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बजटीय सौगातों की बारिश
Thursday, 07 Mar 2013 4:17:04 hrs IST

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वित्त मंत्री के रूप में जो बजट पेश किया है, वह बेहद संतुलित और शानदार बजट है, जिसमें समाज के हर वर्ग का ध्यान रखा गया है। गरीबों के लिए जिस तरह से इस बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं, उन्हें देखकर तो लगता है कि गरीब को गणेश मानकर ही बजट तैयार किया गया है। मेरा तो इतना लंबा अनुभव है, लेकिन मैं भी ऎसा बजट पेश नहीं कर पाया। हालांकि ये अलग बात है कि मेरे समय पैसे का अभाव था। जैसे ही राज्य सरकार के हाथ में पैसा आया है, उसका जनहित के लिए शानदार उपयोग किया गया है। मुख्यमंत्री ने गांधीवादी उदाहरण पेश करते हुए समाज के उपेक्षित और पिछड़े वर्ग के लिए बहुत बड़ा काम किया है।

बड़ी बात है कि वार्षिक योजना का आकार बढ़ गया है और यह 40,139 करोड़ रूपए की हो गई है। ऊर्जा, सिंचाई, पेयजल और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। गरीब भूखा न सोए, इसका भी इंतजाम बजट में किया गया है। बीपीएल परिवारों को एक रूपए किलो पर गेहूं और एपीएल परिवारों को 5 रूपए किलो पर आटा उपलब्ध कराने का निर्णय स्वागतयोग्य है। गरीबों को छत नसीब हो, इसलिए सरकार ने इंदिरा आवास योजना की राशि 50 हजार रूपए से बढ़ाकर 70 हजार कर दी है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में नि:शुल्क दवाइयों की संख्या बढ़ाने के साथ नि:शुल्क जांच शुरू करने का जो फैसला लिया गया है, वह ऎतिहासिक है।

लेकिन अभी इसमें बड़ी दिक्कत स्टाफ की आएगी, क्योेंकि अस्पतालों में पैरा-मेडिकल स्टाफ नहीं है। सरकार ने इस समस्या को दूर करने के लिए बड़े स्तर पर पैरा-मेडिकल स्टाफ की भर्तियां करने की घोषणा की है। युवाओं का इस बजट में विशेष ध्यान रखा गया है। इस बार बजट में नौकरियों की भरमार है। सरकार ने शुरू में दो लाख बेरोजगारों को नौकरी देने का लक्ष्य रखा था, जिसमें से एक लाख तेईस हजार को नौकरी दी जा चुकी है और बाकी के लिए प्रक्रिया चल रही है। बजट में कर्मचारियों का भी खास खयाल रखा गया है। एससी, एसटी और अल्पसंख्यकों का भी खासा ध्यान रखा गया है। आधी आबादी यानी महिलाओं के लिए बजट में संवेदनशीलता दिखाई गई है।

इसका एक उदाहरण विधवा पेंशन है। पहले जब किसी विधवा का बच्चा बालिग हो जाता था, तो पेंशन बंद हो जाती थी, लेकिन अब नहीं होगी। ग्रामीण विकास के लिए कई अच्छे कदम उठाए गए हैं। मनरेगा जैसी बड़ी योजना की अवघि को 100 दिन से बढ़ाकर 150 दिन करना महत्वपूर्ण है। हमारे किसान भाइयों पर ज्यादा बोझ न पड़े, इसलिए बिजली दरों को नहीं बढ़ाया गया।  सहकारिता ऋण की राशि डेढ़ लाख कर दी गई है। वृद्धों को तीर्थयात्रा कराने के निर्णय ने तो मुख्यमंत्री को श्रवण कुमार बना दिया है। बजट से पहले रिफाइनरी को मंजूरी मिलना, राजस्थान के भविष्य के लिए बड़ी बात है। रिफाइनरी का श्रेय राजस्थान पत्रिका को भी जाता है, जिसने इतनी गंभीरता के साथ इस मुद्दे को आवाज दी थी। पश्चिमी राजस्थान का तो इससे कायाकल्प हो जाएगा। इतने खर्चो के बाद भी राजस्थान की आमदनी बढ़ी है। सरकार का वित्तीय प्रबंधन बहुत शानदार रहा है।

