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गुरुवार, 11 मार्च, 2010
दौडम दौड
28 जनवरी 2010, 11:04 hrs IST
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यह युग भागने-दौडने का है। बच्चा जब ढाई साल का होता है तभी से मम्मी- डैडी उसे दौड में शामिल कर देते हैं। जब बच्चा खेलना चाहता है तो उसके मुंह में अंग्रेजी की कविताएं फंसा दी जाती हैं- लिटिल स्टार टाइप। इसके बाद शुरू  हो जाती हैं परीक्षाएं। बेचारे बच्चे को नए कपडे और नए जूते पहना कर गले में नई टाई लटका दी जाती है और इन्टरव्यू के लिए ले जाया जाता है। कसम भोलेनाथ की। हम ढंग की नौकरी पाने में इसलिए विफल रहे कि इन्टरव्यू के नाम पर हमें बुखार चढ जाता था। गला सूख जाता था और टांगें थर-थर कांपने लगती थीं।

अब ऎसे व्यक्ति को कौन ढंग की नौकरी देता। यह अलग बात है कि अल्लाह की मेहरबानी से अब खुद इन्टरव्यू बोर्ड में बैठने लगे हैं। बावजूद इसके हमें पता है कि इस भाग दौड की जिन्दगी में सफल वही है जो अति-आत्मविश्वास से झूठ बोल सके। आज दौड सच के लिए नहीं है, क्योंकि सच किसी दौड में नहीं पडता। सच को भागने की जरूरत भी नहीं है। अलबत्ता लोग सच से जरू र भागते हैं। आज ऎसे लोगों की कमी नहीं जो अमरीका के पैसे की बीयर और वाइन पीकर पूंजीवाद को भरपूर गाली देते हैं। यही लोग दौड में शामिल हैं। आप किसी शहर के व्यस्त चौराहे पर चुस्की चूसते हुए लोगों को देखिए। अपने आप पता चल जाएगा कि लोग कैसे भाग रहे हैं हर किसी को जल्दी मची है। इस जल्दी में वे कहां पहुंचना चाहते हैं, इसके बारे में उन्हें खुद को पता नहीं। लेकिन दौडने से आदमी गंतव्य पर पहुंच ही जाए, यह जरू री नहीं।

ओलम्पिक की दौड और जिन्दगी की दौड में फर्क है। आजकल देश के लिए, प्रांत के लिए और शहर के लिए दौडने का फैशन भी चल रहा है। कभी-कभी लगता है कि लोग कमाने के लिए दौड रहे हैं। कुछ लोग नाम के लिए दौड रहे हैं। जिनके पास माल और नाम दोनों हैं वे किसके लिए दौड रहे हैं, यह उन्हें भी पता नहीं। कई दौड बडी विचित्र होती हैं जैसे बिल्ली दौड। फिरंगी देशों में एक दौड होती है जिसमें बिल्लियां दौडती हैं। वे बिल्लियों के आगे एक इलेक्ट्रिक चूहा दौडाते हैं। उसे खाने के चक्कर में बिल्लियां भी दौडती हैं। ऎसी दौड दौडाने वालों की हमारे यहां भी कमी नहीं। फर्क सिर्फ इतना है कि वे लालच का चूहा दौडाते हैं और उसके पीछे आदमी बिल्ली बन कर दौडता है। अपने यहां उसे सफल माना जाता है जो सबसे तेज दौडता है। उसी की प्रशंसा होती है। अभी पिछले दिनों हम भी एक दौड में पहुंचे। हमारा मकसद दौडना नहीं सिर्फ तमाशा देखना था। दौडने वाले तो दौड गए, पर पीछे तमाशबीनों को पुलिस ने पीट डाला। पुलिस को देख हम दौड पडे। आगे हम पीछे डंडा उठाए पुलिस। पुलिस वाले ने हमें दबोच लिया। हमने कहा- महाराज! हम तो 'वीर' को देखने आए थे। वह बोला- डोकरे! सफेदी आ गई, पर तेरी आदत नहीं गई। उस वक्त हमें वह पुलिस वाला बुद्ध का अवतार लगा, जिन्होंने कहा था- शिष्यों तृष्णा छोडो। दौडना भी तृष्णा ही तो है।
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