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सोमवार, 15 मार्च, 2010
खाता चार सौ बीस
09 फरवरी 2010, 10:51 hrs IST
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जैसे ही हम काका रामसजीवन के चबूतरे के सामने से गुजरे, काका ने अपना लट हवा में ऎसे लहराया जैसे हमारी खोपडी फोड देने का इरादा हो। हमने एक नट की तरह कलाबाजी खाकर अपनी मुंडी बचाई और क्रुद्घ स्वर में बोले- काकाजी! यह क्या मजाक है क्या आपने हमें भीड के चंगुल में फंसा जेबकतरा समझ लिया जिसे जो मरजी घूंसा-लप्पड मार के चल देता है। आप हमें समझते क्या हो

काकाजी ने गुस्से से कहा- कायर! डरपोक! भीरू ! काकाजी की बात सुन हम चक्कर में पड गए। हमने कहा- काकाजी! आप भी शिवसेना प्रमुख की तरह बैठे ठाले इल्जाम लगा रहे हैं। हमने ऎसा क्या किया जो हम पर तोहमत लगाई जा रही है। हम किससे डरते हैं, जरा बताओ तो सही। काकाजी तल्ख स्वर में बोले- तुम इस देश के भ्रष्ट अफसरों से डरते हो। हमने कहा- काकाजी! हमें अफसरों से क्या लेना देना। वे अपना काम करते हैं, हम अपना काम करते हैं। भ्रष्ट अफसरों पर निगाह रखना सरकार का काम है। हम तो प्रजा हैं। काकाजी भुनभुना कर बोले- अरे वाह रे प्रजा। वोट डालते वक्त तो अपने आपको लोकतंत्र का राजा कहते हो और जिम्मेदारी पडते ही जनता हो जाते हो। तुमने यह तो सुना होगा कि जैसी प्रजा होती है उसे उसी माजने के राजा मिलते हैं। जब जनता ही भ्रष्ट हो तो अफसर भ्रष्ट क्यों न होंगे काका रामसजीवन की बात सुन हम तिलमिला गए। हमने कहा- काकाजी! यह तो सरासर झूठा आरोप है। बेचारी जनता क्या खाकर भ्रष्टता करेगी जिस जनता को चालीस रूपए किलो की चीनी और अस्सी रूपए किलो दाल खाने को मिल रही हो, वह तो यूं ही चीं बोल रही है। काका ने हंस के कहा- अरे वाह रे ईमानदारी के कोथले। तुझे पता है कि छतीसगढ के एक आईएएस अफसर के घर छापामारी में दो सौ बीस बैंक के खाते मिले हैं। उसकी नौकरानी के खाते में विदेशी मुद्रा मिली है और मोची, धोबी और नाई के नाम से दो सौ नामी बेनामी खाते मिले हैं और हर खाते में ढाई से पच्चीस लाख रूपए मिले हैं। काकाजी की बात सुनते ही हमें गश आ गया और हम चबूतरे पर गिर पडे। काकाजी ने अपनी जूती उतार कर हमें सुंघाई। हमें तुरन्त होश आ गया। काकाजी ने मुस्करा कर कहा- क्यों खातों की संख्या सुनते ही गश आ गया।

काकाजी ने कहा- बेटा! चार दिन पहले एक अफसर दम्पती के यहां तीन करोड नकद मिले। अब एक अफसर के यहां दो सौ बीस बैंक खाते मिले। एक राज की बात तुझे बताऊं। ऎसे अफसर एक दो नहीं, सैकडों हैं। अब यह तो मैं नहीं कहता कि सारे अफसर  बेईमान हैं, पर यह जरू र कहता हूं कि बेईमानों की संख्या कम नहीं है। हमारे देश में असली मजे अफसर ही कर रहे हैं और ये जो सरकारी कर्मचारियों में भ्रष्टाचार पनप रहा है न इसका कारण भी अफसर ही हैं। हमने पूछा- पर काका! तुमने हमारे सिर पर लट क्यों घुमाया हम तो बेईमान नहीं। काका ने कहा- जो बेईमान की बेईमानी देख कर मुंह नहीं खोलता, वह भी उतना ही बडा गुनाहगार है।
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