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सोमवार, 15 मार्च, 2010
अफसरी का सपना
02 फरवरी 2010, 10:42 hrs IST
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कल रात हमें एक बेहद भयानक सपना आया। सपना कुछ यूं था कि महामहिम ने अचानक हमें अफसर की पदवी अता कर दी। हमें असीमित शक्ति और अधिकार दे दिए गए। हाथ में कानून की बंदूक व नियमों की पिस्तौल थमा दी गई, जिसे दाग कर हम किसी की भी पल भर में ऎसी-तैसी कर सकते थे। लेकिन महामहिम को भी न जाने क्या सूझी, उन्होंने एक दिन हमें तलब किया और सवाल पूछने शुरू  कर दिए। आदमी जागते हुए झूठ बोल सकता है, पर सपने में झूठ नहीं बोल सकता, क्योंकि सपना ही अपने आप में एक झूठ है। और झूठ के संसार में आदमी झूठ क्या बोलेगा सो जो निकला मुंह से सच निकला। महामहिम ने पूछा- अरे ओ जनसेवक! क्या तेरे काम में राजनीतिक दखल और प्रताडना बहुत बढ गई है हमने कहा- हां हुजूर। जिस पार्टी की सरकार आती है, वही ससुरे नाक में दम कर देते हैं। अंगूठा छाप हमें निर्देश देने लगते हैं। दूसरा सवाल था, तेरे साथ राजनीतिक भेदभाव किसने किया नेता ने, बडे अफसर ने या मंत्री ने
हम बोले, जनाबे आली। तीनों में से एक भी कम नहीं।

 जहां तक बस चलता है, तीनों नाक में तिनका करते रहते हैं। महामहिम ने पूछा, क्या तेरे साथ जातिगत और धार्मिक भेदभाव होता है। यह सवाल सुनकर हम हंस पडे। और बोले- हे महान् महामहिम। आप बडे भोले हैं। अजी जाति और धर्म के बिना तो अपना देश ऎसे ही है, जैसे बगैर प्याज-लहसुन के उडद की दाल। मजा ही नहीं आता। हमारे यहां तो अफसरों ने जाति संघ बना रखे हैं। अमुक जाति का बडा अफसर अमुक जाति के छोटे अफसर को पूरा समर्थन देता है। कुछ अफसर तो जाति के बल पर राजनीति में घुस जाते हैं। पर्दे के पीछे से सब बोलते हैं, अपनी जाति जिन्दाबाद। फिर महामहिम ने एक ऎसा सवाल पूछ लिया, जो उनकी नितांत नासमझी का प्रतीक था। वे पूछ बैठे, अरे ओ जन सेवक। क्या अपने बच्चों को स्कूल और कॉलेज में भर्ती कराने में तुमने पद का उपयोग किया है। यह सुनते ही हमारी हंसी छूट गई। हमने कहा, वाह महाराज। इस सवाल का तो कोई औचित्य नहीं।

 अरे अपने बच्चों को तो पशु-पक्षी तक पालते हैं। हम अपने बच्चों के लिए अपने पद का उपयोग न करेंगे, तो क्या आपके बच्चों के लिए करेंगे। और वैसे भी इसकी जरूरत हमें नहीं। जैसे ही हैडमास्टर को पता चलता है कि यह अफसर का बेटा है, वह तो खुद उसकी चिरौरी करने लगता है और एक दिन अपना काम कराने हमारे दरबार में हाजिर हो जाता है। अंत में महामहिम ने पूछा कि हे अधिकारी क्या तुम अपने काम से खुश हो। हमने हाथ जोडकर कहा- महामहिम! सच तो यह है कि इस गधा पचीसी जैसे काम से हम कतई खुश नहीं। ससुर सुबह से शाम तक पिले रहो। न होली न दीवाली। दीपावली का पता हमें अपने घर में आई गिफ्टों के ढेर देखकर लग पाता है। वरना चौबीस घंटे रहो ड्यूटी पर। नगर में कुत्ता भी भौंके, तो हमें चौंकना पडता है। इससे पहले कि यह सिलसिला कुछ आगे चलता, हमारी नींद खुल गई। हम 'जन सेवक' से 'जन' बन गए। पडे-पडे हमने सोचा हम तो जनता ही भले, हमें अफसर न बनना है, न बनेंगे।
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