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मजबूर सरकार, लाचार बजट
Tuesday, 05 Mar 2013 10:46:09 hrs IST

चौंकाने वाले घोटालों, नीतिगत कमजोरी और राजनीतिक कुप्रबंधन (जिसके चलते अर्थव्यवस्था की बर्बादी हो रही है) में नौ साल लम्बा वक्त गंवाने के बाद आम बजट से उम्मीद, उत्साह और नीतियों में सुधार की अपेक्षा रखना मूर्खतापूर्ण ही होता। बेलगाम महंगाई, उच्च ब्याज दर और नदारद विकास दर से गंभीर रूप से पीडित होने के दौर में रेल बजट और यूपीए के वित्त मंत्री का चुनाव पूर्व बजट कांग्रेस पार्टी और उसके चुनावी प्रबंधकों के सहयोग से तैयार किया जाना स्वाभाविक था। प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री स्वर्गीय नानी पाल्खीवाला बजट से गोपनीयता के पर्दे को हटाने और पूरी प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी बनाने की वकालत करते रहे हैं, शुक्र है कि अब जाकर यह हो गया है।

शुरूआती दौर की तरह अब ऎसा नहीं है कि जब बड़े उद्योगपति गुपचुप एक्साइज/कस्टम रेग्युलेशन में संशोधन करा लेते थे, एनडीए के काल में बजट अर्थव्यवस्था की दिशा को प्रभावित करने वाला, ग्रोथ के लिए ईंधन और महंगाई को नियंत्रित करने का उपकरण बन गया।
एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के नेतृत्व में साल-दर-साल बजट का महत्व कम होता चला गया है। सालभर  सुधारों और संशोधनों को अंजाम दिया जाता रहा है। बजट में संकटों से निपटने, राष्ट्रीय विकास और कल्याण को पूरा करने की आकांक्षा, अर्थव्यवस्था में असंशोधन और सरकार की अनिवार्यताओं को सम्बोधित करने के तमाम उपाय होते हैं।

इस साल के बजट पर यूपीए सरकार का अंतिम बजट होने का भी दबाव था। दुर्भाग्यवश, मौजूदा यूपीए सरकार ने, अपने पिछले बजटों के दौरान, अपनी नीति निर्माण में वास्तविक अर्थव्यवस्था की बजाय राजनीतिक अर्थव्यवस्था को तरजीह दी है। परिणामस्वरूप न केवल अर्थव्यवस्था, बल्कि आम आदमी ने भी बुरी तरह कष्ट झेला है। अर्थव्यवस्था में तेजी से आई गिरावट और अगले साल चुनाव होने के चलते, इस बजट से पॉपुलिस्ट या लोकलुभावन योजनाओं में धन बहाने की बजाय वित्तीय संतुलन कायम कर अर्थव्यवस्था को फिर से ट्रैक पर लाकर इसमें विश्वास पैदा करने की उम्मीद थी।

हमारी आर्थिक बुनियाद में आ रही खतरनाक गिरावट, एक दशक में सबसे कम ग्रोथ रेट, लगातार बढ़ती बेलगाम महंगाई, नीतिगत लकवा (पॉलिसी पैरालिसिस) के चलते अटके पड़े बड़े प्रोजेक्ट्स, नए निवेश में ठहराव, निर्यात में गिरावट के कारण चालू खाता घाटा की उच्च दर, विकास रोधी इंफ्रास्ट्रक्चर ढांचे में भारी अंतर आदि के कारण निवेशकों का विश्वास डिगा है। कमजोर होती आर्थिक हालत और प्रशासनिक निर्बलता, निचले स्तर की रिश्वतखोरी से लेकर उच्च स्तर तक भारी भ्रष्टाचार की मौजूदा स्थितियों के मद्देनजर हमें यह जानने के लिए किसी अर्थशास्त्री की जरूरत नहीं है कि हमारी अर्थव्यवस्था खतरे में है। वित्त मंत्री के कठिन हालात ने उद्योगों को नए प्रोजेक्ट्स शुरू करने से रोका है।

