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सोमवार, 15 मार्च, 2010
खींचना फोटू का
22 जनवरी 2010, 10:57 hrs IST
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आजकल हमारा मन बार-बार अलमारी की ओर जाता है जहां श्रीमतीजी ने हमारा कैमरा कैद कर रखा है। चढती जवानी में हमें फोटो खींचने का शौक चढा था। तब हमारे पास एक श्वेत-श्याम कैमरा था, जिसकी बदौलत हम अपने दोस्तों में बडे ही प्रसिद्ध थे। जब भी किसी रिश्तेदार या मित्र के घर शादी-ब्याह या जन्मदिन समारोह होता तो हमें जरू र याद किया जाता। हम सोचते थे कि हम समाज के बडे ही लोकप्रिय व्यक्ति हैं, लेकिन हमारा यह भ्रम उस दिन टूटा जब हम अपने मित्र के बच्चे के जन्मदिन पर बिना कैमरा पहुंच गए और उस भले मानुष ने हमारे हाथ से प्लेट छीन कर वापस घर भेज दिया और कहा कि पहले कैमरा लाओ तब खाना खाना। हमारे मित्र के बूढे पिताजी का देहावसान हो गया। उसका फोन आया- सुनो। सुबह ग्यारह बजे अर्थी उठेगी। तुम आ जाओ। हां, कैमरा लाना मत भूलना। हम वहां पहुंचे तो स्वर्गीय पिताश्री को अर्थी में लिटाया जा चुका था। हमें देखते ही मित्र ने तुरन्त अपने पिता के मुंह से चादर हटाई और  जोर-जोर से रोना शुरू  कर दिया। हमने इस गमगीन मुद्रा के कई शॉट ले डाले। तीये की बैठक के बाद मित्र आया और कहा- फोटो दिखाओ। रोता हुआ मैं अच्छा तो लग रहा हूं न। अब हम उसे कैसे बताते कि उस दिन हम अपने कैमरे में रील डालना भूल गए थे। खैर साहस करके उसे बताया। और जैसे ही उसने यह सुना वह चिल्ला कर बोला- नीच! तू चंद रूपयों के लिए मुझे बेवकूफ बना रहा था। मैंने शान से अपने पिताजी की चकडोल निकाली थी। उन्हीं फोटो को दिखाकर मुझे अपने भाइयों से खर्च लेना था। तू मेरा दोस्त नहीं दुश्मन निकला।

    दरअसल वह कैमरा हमें अपने नानाजी से विरासत में मिला था। नानाजी ने उसे एक फिरंगी से खरीदा था। उस कैमरे में कई एडजेस्टमेंट थे कि जिन्हें सिर्फ नाना जानते थे। उनके खींचे फोटो इतने शानदार होते थे कि शहर के बडे-बडे रईस उनसे फोटो खिंचवाकर अपने कमरों में लगाते। लेकिन वह कैमरा हमसे मजाक करता। कभी तो इतने अच्छे रिजल्ट देता कि पूतना सदृश्य नारी को विश्व सुन्दरी की तरह दर्शाता और कई बार....। जब कभी किसी के बच्चा होता तो हमें बुलाया जाता। रिश्तेदार फोटो तो खिंचवा लेते पर पैसे नहीं देते। हमने एक उपाय निकाला। एक रंगबिरंगा झबला बनवाया और जिस बच्चे की तस्वीर खींचनी होती उसे वह झबला पहना कर खाली कैमरे का बटन दबाते। और तीसरे दिन उसके बाप को फोटो दे आते। फोटो देखते ही वह खुश हो जाता। दरअसल हमने एक छोटे बच्चे का एक फोटो खींच उसके दर्जनों प्रिंट बनवा लिए थे। लोग बच्चा नहीं, वह फूलों वाला झबला देख उसे अपनी औलाद मान बैठते। तब हमें यकीन हुआ कि सारे बच्चे बचपन में एक जैसे ही लगते हैं। कैमरे के कैद होने की नौबत तब आई जब हमने बडे शौक से अपनी नई-नई श्रीमतीजी का फोटो खींचा और जब उन्हें लाकर दिया तो वे लगभग चीख पडीं, क्योंकि फोटो में उनकी लम्बी नाक चिपकी सी लग रही थी। वे गुस्से से बोलीं-ये मेरा नहीं किसी बन्दरिया का फोटो है और हमसे कैमरा छीनकर उसे कैद कर दिया।
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