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सोमवार, 15 मार्च, 2010
गैर मामूली आदमी
08 फरवरी 2010, 10:27 hrs IST
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अचानक वे मामूली से गैर मामूली आदमी में तब्दील हो गए। गैर मामूली होते ही उन्होंने पहला काम यह किया कि स्वयं को जमीन से डेढ इंच ऊपर उठा लिया। पहले उनके कदम जमीन पर पडते थे, आजकल वे अपने पैर हवा में रखते हैं। अब यह कहना तो गलत होगा कि वे हवा-हवाई हो गए, पर अचानक उन्हें अपने आसपास के लोग छोटे लगने लग गए। जमीन से ऊंचा उडने वालों का स्वभाव यही होता है। जब कोई ज्यादा ऊंचा उठता है तो उसे नीचे वाले चींटी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आते। मामूली से गैर मामूली होना, एक सहज प्रक्रिया है। जैसे-जैसे आदमी के पास धन, यश, समृद्धि, सुख आता है वह गैर मामूलियत की तरफ बढने लगता है। आम से खास हो जाता है। हमारे नेता और अफसर इसकी मिसाल है। भैंसों का गोबर उठाने वाला नेता बनते ही खास हो जाता है। खाट पर सोने वाले को पंचतारा होटलों के गद्दे चुभने लगते हैं। सरकारी एयरकंडिशन गाडी में उसे गर्मी लगने लगती है।

 एक नेताजी को हम जानते हैं। उनके पिता बकरी पाला करते थे। सारा बचपन बकरी का दूध पीने और बकरी के बाडे में पडी खाट पर सोते-सोते गुजरा, पर नेता बनते ही एक मील दूर पडी बकरी की मींगणी की गंध से छींके आने लगी। वे मामूली से गैर मामूली हो गए। यही हाल अफसरों का है। हाल में ही एक अफसर दम्पती के घर छापे में तीन करोड की नकदी बरामद हुई। यहां ससुर तीन हजार की किश्त चुकाने के लिए भी मशक्कत करनी पडती है। फर्क इतना है कि हम मामूली आदमी हैं। इधर आजकल पढे लिखे लोगों को भी गैर मामूली हो जाने का दौरा पडने लगा है। जब आदमी बडा होने लगता है तो वह सबसे पहले आसपास से कटना शुरू  कर देता है। धीरे-धीरे वह अकेला होता चला जाता है। जो धरती से जुडा रहता है वह मामूली लगता है, पर होता गैर मामूली है। मामूली और गैर मामूली आदमी में ज्यादा भेद नहीं होता। कई बार एक छोटा-सा काम करके भी आदमी गैर मामूली हो जाता है। अपने 'राहुल का स्वयंवर' वाले राहुल महाजन को ही लो। अपने पिता की अस्थियां हरिद्वार डालने जाते वक्त उसने जम कर नशा किया। इस एक घटना ने राहुल महाजन को अचानक गैर मामूली बना दिया और वही गैर मामूली अब स्वयंवर रचा रहा है। वैसे यह देश उन मामूली आदमियों का है, जिन्होंने गैर मामूली काम किए हैं।

लाल बहादुर शास्त्री एक मामूली शख्सियत थे, लेकिन अपने कामों से गैर मामूली हो गए। लेकिन ऎसे लोगों को क्या कहा जाए जो होते तो मामूली हैं, पर वे अपने को गैर मामूली समझने लगते हैं। जैसे हम अचानक अपने को नोबल पुरस्कार प्राप्त कर्ता समझना शुरू  कर दें। अब कोई अपने आपको कुछ भी समझ सकता है। मोहल्ले का कवि स्वयं को 'कालीदास' मान बैठे तो कोई उसका क्या कर सकता है। लेकिन यह भी सच है कि इस देश को मामूली आदमियों ने ही बचा रखा है। क्योंकि गैर मामूली बनने की प्रक्रिया में जुल्म का पहलू अवश्य शामिल होता है। मामूली से गैर मामूली होते ही आदमी कुछ टेढा हो जाता है।
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