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सोमवार, 15 मार्च, 2010
जय गणतंत्र
26 जनवरी 2010, 11:50 hrs IST
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जनवरी की छब्बीस और अगस्त की पंद्रह तारीख का क्या महत्व है। अगर हम यह बताने लगेंगे तो आप हमें पांचवीं कक्षा में पढने वाला बच्चा समझेंगे, क्योंकि अब इन दोनों तारीखों का महत्व निबंध लेखन से ज्यादा नहीं बचा है। बचे भी तो कैसे हमने इन दिनों को अद्भुत तरीके से कर्मकांडी बना दिया है। हो सकता है कि आप इस दिन उसी तरफ प्रफुल्लित हों, जैसे इस देश के लोग पचास-पचपन बरस पहले होते हों। तब छब्बीस जनवरी की परेड और झांकी देखना ऎसे ही था, जैसे कैलाश मानसरोवर के दर्शन करना। आज हमारा गणतंत्र दिवस है, लेकिन हमने अपनी सुविधा के लिए इसे गण और तंत्र में विभाजित कर दिया। गण को गौण करके तंत्र को हावी कर दिया। गणतंत्र दिवस अब एक ऎसा पर्व बन गया, जिसमें टेंडर पर निर्मित झांकियों को देख हम फूले नहीं समाते। 
आजादी के इन वर्षो में हमने एक काम बखूबी किया। बेचारे 'गण' को और अधिक बेचारा कर दिया और 'तंत्र' को इतना मशीनी बना दिया कि अब इसमें घुसना ऎसे ही है, जैसे उस अंधी सुरंग में घुसना जहां सिर्फ भ्रष्टाचार की टार्च के सहारे ही प्रवेश किया जा सकता है। ईमानदारी की मशाल तो वहां तुरंत गुल हो जाती है। इस गणतंत्र के गणों को सुरक्षित रखने के लिए हमने तीन स्तम्भ बनाए थे- कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका। प्रेस ने अपने आपको चौथा स्तम्भ बना लिया था, लेकिन अब तो लगता है कि इन चारों स्तम्भों में दीमक लगने लगी है। मंत्री, अफसर और हाकिम, तीनों के घरों को जाकर देखो तो इतना माल मिलेगा कि धन के देवता कुबेर भी शरमा जाएं। प्रेस में भी अब पैसे लेकर खबरें बनाने के समाचार आने लगे हैं। ऎसे में बेचारा गण क्या करे। पचास-पचपन रूपए किलो चीनी और अस्सी-पिचासी रूपए किलो की दाल वाले युग में बेचारा गरीब अपना पेट कैसे भरे। एक ओर शिक्षा की दुकानें खुल रही हैं, जहां ऎसी नस्ल तैयार की जा रही है, जहां पैसा कमाने और पैसा उडाने से ज्यादा कुछ सिखाया ही नहीं जा रहा। जो चुप है, जो शांत है, जो संतोषी है, जो मगन है, उसे बेवकूफ बताया जा रहा है। यह कैसा तंत्र है, जहां गण को एक इनसान से ज्यादा पुर्जा समझा जा रहा है। एक ऎसा पुर्जा जो चलते-चलते घिस जाए तब उसे निकालकर मशीन से बाहर कबाड में फेंक दो। मजे की बात यह है कि इस सोच को हवा देने में हमारी कल्याणकारी सरकार भी शामिल है। हमारा विश्वास तो इस तंत्र से उठता जा रहा है। जहां झूठों का बोलबाला हो, जहां बेईमानों की जय हो।
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