दोनों की एक शिखर समिति हो, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित प्रतिष्ठित व्यक्ति, विशेषज्ञ और सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि रहें। आज जब सूचना अधिकार का युग है, तो ऎसे में सवाल किए ही जाएंगे कि अमुक व्यक्ति का चयन किस आधार पर किया गया। अत: सरकार को अपनी साफ-सुथरी छवि बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि वह इस प्रक्रिया को अभी से पारदर्शी बनाए। इसमें लेखकों, संस्कृति कर्मियों, पत्रकारों, कलाकारों व्यवसायियों आदि से संबंधित संगठनों व संस्थाओं से भी सहयोग ले, जिससे कि ये कवायद संपूर्ण रूप से निरापद रहे। पk पुरस्कारों के स्तर को बचाना ही होगा, वर्ना ये पदवियां एक रस्म अदायगी और वाहवाही लूटने के अलावा कुछ अधिक सिद्ध नहीं होंगी।

रामशरण जोशी
लेखक जाने-माने पत्रकार व
समाज विज्ञानी हैं
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