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नेता मिलकर राह निकालें
Saturday, 02 Mar 2013 11:15:49 hrs IST

देश की अखंडता और आम जन की सुरक्षा ऎसे मुद्दे हैं, जिन पर राजनीतिक स्वार्थ कतई हावी नहीं होना चाहिए। और, दुर्भाग्यवश, आतंकवाद की मार अधिकतम आम जन पर ही पड़ती है। राजनीतिक पैंतरेबाजी अतिघातक भी हो सकती है, यह श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या ने सिद्ध कर दिया। ज्ञानी जैल सिंह को इंदिरा गांधी ने 1980 में गृह मंत्री नियुक्त किया खास कर इसलिए कि वे पंजाब में अकालियों के विरोध में एक प्रतिकूल तबका खड़ा करने में उनका सहयोग करें। ज्ञानी जैल सिंह का कार्यकाल नाकामयाबियों से भरपूर रहा, जिसमें खालिस्तान रूपी अलगाववाद का पुख्ता होना सबसे अहम था।

मैं उन दिनों सीबीआई में उप-महानिरीक्षक के पद पर आतंकवाद सम्बंधी मुकदमों की देखरेख में कार्यरत था। इसी दौरान 24 अप्रेल 1980 को निरंकारी बाबा की दिल्ली में हत्या हुई और यह कयास था कि धर्मगुरू संत भिंडरावाले इस काण्ड के प्रणेता थे, क्योंकि उससे पहले उनके पंथ और निरंकारियों में कई झड़पें हो चुकी थीं। हत्या के बाद दिल्ली में धारा 144 (दंड प्रक्रिया संहिता) लागू कर दी गई, जिसके तहत पांच या उससे ज्यादा लोगों के एकत्रित होने पर मनाही थी। इसके बावजूद भिंडरावाले के हथियारबंद दल को दिल्ली में गृह मंत्रालय के आदेश के अंतर्गत बेरोकटोक आने दिया गया। आदि से अंत तक मामला इतना बिगड़ा कि ऑपरेशन ब्लू स्टार में भिंडरावाले का अंत हुआ, जिसकी दुखद इति इंदिरा गांधी की हत्या में हुई।

बहरहाल, ज्ञानी जैल सिंह के गृह मंत्री कार्यकाल के दो साल नकारात्मक असफलता से परिपूर्ण रहे व उसके पुरस्कार स्वरूप उन्हें राष्ट्रपति के ओहदे से सुशोभित कर दिया गया, जिस पद को उन्होंने बड़े आदर भाव से यह कहकर स्वीकार किया, 'यदि मेरी नेता मुझसे झाडू लगाने के लिए भी कहतीं, तो मैं ऎसा करता।' हमारे वर्तमान गृह मंत्री भी जहां तक चरम राजभक्ति का सवाल है, कुछ ऎसी ही मिट्टी के बने दिखते हैं। जब एक प्रख्यात टी वी पत्रकार ने उनसे पूछा कि क्या उनको इस पद पर इसलिए ही बैठाया गया है कि वे आंख बंद कर 10 जनपथ के निर्देशों का पालन करेंगे, तो उनका बेहिचक जवाब था, 'मैं आज जो कुछ भी हूं, वह सोनिया जी की बदौलत हूं।

वो मुझसे जो कुछ भी कहेंगी, मैं करूंगा।' अत: उन्हें बेढंगी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने की और नाकामियों से लैस होने के लिए ढाल मिल गई है, ऎसा प्रतीत होता है। तभी तो वे दुष्कर्म विरोधी रैली के सदस्यों को माओवादियों की संज्ञा देने में नहीं कतराए। जब उनसे पूछा गया कि वे फौरन हैदराबाद क्यों नहीं गए, तो वे बोले, 'मैं रात भर टी वी देखता रहा।' क्या इस जवाब को तुरंत घटनास्थल पर जाकर स्थिति का जायजा न लेने की माकूल प्रतिक्रिया कहा जा सकता है? कांग्रेस के चिंतन शिविर के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भगवा (हिन्दू) आतंकवाद का अड्डा बता दिया और बाद में उतनी ही बेफिक्री से अपने इलजाम वापस ले लिए। निष्क्रियता का एक चिरपरिचित बहाना है, जो उन्होंने अख्तियार किया है, वह यह कि एनसीटीसी (राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधी केंद्र) का गठन हो जाता, तो हमें आतंकवाद रोकने का एक कारगर औजार मिल जाता। इशारा है, विपक्ष का इस संस्था के खिलाफ प्रतिरोध। शिंदे की इन युक्तियों के परिपेक्ष्य में क्या वे आशा कर सकते हैं कि विपक्ष और अन्य राज्य, खासकर भाजपा शासित राज्य, एनसीटीसी के गठन की स्वीकृति दे देंगे? 

