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रविवार, 14 मार्च, 2010
माफी फोबिया
06 फरवरी 2010, 11:47 hrs IST
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लगता है स्वयं को शेर मानने वाले बाला साहेब ठाकरे, उनके पुत्र उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे के बीच इन दिनों प्रतियोगिता चल रही है कि कौन कितना गडबड और खराब बोल सकता है। बाला साहेब ठाकरे सोनिया गांधी को इटेलियन मम्मी कह रहे हैं तो उनके भतीजे राज ठाकरे राहुल गांधी को रोम पुत्र कह रहे हैं। इन दोनों की परेशानी अजीब है। दोनों में होड मची है कि कैसे मराठी मानुस का दिल जीता जाए। इस सारे खेल में सबसे ज्यादा हालत खराब भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हो रही है। वे राष्ट्रवादी हैं और अब समझ नहीं पा रहे कि कैसे अपने आपको सुपर साबित करें। सुपर साबित करने का खेल भी अजब है। अगर आदमी को ऊंचा उठना हो तो ठीक लेकिन जब कॉम्पिटीशन नीचे गिरने का होता है, तो स्थिति अजब हो जाती है। कौन किस तेजी से किसी को गरिया सकता है, ऎसी प्रतियोगिता कभी-कभी पुलिस में होती है। जब सिपाही जोर की गाली देता है तो हवलदार सोचता है कि वह क्या कहे। और जब हवलदार जोरदार शब्द उछालता है तो थानेदार असमंजस में पड जाता है। राज ठाकरे की नजर में राहुल गांधी 'रोम पुत्र' हैं। दरअसल जब आदमी के पास तर्क नहीं बचते तो वह इसी तरह की जुबान बोलता है।
इधर एक बात और जोरदार हो रही है। ठाकरे पिता-पुत्र और चाचा-भतीजे को माफी मंगवाने का नया शौक चढा है। उन्हें लोगों से सॉरी कहलवाने में बडा ही सुख प्राप्त होता है। बस उन्हें एक लक्ष्य चाहिए और फिल्म वालों से सॉफ्ट लक्ष्य उन्हें दूसरा नहीं मिलता। कभी बिग बी की बीवी जया बच्चन की जुबान पकड लेते हैं। कभी करण जौहर के गिरेबां में झांक लेते हैं। और फिल्मवाले भी मातोश्री में जाकर नाक रगड आते हैं। माफी मंगवाने की जिद करने वाले मोहल्ले के दादा से ज्यादा कुछ नहीं होते। जो एक हाथ में पत्थर लेकर आपके घर की खिडकी के सामने खडे हो जाते हैं। या तो माफी मांगो वरना तुम्हारी खिडकी का शीशा तोड देते हैं। फिल्मवालों की नजर अपने बॉक्स आफिस पर होती है। अपनी बात पर टिके रहने वालों की अब कमी हो गई है। बस ठाकरे चाचा-भतीजे इसी बात का आनंद उठा रहे हैं। ठाकरे सेना का काम फिल्मों के पोस्टर फाडना, गरीब ऑटोचालकों को पीटना और भद्र महिलाओं की हंसी उडाने से ज्यादा कुछ नहीं बचा। देखा-देखी यह काम पूरे देश में होने लगा है। जहां देखों वहीं एक दर्जन लडके अपने सिर पर नीला, काला या केसरिया रू माल बांध कर चिल्लाते हुए सडकों पर निकल जाते हैं। उन्हें देख कर बेचारे व्यापारी अपनी दुकानें बंद कर लेते हैं- कौन ससुर जरा सी जिद में अपना नुकसान कराए। अपनी खारी जुबान से लोगों को बुरा भला कहने वाले से सज्जन पुरूष दूर ही रहते हैं। इसीलिए तुलसी बाबा ने रामचरित मानस की शुरूआत करते हुए लिखा था- बन्दउ संत असज्जन चरणा। संत पुरूषों को तो सभी नमन करते हैं, पर वे असज्जन की भी चरण वन्दना करते हैं। कौन जाने कब उपद्रव कर दे।
- राही
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