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सोमवार, 15 मार्च, 2010
कहां है समाजवाद
03 फरवरी 2010, 11:26 hrs IST
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अब तो लगता है कि समाजवाद नाम का कपडा तार-तार हो गया है और अपने को समाजवादी कहने वालों ने लोहिया का 'कुर्ता' छोडकर 'सूट' पहन लिया है।  समाजवादी परचम का सबसे बडा उपयोग इंदिरा गांधी ने किया। बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, राजाओं का प्रिवीपर्स समाप्त किया और गरीबी हटाने का नारा दिया। उस वक्त तो लगा कि जिस समाजवाद की हम कल्पना कर रहे हैं वह बस हमारे दरवाजे पर खडा होकर दस्तक दे रहा है। किवाड खोलो और उसे भीतर ले लो। लेकिन यह भ्रम था ऎसा भ्रम जैसे तेज हवा के दौरान होता है। लगता है कि कोई दरवाजा खड-खड कर रहा है, पर द्वार खोलकर देखो तो कोई नहीं होता। ऎसे में आदमी का दिल यह गाने को होता है- कौन आएगा यहां, कोई न आया होगा; मेरा दरवाजा हवाओं ने हिलाया होगा।

औरों की क्या कहें। हमारे अपने दिल में हमेशा से तमन्ना रही कि इस देश में समाजवाद आए। सब बराबर हों। ऎसा नहीं कि कोई खाने को तरस रहा हो और कोई हीरे-मोती चबा रहा हो। लेकिन देखा कि समाजवाद के सबसे बडे पैरोकार सबसे पहले अपनी बाटी सेंकने में लगे हैं। स्वयं की औलादों को विदेश में भेजकर दूसरे के पुत्रों को क्रांति करना सिखा रहे हैं। यह तो ऎसे ही हुआ कि अपने पुत्र को रजाई ओढकर सोने को कहें और दूसरे के बेटे से कहें- जा बेटा, देश की सीमाओं पर जाकर उनकी रक्षा कर। ऎसे में समाजवाद इस देश में आया तो जरू र पर वह समाजवाद था- लूटखसोट, रिश्वतखोरी और कामचोरी का समाजवाद। यूनियन का नेता फैक्ट्री का सबसे बडा कामचोर बना। हर जोर जुल्म की टक्कर में, हडताल हमारा नारा है- जैसे नारे लगवा कर फैक्ट्रियां बंद करवा दीं। जो थोडा बहुत रोजगार था वह भी ठप हो गया। समाजवादी इंदिरा गांधी की नजर अपनी औलादों से ज्यादा दूर गयी ही नहीं। यही समाजवादी पार्टी में हो रहा है। समाजवादी मुलायम सिंह का सारा खानदान पार्टी में है। उपचुनाव भी उनकी बहू ही लडती है, यह बात दूसरी है कि वे अपने ही समाजवादी मित्र के सामने उसे जिता नहीं पाते।

अब इस नये युग में समाजवाद की बात करना कमरों में घोंसला बनाने वाली चिडिया पर कविता लिखने से ज्यादा कुछ नहीं है। जंगलों की जाली से टकराकर फडफडाती चिडिया के लिए किस कोने में जगह बची है।

जब दीवारों से पुरखों की तस्वीर ही दफा हो गयी तो घोंसला बनाने के लिए स्थान कहां शेष रहा है। अब समय बदल गया है। समाजवाद के लिए समाज में कोई जगह नहीं बची है। अब तो गलाकाट प्रतियोगिता है। किसी कमीज, बुशर्ट या कुर्ते का गला नहीं काटा जा रहा। यहां तो सीधे सीधे आदमी को खलास किया जा रहा है। बच्चों को बचपन से ही सिखा दिया जाता है कि बेटा जब तक खास गति से नहीं भागोगे तब तक तुम जिंदगी की दौड में चल ही नहीं पाओगे। आज का नारा है जो पिछड गया वह समाज से बिछड गया। आज पिछडे और बिछडों के लिए कोई स्थान नहीं। नई पीढी को समाजवाद का अर्थ तक पता नहीं। न ही उन्हें बताया जा रहा है।
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