साथ में एक कमजोर प्रधानमंत्री के नेतृत्व में कठोर गठबंधन ने भारत की परेशानियां बढ़ाई हैं और अर्थव्यवस्था की राह में रोड़े अटकाने का काम किया है। विडंबना यह है कि एक ओर अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है और विकास की राह धुंधली है, फिर भी भारत निवेशकों के लिए पसंदीदा जगह बना हुआ है। निवेशकों को भरोसा है कि भारत अपनी क्षमता के अनुरूप फिर से अपनी विकास दर हासिल कर लेगा, लेकिन चुनाव सिर पर हैं और कांग्रेस की लोकप्रियता बहुत तेजी से घटी है। ऎसे में, रेलवे मंत्री और वित्त मंत्री मजबूर होंगे कि वे तमाम खतरनाक संकेतों को अनदेखा करते हुए वोटरों को लुभाने के लिए लोकलुभावन योजनाओं को जारी रखें। यानी यथास्थिति कायम रखने पर ही जोर दिया गया। अर्थव्यवस्था इस वक्त दशक की सबसे कम रफ्तार से आगे बढ़ रही है। 2002-03 तक जो विकास दर औसतन 8.5 फीसद रही, वह 2010-11 के बाद लगातार गिरावट के साथ आज आईसीयू की हालत में है।

एनडीए के शासन में जो आर्थिक गति पैदा हुई थी, जिसके चलते 2009 तक औसतन ग्रॉस फिक्सड कैपिटल फोरमेशन (जीएफसीएफ) 13.2 फीसद रही, इसके साथ में सकल घरेलू  उत्पाद विकास दर में भी बढ़ोतरी हुई। लेकिन यूपीए-2 के कार्यकाल के दौरान ये सारे आंकड़े उलट हो गए। जीएफसीएफ 2011-12 के दौरान महज 4.4 फीसद की दर से बढ़ पाया और मौजूदा वित्तीय वर्ष के लिए 2.5 फीसद अनुमानित था। यानी जीडीपी ग्रोथ रेट से भी कम। इस वक्त अर्थव्यवस्था की तरक्की के लिए मूलभूत ढांचे को सुधारने की सख्त जरूरत है। इसके साथ आय और रोजगार पैदा करना होगा, जिसके चलते उपभोग बढ़ेगा और विकास की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। मौजूदा चालू घाटा जीडीपी के पांच फीसद से भी ऊपर है। इससे भी बड़ा खतरा व्यापार घाटा रहा है, जो 2011-12 में 189 अरब डॉलर के साथ जीडीपी के 10.3 फीसद तक पहुंच गया था। इस साल जनवरी 2013 तक यह 170 अरब डॉलर हो चुका है और मार्च अंत तक इसके 200 अरब डॉलर को पार कर जाने की आशंका है। जिसका मतलब है कि यह जीडीपी का 11 फीसद हो जाएगा।

 देश अपने उत्पादन से ज्यादा, खासतौर पर तेल और सोना, उपभोग कर रहा है, जो कि सीधे तौर पर खतरनाक स्थिति है। दुख की बात यह है कि बजट में इस आसन्न खतरे पर चुप्पी साधी गई है। वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने खराब अर्थव्यवस्था और अच्छी राजनीति के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है। सुपर रिच पर टोकन रूपी सरचार्ज लगाना इसका उदाहरण है। अर्थव्यवस्था के लिए उनका राजस्व अनुमान काफी नहीं है। पिछले वर्षो की तरह इस बार भी यूपीए के बजट में अनुमानित सब्सिडी वास्तविक आंकड़ों से कम है। लिहाजा अघोषित राजस्व घाटे पर पर्दा डाला जा रहा है। बजट में आंकड़ों की बाजीगरी की गई है। राजनीतिक विवशता और फिजूलखर्ची के चलते अगले वित्तीय वर्ष के लिए राजस्व घाटे को जीडीपी के 4.8 तक लाना मुश्किल है। लेकिन परवाह किसे है? खैर, वित्त मंत्री और देश को पता है कि कांग्रेस और यूपीए के लिए आगे की राह बंद है।

शेषाद्री चारी
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य व विदेशी मामलों की सेल के राष्ट्रीय संयोजक

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