इस सन्दर्भ में अजीत डोभाल, पूर्व आईबी (केन्द्रीय खुफिया ब्यूरो) निदेशक का एक अंग्रेजी दैनिक में लेख महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि 2007 के बाद आतंकी हमलों की पुनरावृत्ति से कई सौ जानें गई हैं और दु:ख की बात यह है कि आतंक के राजनीतिकरण ने इस खतरे  से लड़ने की ताकत को केवल कमजोर ही किया है। उन्होंने तीन खास बातों पर जोर दिया है। एक - आतंकवाद को राजनीतिक रंग नहीं दिया जाए। दो यह कि एनसीटीसी (राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधी केंद्र) स्थापित होने में देर न हो और तीसरा यह कि अमरीका में 9/11 काण्ड के बाद एनसीटीसी आतंकी कहर की रोकथाम में बहुत कारगर सिद्ध हुई है। देखा जाए, तो ये तीनों मुद्दे एक दूजे पर निर्भर हैं। मैं सर्वप्रथम अमरीका के इस कानून और हमारे प्रस्तावित कानून की रूपरेखा की ओर ध्यान आकर्षित करना मुनासिब समझता हूं।

उस देश की एनसीटीसी खुफिया विभाग के तहत होते हुए भी स्वायत्त है। और उसका कार्य अन्य खुफिया एजेंसियों की सूचनाओं को एकत्रित कर आकलन करना और विभिन्न एजेसियों में समन्वय स्थापित करना है। जबकि हमारी प्रस्तावित एनसीटीसी गृह मंत्रालय की मातहती में आईबी के माध्यम से काम करेगी तथा सूचना एकत्रित करने के अलावा इस संस्था को अनुसंधान, तलाशी, गिरफ्तारी करने का अधिकार भी सौंपने का इरादा है। केन्द्र सरकार को राज्य सरकारों को भरोसा दिलाना होगा कि राज्यों के अघिकार में हस्तक्षेप का कोई इरादा नहीं है और यह तभी हो सकता है, जब अनुसंधान आदि का कार्य राष्ट्रीय अनुसंधान एजेसी (एन आई ए)/ सीबीआई पर छोड़ दिया जाए, संघीय अपराधों में इन एजेंसियों को क्षेत्राधिकार की बंदिश के बिना कार्य करने की (एफबीआई की तरह) अनुमति दी जाए। मूलत: बीच का रास्ता निकाला जाए, जिससे सांप भी मरे और लाठी भी ना टूटे।

अमरीका की मिसाल हम लेते हैं, तो यह समझना जरूरी है कि उस देश की अक्षुणता को पक्ष व विपक्ष ने सर्वोपरि रखकर आतंकवाद की चुनौती का संयुक्त रूप से सामना करने की ठानी। हमारा दुर्भाग्य यह है कि हर किसी समस्या को हमारे नेता राजनीतिक स्वार्थ से आंकते हैं और एक दूसरे पर दोष मढ़ने की पैंतरेबाजी में मशगूल हो जाते हैं और इच्छाशक्ति की कमी के कारण सरकार देशहित में भी कोई कठोर कदम नहीं उठा पाती है। समय आ गया है कि बयानबाजी को तिलांजली देकर एकजुट होकर समस्या का समाधान किया जाए। हालांकि भाजपा नेता वेंकैया नायडु के कथित अभिशाप, गृह मंत्री जहन्नुम में जाएं, से समझौते की डगर और भी कांटों भरी हो गई है।

राजेन्द्र शेखर
सीबीआई के पूर्व निदेशक

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