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रविवार, 14 मार्च, 2010
वाह, क्या कहना
29 जनवरी 2010, 10:56 hrs IST
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भारत सरकार के विज्ञापन में पाकिस्तान के पूर्व सेनाध्यक्ष का फोटो छप गया। वाह क्या उदाहरण है। मंत्री महोदय पहले बोलीं कि यह कोई खास बात नहीं, क्योंकि वे भी किसी माता के पुत्र हैं। सही कहा उन्होंने। हम कहां मना करते हैं। चाहे भारत के विभाजन की मांग करने वाले जिन्ना हों, या एक हजार बरस तक भारत से लडने की चाह रखने वाले जुल्फिकार अली भुट्टो हों या करगिल में घुसपैठ कराने वाले जनरल परवेज मुशर्रफ हों या फिर मिस्टर दस परसेन्ट आसिफ अली जरदारी हों। ये सब हैं तो किसी न किसी माता के पुत्र।

सच बात तो यह है कि इस पृथ्वी पर जन्म लेने वाला बच्चा जन्म लेते वक्त तो एक शिशु से ज्यादा कुछ नहीं होता। यह तो दुनिया के रस्मो-रिवाज, धर्म, आडम्बर, पाखण्ड ही हैं जो उसे एक खास ढांचे में ढाल देते हैं। अगर पाकिस्तानी पूर्व सेनाध्यक्ष की जगह मंत्री महोदया कृष्णा तीरथ किसी पाकिस्तानी बच्चे की तस्वीर लगा देतीं, तो कसम से कोई नहीं पहचान पाता, पर यह तो जानते-बूझते मक्खी निगलने वाली बात हुई। दुनिया जानती है कि पाकिस्तानी सेना का भारत के प्रति क्या रूख रहता है। यह तो उसका बस नहीं चलता नहीं तो वह जीना हराम कर दे। पाकिस्तानी तानाशाह जनरल अय्यूब खान ने कहा ही था कि युद्ध होने पर मेरी सेना अपना ब्ा्रेकफास्ट लाहौर में, लंच अमृतसर में और डिनर दिल्ली में जाकर करेगी, लेकिन ऎसा हो न सका। अब हमारी मंत्री महोदया पाकिस्तानी जनरल का फोटो छाप कर क्या संदेश देना चाहती हैं

पहली नजर में तो यही लगता है कि हमारी सरकार कितने निकम्मेपन से काम कर रही है। हो सकता है कि विज्ञापन तैयार करने वाले और उसे जारी करने वाले पहचान ही नहीं पाए हों कि यह तस्वीर किसकी है कल को यह भी हो सकता है कि वे बापू की जगह जिन्ना का और पंडित नेहरू  की जगह
जनाब भुट्टो की तस्वीर प्रकाशित कर दें। गावस्कर की जगह इमरान खान का और सचिन की जगह वसीम अकरम का चित्र छप जाए।

दरअसल अपने देश में एक जुमला बडे जोर से चलता है- क्या फर्क पडता है। हम बडी से बडी गलती कर जाते हैं और उसके लिए एक बलि का बकरा तलाशते हैं। शरद जोशी के मशहूर नाटक एक था गधा उर्फ अलादाद खां में यही तो होता है। राज्य के नवाब को एक दिन पता चलता है कि जनाब अलादाद खां साहब चल बसे। अपनी मशहूरी के लिए नवाब साहब ऎलान करवा देते हैं कि वे अलादाद खां के जनाजे को खुद कंधा देंगे। बाद में पता चलता है कि अलादाद खां कोई आदमी नहीं बल्कि एक गधा था। अब नवाब परेशान होते हैं और अपने कोतवाल को हुक्म देते हैं कि उनके कंधा

देने के लिए एक अदद लाश का इंतजाम किया जाए, क्योंकि वे एक गधे को तो कंधा दे नहीं सकते और सारा प्रशासन खोजबीन कर एक भले आदमी को खोज निकालता है जिसका नाम अलादाद खां होता है। जनाजा उस भले आदमी का निकलता है।
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