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मुल्क का मिजाज समझें मोदी
Monday, 04 Mar 2013 9:55:51 hrs IST

लग रहा है कि दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में भगवा रंग के भाजपा झंडों और दिग्गज नेताओं के हुजूम के बीच प्लेयर फिल्म का एक गाना चल रहा है-   
जिस जगह पे खतम सबकी बात होती है,
उस जगह पे हमारी शुरूआत होती है ।।
 पार्टी के नंबर वन हीरो बनने की कतार में सबसे आगे खड़े नरेन्द्र मोदी का भाषण खत्म हुआ, तो तालियां रूकने का नाम नहीं ले रही थीं, लेकिन लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने अपने भाषण की शुरूआत में कहा कि 'मैं वहां से बात शुरू करना चाहती हूं, जहां मोदी जी ने अपना भाषण खत्म किया है।' मैं इस लाईन के राजनीतिक मायने निकालने की बात नहीं कर रहा, लेकिन क्या सुषमा स्वराज ये तो नहीं जताने की कोशिश कर रही थीं कि उनकी सोच वहां से शुरू होती है, जहां पर विकास पुरूष के नए-नए मॉडल बने नरेन्द्र मोदी की सोच खत्म होती है। उसे आगे बढ़ाया लालकृष्ण आडवाणी ने, जब उन्होंने कहा कि सुषमा जी के भाषण के बाद अब किसी भाषण की जरूरत ही नहीं बची।

भाजपा की बैठक में तीन दिन से मोदी के नाम की तालियां बज रही थीं। बैठक के बाहर तो कुछ उत्साही नेता बैठक के अंदर भी मोदी के पोस्टर दिखाते रहे। पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने जब मोदी की तीसरी बार जीत को ऎतिहासिक जीत बताया और सबसे उनके अभिवादन के लिए खड़े होने को कहा, तो ऑडिटोरियम में देर तक तालियां बजती रहीं। बैठक के आयोजक और दिल्ली के पार्टी अध्यक्ष विजय गोयल ने मोदी के सामने लगभग समर्पण ही कर दिया। उन्होंने कहा कि हर कोई मोदी को पीएम के तौर पर देख रहा है, भले ही उनके नाम का ऎलान नहीं किया गया हो। वहीं बहुत से लोग ऎसे भी थे, जो सवाल पूछ रहे थे कि मोदी के नाम का ऎलान क्यों नहीं किया गया? क्यों देर की जा रही है या फिर क्या वजह है कि ऎलान नहीं हो रहा?

 ऑडिटोरियम में से कहीं पत्थर नहीं आ रहे थे, मोदी के नाम की गूंज तो थी, लेकिन क्यों एक अनजाना सा डर निगाहों को घेरे जा रहा था। क्यों खुद के साथ के लोगों पर भरोसा नहीं हो पा रहा। अब तो भाजपा अध्यक्ष ने खुद मुहर लगा दी है मोदी के नाम पर, फिर भी ऎलान नहीं। गुजरात के चुनावों में लगातार तीसरी बार जीत कर मोदी ने हैट्रिक बना ली है और कोई शक नहीं कि वो इस सम्मान को हासिल करने वाले भाजपा के पहले नेता होंगे। और लगातार 11 साल से मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड भी भाजपा में किसी के पास फिलहाल नहीं है। किसी को इस बात पर भी सवाल करने की जरूरत महसूस नहीं कि मोदी भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।

फिलहाल उनकी लोकप्रियता का ग्राफ भी लगातार बढ़ रहा है। कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के मुकाबले भी देखा जाए, तो ज्यादातर राजनीतिक जानकार मोदी का ही नंबर ऊपर मानते हैं। ज्यादातर लोग गुजरात के हाल के चुनावों से पहले ही ये कयास लगाने लगे थे कि उन चुनावों में तीसरी बार जीतने के बाद मोदी दिल्ली की ओर रूख करेंगे। हालांकि पार्टी में तब कई दिग्गज नेता उनकी ट्रेन को दिल्ली आने से रोकने के लिए सोच रहे थे कि यदि उनकी बड़ी जीत नहीं हुई, तो उन्हें इस बहाने से रोका जा सकेगा, लेकिन मोदी एक बड़ी जीत के साथ लौटे। अब उन दिग्गज नेताओं के पास तर्क ये है कि इस साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों में मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह तीसरी बार सरकार बना सकते हैं।

उस वक्त मोदी ऎसे अकेले नेता नहीं होंगे, तो फिर अभी उनके नाम के ऎलान की जल्दी क्यों? हो सकता है कि यह एक बड़ी वजह हो कि मोदी अपने नाम का ऎलान करवाने की जल्दी में हों, लेकिन क्या तीसरी बार चुनाव जीतना ही एक दायरा हो सकता है। अगर ऎसा है, तो फिर कांग्रेस को दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को पीएम पद का दावेदार बनाना चाहिए, क्योंकि उनका तीसरा कार्यकाल भी खत्म होने को है। यानी सिर्फ वो दायरा नहीं हो सकता, तो क्या ये माना जाए कि मोदी देश में भाजपा के सबसे लोकप्रिय नेता हैं।

