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अस्थिरता के दौर में बांग्लादेश
Wednesday, 06 Mar 2013 9:13:11 hrs IST

भारत के राष्ट्रपति का बांग्लादेश दौरा असाधारण परिस्थितियों में हुआ है और इस बहाने ही सही, हम अपने संवेदनशील पड़ोस के बारे में गम्भीरता से सोचने को मजबूर हुए हैं। जब शाही मेहमान ढाका में थे, तब उस शहर का जन-जीवन विपक्ष की हड़ताल की हुंकार की चपेट में अस्त-व्यस्त था। जमाते-इस्लामी ने जिस 'बंद' का आ±वान किया था, वह खासा असरदार रहा- जहां प्रणब बाबू ठहराए गए थे, उस जगह के पास एक छोटा-सा बम धमाका भी हुआ। यह संतोष की बात है कि इन घटनाओं ने हमारे राष्ट्रपति को जरा भी विचलित नहीं किया और न ही शेख हसीना द्वारा यह छिपाने की कोशिश की गई कि इस समय उनके कट्टरपंथी विरोधी हिंसक उत्पात मचा रहे हैं और देश अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। जाहिर है कि उनकी निगाह में यही वक्त है- आजमाये दोस्त को यथार्थ से अवगत रखने का, ताकि आवश्यकता होने पर समय रहते यथोचित सहायता प्राप्त की जा सके और मित्र-पड़ोसी अपने हितों की रक्षा के बारे में भी सतर्कता बरत सके।

वास्तव में ढाका की उथल-पुथल का बहुत कम सम्बन्ध भारतीय राष्ट्रपति की यात्रा से है। हां, शेख हसीना को घेरने का कोई अवसर प्रतिपक्ष छोड़ना नहीं चाहता। इसलिए मेजबानी का तकाजा निबाहने में उसने साथ नहीं दिया। हाल के महीनों की उपद्रवी हिंसा में अब तक पचास से अधिक जानें जा चुकी हैं। पुलिस को दंगाइयों पर काबू पाने के लिए बल प्रयोग करना पड़ा है, जिस कारण आन्दोलनकारी हताहत होते रहे हैं। पर इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि जमाते-इस्लामी तथा खालिदा जिया की पार्टी का अवसरवादी गठजोड़ वर्तमान तनाव को और भड़काकर विस्फोटक बनाने पर आमादा है।

वह इसे अंजाम देने के लिए उत्तेजक हरकतें करता रहा है। विवाद का आरम्भ अदालत के उस फैसले से हुआ, जिसमें जमात के सदर सईद को 1971 के युद्ध अपराधी के रूप में सजा-ए-मौत सुनाई गई है। शेख हसीनाका मानना है कि जब तक देशद्रोही, मानवाधिकारों का बर्बर उल्लंघन करने वाले हत्यारों को दंडित नहीं किया जाता, तब तक सुलह और शांति स्थाई नहीं हो सकती। यह बात सिर्फ अपने परिवार का खात्मा करने वालों को सजा देने की नहीं, बल्कि गैर-कानूनी तख्तापलट कर फौजी तानाशाही को थोपने वाले तत्वों के जहरीले दांत निकालने की चुनौती भी है। दूसरी ओर, नई पीढ़ी के अनेक सदस्य यह सोचते हैं कि गड़े मुर्दो को उखाड़ते रहने से दुखते घाव ही हरे रहेंगे।

 क्रांतिकारी जनसंघर्ष के बाद जिस धर्म निरपेक्ष समाजवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना उस पार हुई थी, उसका सुनियोजित साजिश से विनाश उन फौजी अफसरों ने किया, जिन्हें विदेशी (पाकिस्तान?) ताकत का एजेंट ही कहा जा सकता है। शेख मुजीब की निर्मम हत्या के बाद बांग्लादेश का कायाकल्प पलक झपकते धर्म के आधार पर शासित राज्य में हो गया- मुक्तिवाहिनी की याद मिटा दी गई और मित्र भारत को शत्रु के रूप में पहचानने के लिए जनता को उकसाया जाने लगा। पाकिस्तान तथा दूसरे कट्टरपंथी इस्लामी देश और भारत का प्रतिद्वंद्वी चीन स्वाभाविक मित्र समझे जाने लगे।

