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दूध की नदी
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23 जनवरी 2010, 11:45 hrs IST
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पवार साहब के मुंह से भविष्यवाणी सुनते ही हमारा दूधवाला सुबह-सुबह मुस्कराता हुआ आया और कहने लगा- बाऊजी! तैयार हो जाइए। अब तो दूध के दाम बढाने पडेंगे। इतने दिनों से हम कह रहे थे कि दाम बढा दो, दाम बढा दो तो आप तैयार नहीं हो रहे थे। अब तो अपने मंत्रीजी तक ने बोल दिया। दूधवाले की बात सुनकर हमने कहा, भैया। तुम कौन सी कसर छोडते हो। पहले दूध में पानी मिलाकर लाते थे आज-कल पानी में दूध मिलाकर ला रहे हो। दूधवाला हमारी बात सुनकर उदास हो गया और कहने लगा- सच कहते हैं साहब। आपको पानी जैसा दूध पिलाकर हमारा मन राजी नहीं होता। लेकिन करें तो करें क्या। बाजार में जाकर चारे का भाव पूछिए। पहले ढंग से बरसात होती थी। चौमासा होता था यानी वर्षा चार महीने चलती थी। तब जंगल हरे-भरे रहते थे। हमें अपने पशुओं को चराने में दिक्कत नहीं थी। वे भरपेट खाते और खूब दूध देते। जब दूध ही बहुतायत में था तो हमें पानी मिलाने की जरू रत नहीं रहती थी। लेकिन अब न भगवान पानी बरसाता है और न जमीन हरा-भरा उपजाती है। शहरों के आस-पास की धरती पर हरे-भरे जंगल की जगह कंक्रीट के जंगल उग गए। लोग धरती की कोख से जमकर पानी निकाल रहे हैं। खेतों में कॉलोनियां बस गई। जब पशुओं को खाने को नहीं मिले और वे भूखे डकराते रहें तो किसका मन करेगा कि वह पशु पाले। रही बात दूध की खपत की, वह इतनी बढ गई कि पूछो मत। एक आदमी दिन में पाव दूध नहीं पीता, छह कप चाय पी जाता है। बेचारा गरीब तो अपने बच्चे को दूध दिखा भी नहीं सकता। आदमी सोचता है कि सरकारी डेयरियां दूध उत्पादित करती हैं पर यह नहीं सोचता कि डेयरियों में दूध आता कहां से है। दूधवाले की बात सुनकर हमने कहा- भैया। सुनते हैं कि गांव-देहात में तो दूध की नदी बहती है। यह सुनकर दूधवाला ठहाका मारकर हंस पडा और बोला- बाऊजी! आप भी किस जमाने की बातें कर रहे हैं। एक जमाना था कि जब इस देश में दूध-दही की नदियां बहती थीं। तब अपने देश में घने जंगल थे। हर घर में पशु पाले जाते थे। पशु आदमियों से ज्यादा थे। गांवों के आस-पास नदी तालाब होते थे। सार्वजनिक गोचर थे। इन गोचरों में गांव भर के पशु मजे से चरते थे। लेकिन आदमी ने सबसे पहले अपने हाथों से ही इन गोचरों को खत्म किया। तालाबों को पाटकर कॉलोनियां बना लीं। जब पशुओं को न पीने का पानी बचा और न चरने को जंगल तो वे खाएंगे-पिएंगे कहां से आदमी के बच्चे को खाने को नहीं मिलता तो वह सडक चौराहे पर आकर चिल्लाता है। सरकार को गरियाता है। नेताओं की हाय-हाय करता है और जब उसके पशुओं को खाने को नहीं मिलता तो वह उन्हें कसाई के हवाले कर देता है। ऎसे में दूध-दही की नदी की कल्पना करना खुराफाती दिमाग का काम हो सकता है, अब नदी तो क्या नाली तक नहीं बहती। बाऊजी। बुरा न मानना ऎसा ही चलता रहा तो आपके नाती-पोते सिर्फ सुनेंगे ही कि कभी इस देश में पशु दूध देते थे।
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