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शनिवार, 13 मार्च, 2010
दोस्त ले लो, दोस्त
19 जनवरी 2010, 11:04 hrs IST
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मकर संक्रान्ति के बाद निकली सुहानी धूप में बैठे उनींदे से अखबार पढ रहे थे कि एक फेरीवाले की आवाज सुन चौंके। फेरीवाला चिल्ला रहा था- दोस्त ले लो, दोस्त। अच्छे पक्के दोस्त। आजमाए हुए दोस्त। तरह-तरह के दोस्त। दोस्त ले लो, दोस्त। फेरीवाले की हांक सुन हमारी नींद, जवान लडकी के शंकित पिता की तरह गायब हो गई। हमने आवाज देकर फेरीवाले को बुलाया- अरे ओ फेरी वाले! इधर आओ। क्या बेच रहे हो जरा हमें भी तो बताओ फेरीवाला बोला- बाऊजी! मेरे पास तो भांति-भांति के दोस्त हैं। अगर चाहिए तो बोलिए। अभी निकाल कर देता हूं। हम चक्कर में पड गए। हमने कहा- भैया फेरी वाले! हमने अपनी जिन्दगी में बहुत से बिसायती देखे हैं। कोई चूडी बेचता है, तो कोई चूटीले। कोई दरी बेचता है, तो कोई साडी। कोई नमकीन बेचता है, तो कोई झाडू। पर दोस्त बेचने वाला पहली बार देखा। चलो। जरा माल दिखलाओ और अपने माल की खासियत बताओ। अगर जंच गए तो एकाध दोस्त हम भी खरीद लेंगे। वैसे एक बात बताएं। आजकल दोस्तों की बडी जरू रत पडने लगी है।

फेरीवाला मुस्कराया और बोला- बाऊजी! पहले के जमाने में एकाध दोस्त ही होते थे, लेकिन होते थे बडे पक्के। कृष्ण-सुदामा, कृष्ण-अर्जुन, दुर्योधन-कर्ण, राम-सुग्रीव की दोस्ती बडी ही प्रसिद्ध रही है। आजकल बेमतलब यारी करने वाले बहुत ही कम मिलते हैं। वैसे आप चाहें तो दस दिन में दस हजार दोस्त बना सकते हैं। बाऊजी आप इंटरनेट तो चलाते होंगे। हमने कहा- हां। ज्यादा हाथ साफ तो नहीं है, पर काम तो चला ही लेते हैं। फेरीवाले ने हंस के कहा- तो बाऊजी ऑरकुट और फेसबुक पर जाइए। दोस्तों की भरमार है। एक क्लिक पर दस दोस्त मिलते हैं। हमने कहा- अरे फेरीवाले। तुम तो बडे पहुंचवान मालूम पड रहे हो। तुम्हें फेरी लगाने की क्या जरू रत पड गई। फेरीवाला बोला- बाऊजी। मैं भी इंटरनेट का ही मारा हुआ हूं। सोशल नेटवर्क पर मेरी एक दोस्त बन गई। उसने मुझसे नेट पर ही ब्याह रचा लिया। फिर एक दिन वह अपने भाई और बाप के साथ मेरे घर आई। दो दिन साथ रही और एक दिन मेरे पीछे से मेरा सारा माल मत्ता लेकर गायब हो गई। बाद में पता चला कि जिसे वह भाई बता रही थी वह तो उसका असली भरतार था और जिसे बाप बता रही थी, वह उसका मुस्टंडा नौकर था। वहां उसके खसम और नौकर ने मेरी जमकर पिटाई की और धमकी देकर भगा दिया। अब पेट तो भरना ही था, सो आजकल दोस्त बेचकर काम चला रहा हूं। फेरीवाले की करूण कथा सुन कर हमने कहा- चलो भैया। जरा अपने कोथले में से दोस्त निकाल कर बताओ। क्या तुम्हारे पास सच्चे दोस्त भी हैं फेरीवाला बोला- बाऊजी। ऎसे दोस्त तो आजकल अल्लाह मियां ने बनाने ही बंद कर दिए। दरअसल जिस मिट्टी से बना करते थे आजकल उसका उत्पादन ही बंद हो गया। हमने कहा- भैया। कभी उन्नत नस्ल के दोस्त हों, तो लाना, एकाध खरीद लेंगे। फेरीवाले ने हंस के कहा- बाऊजी। जब ऊंची नस्ल के आदमी ही नहीं बचे, तो दोस्त कहां से मिलेंगे।
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