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सोमवार, 15 मार्च, 2010
प्रेम रजाई
21 जनवरी 2010, 10:47 hrs IST
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कहवाघर की कडवी कॉफी सुडकते हुए हमने अपने किलाण मामा से कहा- मामाजी! पिछले दिनों तो बहुत ठंड पडी थी। सर्दी के मौसम में आपको तो बडी तकलीफ हुई होगी। किलाण मामा बोले- हम तो 'प्रेम रजाई' ओढ के बडे आनंद मगन रहते हैं। हम चौंके। बोले- मामाजी! ये 'प्रेम रजाई' का नया खटका क्या लाए हो। रजाई तो रूई की होती है। मामा हंस के बोले- लल्ला! तुम नहीं समझोगे। प्रेम रजाई दिखाई नहीं देती। यह अमूर्त है, लेकिन इसे लपेट लेने से सर्दी-गर्मी सब दूर रहती है। आदमी पर मौसम का असर नहीं होता। हम बोले- मामाजी! आज तो जरा प्रेम रजाई पर ही चर्चा हो जाए।

 मामा बोले- कबीर नाम का एक जुलाहा था। वह जब अपनी चादर बुनता तो उसमें प्रेम तत्व डाल देता था और अपनी मस्ती में झीनी-झीनी चादर बुनता। यह प्रेम तत्व ही महान् है- 'प्रीत डगर जब पग रखा, होनी होय सो होय; नेह नगर की रीत है तन-मन दोनों खोय।' किलाण मामा का दोहा सुन हम हंस पडे। हमने कहा- मामाजी आप तो हमें बहलाने लगे। अजी प्रेम करना तो युवाओं का काम है। बुढापे में क्या प्रेम करनाक् हां, नौजवानों के प्रेम पर एक पुरानी कहावत हमें भी याद आ रही है जरा आप भी सुन लीजिए- 'नींद न जाने टूटी खाट, भूख न जाने बासी भात, प्यास न जाने धोबी घाट और प्रीत न जाने जात-कुजात।' मामा ठहाका लगाकर बोले- वाह भानजे। बात तो बडी मजेदार कही। प्रेम को जाति पांति से क्या लेना-देना। भैया प्रेम तो ऎसी चीज है जो सबको एक बना देती है- 'साजन हम तुम एक हैं, देखत ही के दोय; मन से मन को तौल ले, दो मन कभी न होय।' किलाण मामा का दोहा सुनकर हमारे मुंह से अनायास 'वाह-वाह' निकल गया।

हमने कहा- मामाजी। आपके शानदार दोहे के पाये का एक और दोहा हमें भी याद आ रहा है जरा सुनिए- 'साजन यों मत जानियो, तोहि बिछरत मोहे चैन; गीले बन की लाकडी, सिलगत हूं दिन रैन।' लेकिन मामा अब तो बरसों का प्रेम एक दिन में खत्म हो जाता है। किलाण मामा बोले- भानजे इश्क में हमारे अनुभव कुछ अलग किस्म के रहे हैं। हमने कहा- मामाजी! जरा सुनाइए। वे बोले- 'वो रोये तो बहुत पर मुंह मोड के रोये; बडे मजबूत होंगे जो दिल तोड कर रोये, मेरे सामने ही करके मेरी तस्वीर के टुकडे, पता लगा कि बाद में उन्हें जोड कर रोये।' तो भैया कुल मिलाकर बात यह है कि अगर आपके दिल में प्रेम है, प्रेम की कुछ यादें हैं तो उन्हें प्रेम रजाई बनाकर अपने इर्द-गिर्द लपेट लीजिए। यादों की गरमाहट से आपको जो ऊष्मा मिलेगी उससे सर्दी तो क्या उसका बाप तक आपको नहीं छू सकता। पर इसका मतलब ये नहीं कि सिर्फ प्रेम रजाई ओढ कर ही सोए। जरा ढंग के पिनारे की धुनी हुई रजाई भी ओढ लें।
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