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बाजार भाव
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16 जनवरी 2010, 12:40 hrs IST
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जब कभी इस भागते, दौडते, हांफते शहर में हमें अकेलेपन का दौरा पडता है, तब हम कॉफी हाउस के एकान्त कोने में बैठ कर ब्लैक कॉफी सुडकने लगते हैं। इस कोने में इतना अंधेरा रहता है कि वहां बैठ कर आप सभी को देख सकते हैं, पर आप पर प्राय: किसी की नजर नहीं जाती। हम धुआं उडाती कॉफी के प्याले को पल-पल ठंडा होते हुए देख रहे थे कि एक अजनबी हमारे करीब आकर बैठ गया। उसे देखकर हम चौंके। पहचानने की विफल कोशिश रही, लेकिन यह सोच कर चुप रह गए कि कहीं हमने नाम पूछा और ये व्यक्ति पुराना परिचित निकला तो खामखां हमें दंभी, घमण्डी और बडे आदमी होने का खिताब अता कर जाएगा, बगैर इस बात को जाने कि आजकल हमें अपने बचपन की सारी बातें याद रहती हैं, जबकि दो दिन पहले किसी पार्टी में मिले आदमी का नाम भूल जाते हैं। खैर अजनबी ने हमारे घूरने को नजरअंदाज करते हुए कहा- पहचानने की कोशिश मत करो। हम इससे पहले कभी नहीं मिले हैं या हो सकता है मिले भी हों। तुम तो यह बताओ कि आजकल बाजार भाव क्या चल रहा है। उसका सवाल सुन हम चौंके। हमने तल्खी से कहा- देखो अजनबी! न तो हम गुड-चीनी बेचते हैं और न ही शेयर बाजार के दलाल हैं। हम एक लेखक हैं, जो किस्से-कहानियां लिखते हैं। सारा हाट बाजार हमारी घरवाली करती है, इसलिए हमें आलू, प्याज, मटर, दाल, आटा, चावल, दलिया, नमक, कपडे, बनियान तक के बाजार भाव नहीं पता। यह सुनकर अजनबी ने इतनी जोर से ठहाका लगाया कि सारा काफी हाउस हमें देखने लगा। कुछ मेज छोड कर बैठा नए 'कबूतर-कबूतरी' का जोडा तो तुरंत उठ कर चल पडा। हमने किंचित गुस्से से कहा- तुम्हारी हंसी का अर्थक् वह बोला- कुछ खास नहीं। हंसी सिर्फ इसलिए आई कि तुम दुनिया बदलने की शेखी बघारते हो और अपनी जडों से कटे हुए हो। जब तुम्हें बाजार भाव के बारे में ही पता नहीं तो फिर लोगों की समस्याओं का आभास कैसे होगा। और तुम्हारा यह अनुमान भी नितांत गलत है कि मैं तुमसे चाय, चीनी और पेट्रोल के बाजार भावों पर बातचीत करने आया हूं। मैं तो किसी और चीज के बाजार भावों के बारे में पूछ रहा था। अब हम सचमुच चौंके। हमने कहा- देखिए। सच तो ये है कि हमें बाजार के बारे में कुछ पता नहीं। हमारी दुनिया अलग है। हमारी दुनिया भावों से अलग है। हम बाजार से नहीं भावना से जुडे हैं। हमारी बात को काटकर वह अजनबी बोला- चलो देर से ही सही, तुम उस रास्ते पर तो आए जिसकी मैं बात कर रहा था। मुझे पूछना है कि आजकल दुनिया में भावना का बाजार क्या चल रहा है। क्या तुम्हारे समाज में भावनाओं की कोई कद्र बची है या नहीं। या उसे भी तुमने गुड-चीनी की तरह जिंस समझ लिया। अगर भावना बची है तो उसका उपयोग क्यों नहीं कर रहे। हमें तो लगता है कि तुम भावना की तिजारत करने लगे हो। इसीलिए पूछ रहा हूं कि आजकल भावना का बाजार भाव क्या चल रहा है।
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