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उजागर प्रेम
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25 जनवरी 2010, 10:58 hrs IST
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कहने वाले कह रहे हैं कि नेहरू और एडविना के प्रेमपत्रों को उजागर किया जाए। ये प्रेमपत्र साहित्य की धरोहर हैं। इन प्रेमपत्रों के सामने आने से भाषा के कई रू प सामने आएंगे। हो सकता है कि इन प्रेमपत्रों को सार्वजनिक करने वालों की सोच सही हो, लेकिन जहां तक हमारी मोटी बुद्धि का ताल्लुक है हम नहीं चाहते कि कोई भी प्रेमपत्र उजागर किया जाए। चाहे वह पंडितजी और लेडी माउन्टबेटन के प्रेमपत्र हों या कल्लू की छोरी और लल्लू के छोरे के। प्रेमपत्र नितांत निजी किस्म की चीजें हैं। प्रेमपत्र किन शिद्दत के क्षणों में लिखे जाते हैं यह बात वही समझ सकता है जिसने कभी प्रेमपत्र लिखे हों। प्रेमपत्र लिखना बडी बहादुरी का काम है। उससे भी बडी बहादुरी है उन प्रेमपत्रों को उस तक पहुंचाना जिसे वे लिखे गए हैं। कसम सफेद कागद और काली स्याही की, इस संसार में ऎसे हजारों लोग हैं
जिन्होंने प्रेमपत्र लिखे तो जरू र हैं पर उन्हें कभी दिया नहीं। एक तो प्रेमपत्र लिखना ही जोखिम भरा है और दूसरे उन्हें प्रेषित करना और भी खतरनाक है। हमारे मित्र ओमजी ने अपनी सहपाठिन को प्रेमपत्र लिखा और उसे एक नन्हें कासिद के संग अपनी प्रेमिका तक पहुंचाने का प्रयास किया लेकिन संदेशवाहक की गफलत से वह प्रेमपत्र प्रेमिका के पहलवान पिता के हाथ पड गया। प्रेमिका का पिता भी बडा समझदार था। उसने ओमजी को बहाने से अपने अखाडे में बुलाया और कुश्ती में जोर करते-करते ओमजी को समझा दिया कि अगर आईन्दा उन्होंने इस तरह की हरकत की तो चींटी की तरह मसल दिए जाओगे। पहले तो ओमजी घबरा गए, लेकिन वे प्रेम के सच्चे पुजारी थे। उन्होंने प्रेम प्रसंग की इस दस्तावेजी कार्रवाई को त्यागा और नयनों की पतंग लडाने लगे।
ऎसा नहीं है कि प्रेमपत्र नेहरू और एडविना ने ही लिखे हैं। रूक्मणी का विवाह उसके भाइयों ने शिशुपाल से तय कर दिया था। शिशुपाल तो बारात लेकर पहुंच भी गया था, तब रूक्मणी ने कृष्ण को प्रेमपत्र लिखा और एक ब्ा्राह्मण के हाथ भेजा। उत्तर में कृष्ण स्वयं ब्याह में पहुंच गए और रूक्मणी का हरण कर विवाह रचा लिया। असली प्रेमपत्र वे कहे जाते हैं जो दोनों तरफ से लिखे गए हों। जहां तक प्रेमपत्रों को सार्वजनिक करने का मसला है इसे हम प्रेम करने वालों की तौहीन समझते हैं। प्रेमपत्रों में आदमी अपना दिल चीरकर रख देता है। प्रेमपत्र उजागर होने पर क्या होता है इसके लिए आपको राजकपूर, वैजयन्ती माला और राजेन्द्र कुमार की फिल्म 'संगम' देखनी चाहिए। प्रेमपत्र का रहस्य खुल जाने पर बेचारे सच्चे प्रेमी को अपनी जान देनी पडती है। आजकल के नौजवान तो प्रेम को इस तरह निपटाते हैं जैसे किसी पिज्जाहट पर खडे-खडे पिज्जा खा रहे हों। खाया-पिया, हाथ पौंछे और हो गया। हम एक गुजारिश उन महानुभावों से करना चाहते हैं जिन्होंने प्रेमपत्रों का दोतरफा ट्रैफिक चलाया है। उन्हें अपने प्रेमपत्रों को सुरक्षित रखना चाहिए और उनकी बाकायदा वसीयत बनानी चाहिए। कौन जाने एक दिन इस बाजारू समय में प्रेमपत्र लाखों में बिकें। तब कम से कम औलादें याद तो करेंगी और कहेंगी कि देखो हमारा बाप हमारे लिए क्या छोडकर गया था- प्रेमपत्रों का खजाना।
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