 दिल्ली में चौकड़ी जमाए नेताओं का कद उनके सामने बौना हो गया है। क्या पार्टी ने ये मान लिया है कि अब बुजुर्गवार नेता आडवाणी के दिन लद गए हैं और उन्हें राजनीतिक संन्यास लेने की समझदारी दिखानी चाहिए, लेकिन क्या आडवाणी संन्यास की तैयारी में हैं।  ऎसा फिलहाल तो नहीं लगता। बल्कि कुछ लोगों का मानना है कि आडवाणी उस दिन का इंतजार कर रहे हैं कि जब भाजपा या एनडीए को सरकार बनाने का मौका मिले और फिर मोदी के मुकाबले उन्हें ज्यादा सेक्यूलर लीडर के तौर पर स्वीकार कर  लिया जाए। वैसे इस राजनीतिक संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता।

शायद यही वजह रही हो कि आडवाणी भाजपा की सरकार के बजाय एनडीए प्लस की सरकार की बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा में भले ही मोदी सबसे लोकप्रिय हो जाएं, लेकिन यदि एनडीए की सरकार बनने की बारी आएगी, तो फिर लिस्ट में उनके अलावा कोई नाम सबसे ऊपर नहीं हो सकता। पिछली एनडीए सरकार में आडवाणी उप प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं और करीब दो दर्जन राजनीतिक सहयोगी दलों ने उस वक्त कोई ऎतराज उनके नाम पर नहीं जताया था। आडवाणी की वरिष्ठता और राजनीतिक समझदारी पर भी शायद ही कोई सवाल करे, इसलिए वे संन्यास की तैयारी में नहीं दिखते और भाजपा में गडकरी को हटा कर राजनाथ सिंह को अध्यक्ष बनाने पर उन्होंने अपनी सहमति जाहिर की थी। संघ परिवार को भी लगता है कि आडवाणी के सक्रिय रहने से जरूरत पर उनका उपयोग किया जा सकता है। हालांकि भाजपा ने पिछले चुनावों में आडवाणी को नेतृत्व का मौका दे दिया था और वो सरकार बनाने में नाकाम रहे थे।

भाजपा की बैठक में मोदी के भाषण में गुजरात के विकास, उनकी जीत और केन्द्र सरकार की खामियों का जिक्र था यानी सिर्फ मोदीमय। लेकिन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने मध्यप्रदेश सरकार के कामकाज का जिक्र तो किया, साथ ही गुजरात, छत्तीसगढ़ और गोवा में भाजपा सरकारों के कामकाज का भी बखान भी किया। मतलब सबको साथ लेकर चलने की एक कोशिश। सुषमा स्वराज ने अपने भाषण में पार्टी की जीत और हार दोनों का जिक्र किया, वो भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं दोनों के लिए सबक हो सकता है। भाजपा को 2004 की अपनी उस हार को याद करना चाहिए, जब वो 'शाइनिंग इंडिया' के नारे के साथ अपनी वापसी के लिए आश्वस्त थी। आडवाणी तब अक्सर अपनी चुनावी सभाओं में कहा करते थे, 'हमारी जीत को लेकर, तो विपक्ष में बैठी कांग्रेस को भी  कोई संशय नहीं है, हम जीत का फासला बढ़ाना चाहते हैं।' लेकिन इस जोश की वजह से भाजपा का कार्यकर्ता  पोलिंग बूथ पर वोटर को नहीं पहुंचा पाया।

 एक बात और, 1990 में राम रथयात्रा के बाद देश भर में एक अलग किस्म का माहौल था। आडवाणी लोकप्रियता के ग्राफ में सबसे ऊपर थे। उसके बावजूद 1991 में  भाजपा को सरकार बनाने का मौका नहीं मिल पाया। 1992 में बाबरी  मस्जिद गिराए जाने के बाद जिन भाजपा शासित राज्यों में चुनाव हुए, वहां भी उसे कोई भारी सफलता नहीं मिली। 1998 और 1999 के चुनावों में भी भाजपा को इतनी सीटें नहीं मिल पाई कि वो अपने दम पर सरकार बना सके। आज वाजपेयी जैसा सेक्यूलर चेहरा भी भाजपा के पास नहीं है। आडवाणी की 1990 की लोकप्रियता के ग्राफ और मोदी के आज के ग्राफ और नतीजों की तुलना करके पार्टी कई सबक सीख सकती है।

आडवाणी ने जिस तरह से एनडीए प्लस की पैरवी की है, उसका मतलब साफ है कि अगले चुनाव में भाजपा के अपने दम पर अकेले सरकार बनाने की संभावना नहीं दिखती। जरूरी है कि एनडीए के कुनबे को चुनावों से पहले ही बढ़ाया जाए। लेकिन क्या वो बिना किसी सेक्यूलर इमेज वाले नेता के मुमकिन होगा और मोदी को सेक्यूलर नेता के तौर पर मंजूर करना मुमकिन नहीं लगता। खासतौर से मोदी की सद्भावना यात्रा के दौरान उनका एक मुस्लिम धार्मिक नेता से टोपी नहीं पहनने की तस्वीर सबको याद होगी। फिर गुजरात चुनावों में एक भी मुसलमान को टिकट नहीं देना किस बात का संकेत करता है।

