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सोमवार, 15 मार्च, 2010
दूध और दारू
30 जनवरी 2010, 12:00 hrs IST
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पिछले दिनों दो बडे जोरदार वाकये हुए। पुलिस ने एक ऎसा वाहन पकडा जिस पर 'दूध' लिखा हुआ था और जब उसकी तलाशी ली गई तो उसमें से दारू  निकली। दूसरी घटना और भी मजेदार है। एक ग्रामीण स्कूल के गणतंत्र दिवस के दिन बच्चों को खिलाने के लिए लड्डू की पेटियां आई। बेचारा हैडमास्टर हाथा-जोडी करके छब्बीस जनवरी- पंद्रह अगस्त को लड्डुओं का इंतजाम करता है। स्कूल में झंडारोहण के बाद लड्डू बांटने का सिलसिला शुरू  हुआ। और जैसे ही पेटी खोली गई उसमें लड्डुओं की जगह दारू  की बोतलें निकलीं। इन दोनों वाकयों से यह जाहिर हो गया कि अब अपने देश में 'दारू  क्रांति' हो चुकी है। दूध की जगह शराब की नदियां बहती हैं। अगर आप सांझ को शहर के किसी व्यस्त मार्ग पर शराब की दुकान के सामने खडे हो जाएं तो पता चलेगा कि लोग किस उतावली से शराब खरीदने के लिए आते हैं। और आठ बजते-बजते तो बुरा हाल हो जाता है।
कल्याणकारी सरकारों के लिए भी शराब से आने वाला राजस्व आय का बडा जरिया बन चुका है। भंग की तरंग और दारू  के नशे में आदमी फन्ने खां बन जाता है और अपने आगे किसी को भी कुछ नहीं समझता। यही कारण है कि अब दूध से ज्यादा दारू  को तरजीह दी जाने लगी है। जहां तक लड्डुओं की पेटी से शराब की बोतल निकलने की बात है, यह घटना हमारे लोकतंत्र के परिपक्व होने का संदेश देती है। हमारी समझ से हुआ दरअसल यह होगा कि गांव में होने वाले पंचायत चुनाव में बांटने के लिए लड्डू और शराब दोनों मंगाए गए होंगे। गलती से दारू  की जगह लड्डू बंट गए और शराब की पेटियां धरी रह गई और लड्डू के चक्कर में ये पेटियां स्कूल पहुंच गई। जहां तक समकालीन समय में क्रांति का प्रश्न है, वह तो हमारे देश में प्रतिदिन होती रहती हैं। सांझ को छटांक भर पीकर आदमी स्वयं को क्रांति देव समझने लगता है। नशे में देश, समाज, जाति बिरादरी तो छोडो ब्ा्रह्माण्ड और भगवान् तक को बदलने की बात करने लगता है। उस वक्त तो लगता है मानो जो क्रांति कई दशक बाद होने वाली थी, वह बस अभी इसी वक्त ही हो जाएगी। महंगे शराबखानों में दिनभर घूम-घूमकर माल बेचने वाले एक्जीक्यूटिव अपने मालिकों के खिलाफ क्रांति करने का प्लान बनाते हैं। लगता है जैसे सुबह तक वे सारा निजाम बदल देंगे। इसी तरह रात को नेताजी अपने निजी चमचों के साथ महंगी सुरा का आनंद लेते हुए विरोधियों को नेस्तनाबूद करने की योजना में लीन रहते हैं। छापाखाना क्लबों में लेखक मक्सिम गोर्की की टक्कर का उपन्यास लिखने का प्लान करते हैं और घोषणा करते हैं कि इस उपन्यास के बाजार में आते ही इस धरती पर असमानता नष्ट हो जाएगी। सब समान हो जाएंगे। लेकिन हाय! ये सारी क्रांतियां, सारी योजनाएं, सारे प्लान धीरे-धीरे सोडे की बोतल से निकलने वाले झागों की तरह फूट जाते हैं। दारू  पीकर क्रांति का थूक उछालने वालों से अच्छे तो वे ही हैं, जो दूध पीकर चैन की नींद सोते हैं और दूसरे दिन ढंग से अपना काम करते हैं।
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