प्रद्युम्न सिंह
कांग्रेस नेता व राजस्थान के पूर्व वित्त मंत्री

डुबोने वाला चुनावी बजट
यह एक डूबती हुई सरकार का डुबोने वाला बजट है।  इस सरकार ने एक साल के समय में बजट और बजट से बाहर साढ़े 25 हजार करोड़ रूपए का कर्ज लिया है। सरकार बजट और बजट की घोषणाओं के जरिये चुनावी वोटों को खरीद-फरोख्त की कोशिश में दिखती है।
सरकार का राजस्व सरप्लस वर्ष 2011-12 में 3357 करोड़ रूपए का था, वह घटकर 1025 करोड़ रूपए रह गया है। यानी एक तिहाई से भी कम हो गया है। वहीं दूसरी ओर, राजकोषीय घाटा वर्ष 2011-12 में 3625 करोड़ रूपए का था, वह बढ़कर  वर्ष 2013-14 में 13019 करोड़ रूपए का हो गया है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि यह राजस्थान की अर्थव्यवस्था को डुबोने वाला बजट है।  सरकार 94,871 करोड़ के खर्चे में सरकार का खुद का कर राजस्व केवल 34,000 करोड़ रूपए है, इससे स्पष्ट है कि राज्य की अर्थव्यवस्था दया और कर्ज पर टिकी हुई है। राजस्थान आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की बजाय दूसरों पर निर्भर होता जा रहा है। बजट की प्रशंसा तभी की जा सकती थी, जब राज्य सरकार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होती दिखती। बजट में ऎसा होता दिखता नहीं है।

सबको पता है, राजस्थान के लिए यह चुनावी वर्ष है, तो ऎसे में, राज्य मे कांग्रेस पार्टी की सरकार ने बजट के जरिये लोगों को लुभाने के लिए खूब घोषणाएं की हैं। लेकिन बड़ा सवाल तो यह है कि जो राज्य सरकार विगत चार साल से भी ज्यादा समय में अपनी विगत घोषणाएं पूरी नहीं कर पाई है, वह अपने बचे हुए सात-आठ महीने में अपनी घोषणाएं कैसे पूरी कर पाएगी, यह समझ में नहीं आया। एक बात और ध्यान देने की है कि राजस्थान सरकार दिल्ली में बैठी केन्द्र सरकार से अपने लिए कोई विशेष आर्थिक सहायता नहीं ले पाई है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य विशेष सहायता लेने में सफल रहे हैं। पेयजल के लिए राजस्थान सरकार ने 55 हजार करोड़ रूपए की विशेष सहायता की मांग रखी थी, लेकिन वह सहायता लेने में विफल रही है।

यह बजट न तो रोजगार पैदा कर सकेगा और ना ही आर्थिक विकास। यह केवल राजस्थान मे गरीबी को आगे बढ़ाएगा। हमें यह देखना चाहिए कि राजस्थान लगातार देश के दूसरे प्रदेशों की तुलना में कृषि के क्षेत्र में पिछड़ता जा रहा है। राज्य की घरेलू आय में कृषि पर निर्भर लोगों का हिस्सा लगातार कम होता जा रहा है। तो हम कह सकते हैं, यह किसान को मारने वाला बजट है। गांवों को भी डुबोने वाला बजट है। सरकार का राजस्व व्यय वर्ष 2011-12 में 53,653 करोड़ रूपए था, वह अब बढ़कर 76194 करोड़ रूपए हो गया है, जबकि पूंजीगत व्यय केवल 18,377 करोड़ रूपए हो गया है। इस प्रकार से यह साफ लगता है कि बजट राजस्थान के आर्थिक विकास में कोई गति पैदा नहीं कर सकेगा। प्रदेश में रिफाइनरी का स्वागत है, लेकिन जिस ढंग से वह लगाई जा रही है, गलत है। पहले कभी भी रिफाइनरी इन शर्तो पर नहीं लगाई गई है, रिफाइनरी के लिए एचपीसीएल के सामने राज्य सरकार ने घुटने टेक दिए हैं और गरीब आदमी के हितों के साथ समझौता किया है।

राजपाल सिंह शेखावत 
भाजपा विधायक व राजस्थान के पूर्व आयोजना राज्य मंत्री

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