देवबंद के वाइस चांसलर रहे गुलाम वस्तानवी को सिर्फ इस वजह से कुर्सी छोड़नी पड़ी थी कि उन्होंने मोदी के राजकाज की तारीफ कर दी थी। अब तो वे भी उनकी आलोचना कर रहे हैं। पिछले दिनों मुस्लिम लीग के नेता और सांसद असद्दुद्दीन औवेसी से मुलाकात हुई थी, तो उनका कहना था कि देश का मुसलमान किसी भी हालत में मोदी को वजीरे आजम कबूल नहीं करेगा। जब मैंने सवाल किया कि जम्हूरियत का मतलब बहुमत से है तो, उन्होंने जवाब दिया कि हम मोदी को वजीरे आजम बनने से भले ही नहीं रोक सकते हों, लेकिन कबूल नहीं करने का हक तो हमारे पास बना रहेगा।

सवाल ये है कि क्या मोदी मुसलमानों में अपनी छवि बदलना चाहते हैं। भाजपा की बैठक में एक बदलाव मोदी ने ये किया कि अब तक 6 करोड़ गुजरातियों की अस्मिता की बात करने वाले नेता ने पहली बार सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों की बात की। लेकिन मोदी को ये भी याद रखना चाहिए कि गुजरात में भले ही वो मुसलमानों की आबादी को नजरअंदाज कर तीसरी बार सरकार में बैठे हों, लेकिन पूरे हिंदुस्तान में 15 करोड़ से ज्यादा मुसलमानों को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं होगा।  मुनव्वर राणा का एक शेर याद आ रहा है कि-
सियासत किस हुनरमंदी से सच्चाई छिपाती है ,कि जैसे सिसकियों का जख्म शहनाई छिपाती है।

हो सकता है कि मोदी के गुजरात में विकास के दावों में दम हो लेकिन गुजरात दंगों में मारे गए लोगों के परिवार जनों की तकलीफ और बेघर हो गए लोगों की परेशानी को समझने की जरूरत है। यदि मोदी वाकई विकास पुरूष हैं, तो फिर उन्हें देश की सत्ता संभालने का मौका मिलना चाहिए। लेकिन क्या ये उनका फर्ज नहीं बनता कि वो सभी में भरोसा पैदा करने की कोशिश करें। जम्हूरियत का सच भले ही ये हो कि बहुमत का फैसला ही चलता है, लेकिन जम्हूरियत का असली मतलब, उस मुल्क की अल्पसंख्यक आबादी में ये भरोसा कायम करना है कि वो बहुमत के फैसले के बावजूद महफूज है। गांधीजी ने कहा था- लोकराज में लोकलाज जरूरी है। जिस तरह अमिताभ बच्चन गुजरात में कुछ दिन गुजारने की बात करते हैं, उसी तरह मोदी को चाहिए कि वे अब मुल्क की खुशबू, उसके मिजाज को समझने के लिए कुछ दिन हिंदुस्तान में गुजारें। तब शायद उन्हें फर्क महसूस होगा कि गुजरात और हिंदुस्तान का मिजाज एक जैसा नहीं है। उसमें अलग-अलग तरह के रंग बिखरे हुए हैं और खुशबू में पसीने की महक है, सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों की। उन्हें गुजरात की तरह सवा सौ करोड़ हिंदुस्तानियों की अस्मिता को समझने की जरूरत है। ये मुल्क खुद काबिल है अपनी अस्मिता की चिंता करने के लिए। 

दिल्ली के सिनेमाघरों में एक फिल्म चल रही है - काई पो चे। चेतन भगत के उपन्यास पर बनी ये फिल्म गुजरात की पृष्ठभूमि पर है। उसमें गुजराती रंग बिखरे हुए हैं। ईशान से  क्रिकेट सीखता छोटा सा छोकरा अली पतंग काट कर चिल्ला रहा है- काई पो चे। गुजरात का भूकंप ईशान और गोविंद के सपनों को तोड़ता हुआ और उसके बाद गोधरा की जलती हुई ट्रेन और फिर गुजरात के दंगों से गुजरती फिल्म में हिंदू पार्टी का ओमकार अली पर हमला बोलते-बोलते अपने सबसे अजीज दोस्त ईशान को गोली मार देता है। फिल्म के आखिरी सीन में भारत और ऑस्ट्रेलिया के मैच में अली पहली ही गेंद पर ऑफ साइड में चौका मार रहा है और मैच देख रही ईशान की बहन विद्या के पास बैठा ओमकार माफी मांग रहा है।

ये लोग पांव नहीं जेहन से अपाहिज हैं,
उधर चलेंगे जिधर रहनुमा चलाता है ।
दोस्तों से मुलाकात के नाम पर,
नीम की पत्तियां चबाया करो।

विजय त्रिवेदी
पत्रिका समूह से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार

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