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साहित्य और चोरी
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05 फरवरी 2010, 10:39 hrs IST
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लोग कह रहे हैं कि एक लोकप्रिय फिल्मी शायर ने एक हिन्दी के प्रसिद्ध कवि की पंक्तियां मार के अपने गीत का मुखडा बना लिया। अब बडे लोगों की तो बडे लोग जानें, पर हमें इतना पता है कि ऎसी चोरी आज से नहीं अति पुरातनकाल से चल रही है। बस चोरी पकडे जाने पर अंदाजे बयां बदल जाते हैं। साहित्य का संसार भी बडा मजेदार है। एक चीज पर हजारों शायरों का जी आ जाता है। एक जमाने में लोगों ने इश्क पर लिखा। इश्क पर इतने शेर कहे गए कि बेचारा इश्क का हजारों लाखों शेरों के नीचे दबकर कचूमर निकल गया। कभी कवियों का दिल बादलों पर आया। जिसे देखो बादल पर लिख रहा है। अपने बारे में इतनी कविता सुन कर बादल का कलेजा फट गया और वह दुम दबा कर ऎसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग।
अब ये न कहना कि दुम और सींग का परस्पर क्या ताल्लुक। ताल्लुक है। दुम हिलाने के काम आती है और सींग मारने के। एक पूर्ण पशु वही कहलाता है जिसके दुम और सींग दोनों हों। साहित्य में चोरी और प्रेरणा दोनों के जबरदस्त किस्से मिलते हैं। एक जमाने में हमारे एक कवि मित्र हुआ करते थे, अल्लाह! उन्हें जन्नत बक्शे, हर दूसरे कवि की तरह उनका भी मानना था कि श्रेष्ठ कविता वही रच सकता है जो या तो पीता हो, या फिर जिसके पास एक प्रेरणा हो। प्रेरणा से आप भ्रमित न हों, यहां प्रेरणा का अर्थ है एक अदद प्रेमिका। चूंकि ये श्रीमान, महानतम कवि बनना चाहते थे इसलिए एक प्रेरणा भी रखते थे और प्रतिदिन पीते भी थे। जाहिर है जिसके दिल में सृजन की ऎसी आग हो वह कुछ न कुछ रच ही देता है। सो उन्होंने गद्यमयी कविता और पद्यमयी गद्य लिख डाला। जब लिख दिया तो उसे छपवाना ही था। अपने यहां के प्रकाशन भी इतने उदार हैं कि चाहे कूडा करकट ही क्यों न हो, अगर आपने अपने प्रकाशक को किताब छापने का खर्च दे दिया तो वह कुछ भी छाप सकता है। सो उन्होंने कविता की पुस्तक छपवा ली। लेकिन नशे की झोंक में उन्होंने अपनी कविताओं की किताब पर अपना नाम देने के बजाय प्रेमिका का नाम दे दिया। किताब छप गई और बंट गई। लोकार्पण समारोह भी हो गया। लेकिन कुछ महीने बाद उनके और प्रेमिका के मध्य युद्ध छिड गया। अब वे परेशान। उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि जो कविताएं उनकी समझी जा रही हैं दरअसल वे मेरी हैं। लेकिन साहब। जो छप गया सो छप गया। एक और किस्सा सुनें। एक कवि महाशय ने अपनी कविताएं एक साहित्यिक पत्रिका में छपवाई। कुछ दिनों बाद एक अन्य कवि ने दावा किया कि ये कविता तो मेरी है। कवि महोदय ने कहा- यह हो ही नहीं सकता। लेकिन दावेदार कवि ने कहा कि यह कविता तो उस वक्त प्रकाशित हो चुकी थी, जब ये कवि महोदय ढंग से निकर भी नहीं पहन सकते थे। अब कवि महोदय ने कहा कि मुझसे गलती हो गई। मैंने ही गलती से ये कविताएं अपनी डायरी में नोट कर ली थी और बाद में अपनी समझ कर छपवा दीं। अब ऎसे मामलों में कहना मुश्किल हो जाता है कि कौन सही है और कौन गलत।
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