जब से खालिदा जिया के पति का राज शुरू हुआ, बांग्लादेश भारत के लिए सिरदर्द पैदा करता रहा है। विडम्बना यह है कि जब हसीना भी सत्तारूढ़ रहती हैं, अपने पूर्ववर्तियों की विरासत के कारण भारत के साथ सम्बन्ध सामान्य रखना जटिल चुनौती बना रहता है। सीमा पर संतरियों की मुठभेड़ हो या उन निर्दोष गरीब नागरिकों की यंत्रणा, जो रोजी-रोटी की तलाश में अंतर्राष्ट्रीय सरहद को रोज नाजायज तरीके से पार करने को बाध्य हैं। जहां तक हसीना सरकार का प्रश्न है, उनका रूख हमेशा भारत के साथ सहयोग एवं शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व वाला रहा है। इसी कारण उनके स्वदेश प्रेम पर सवालिया निशान लगाने को जमाती तथा खालिदा के समर्थक उतावले रहते हैं। दुर्भाग्य से भारत में भी ऎसे लोगों की कमी नहीं है, जो सोचते हैं कि बांग्लादेश के साथ नरम रूख अपनाना समर्पण है और कोई भी मांग लेन-देन के आधार पर ही स्वीकार की जा सकती है। इसी का नतीजा है कि आज का वातावरण अनुकूल होने के बावजूद न तो तीस्ता जल विषयक समझौता हो सका है और न ही अबाध दोहरे कर के बोझ से मुक्त व्यापार।

जब पिछले वर्ष मनमोहन सिंह बांग्लादेश गए थे, तब यह आशा जगी थी। पर उस घड़ी ममता बनर्जी की संकीर्ण कर्कशता ने रसभंग कर दिया था। इसके साथ ही यह याद रखना भी जरूरी है कि बांग्लादेश की तमाम परेशानियों के लिए भारतीय ही जिम्मेदार नहीं। अपनी तमाम सदाशयता के बावजूद हसीना आर्थिक संकट के निराकरण में असमर्थ रही हैं।

9/11 के बाद से इस्लामी कट्टरपंथ में निश्चय ही उफान आया है। दहशतगर्द हमले से बौखलाए अमरीका ने इस ज्वार को रोकने के लिए जो हमलावर हिंसक रणनीति अपनाई है, उसने मुस्लिम बहुल आबादी वाले सभी देशों में जिहादी मुठभेड़ की मानसिकता को बढ़ावा दिया है। सऊदी अरब के पेट्रो-डॉलरों की खैरात ने आपराधिक तत्वों को इस घटनाक्रम का भरपूर लाभ उठाने का मौका दिया है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान हो या मलेशिया, इंडोनेशिया या फिलीपीन्स सभी जगह इस बदलाव को देखा जा सकता है। सस्ते मजदूर कारीगर सुलभ होने के कारण बांग्लादेश में 'गारमैंट ट्रेड' तेजी से पनप सका है, पर मुनाफा बढ़ाने की लालच में श्रमिकों का शोषण भी इसके साथ बढ़ता रहा है।

इस माहौल में सरकार के खिलाफ जनाक्रोश फैलाना प्रतिपक्ष के लिए सहज हुआ है। चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान में उलझी हमारी सरकार बांग्लादेश की तरफ ध्यान देने में लापरवाह रही है। इसी का नतीजा है कि वहां भारत के विरोधियों को अपने पैर जमाने का अवसर मिला है। माओवादी हों या सांप्रदायिक रूझान वाले संगठित तस्कर, अल्पसंख्यक अलगाववादी जनजातीय हों या चीनी-पाकिस्तानी खुफिया एजेंट, बांग्लादेश इनका चहेता अभयारण्य बन चुका है। क्या यह उम्मीद व्यर्थ है कि प्रणब बाबू की वापसी के साथ बांग्लादेश एक बार फिर हमारे समाचारों की सुर्खियों से लुप्त नहीं होगा? 

पुष्पेश पंत
राजनीतिक विश्लेषक व पूर्व प्रोफसर, जेएनयू नई दिल्ली

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