मुम्बई । बीमा नियामक आईआरडीए ने कैशलेस विवाद से पल्ला झाड लिया है। आईआरडीए का कहना है कि स्वास्थ्य बीमा कंपनियां और अस्पताल ही मिलकर इस समस्या को हल करें, क्योंकि इलाज के लिए एक जैसी दरें तय करना मुमकिन नहीं है।
आईआरडीए के चेयरमैन जे. हरिनारायण ने कहा कि स्वास्थ्य बीमा पर नए मसौदे के दिशानिर्देश जल्द आ जाएंगे। उन्होंने बताया कि प्रीमियम के मुकाबले क्लेम के भुगतान में कमी आ रही है। उनके मुताबिक क्लेम अनुपात करीब 70 प्रतिशत होना चाहिए। साथ ही आईआरडीए चेयरमैन ने कहा कि फिलहाल स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी धारकों की संख्या 50 लाख है और कंपनियों का लक्ष्य करीब पौने 2 करोड होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि इलाज का खर्च तय करने में पारदर्शिता होनी चाहिए। भुगतान के तरीकों से क्लेम पर बुरा असर नहीं होना चाहिए। उनका मानना है कि हर एक अस्पताल को एक ही इलाज के लिए समान चार्ज तय करना मुमकिन नहीं है।
टीपीए और अस्पतालों के बीच क्लेम भुगतान नियमों के मुताबिक नहीं है। फिलहाल बीमा नियामक इरडा को उम्मीद है कि कैशलेस इलाज सुविधा को लेकर जारी विवाद जल्द सुलझ जाएगा। इस संबंध चारों बीमा कंपनियों की बैठक आयोजित की गई है।
बंद कर दी थी कैशलेस सुविधा
उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक क्षेत्र की बीमा कंपनियों ने कुछ प्रमुख अस्पतालों में मेडिक्लेम पॉलिसीधारकों से कैशलेस इलाज की सुविधा वापस ले ली थी, पर बाद में काफी होहल्ला मचने के बाद बीमा कंपनियों ने मामले दर मामले के आधार पर कैशलेस सुविधा को बहाल करने की घोष्ाणा की है। न्यू इंडिया एश्योरेंस, यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, नेशनल इंश्योरेंस तथा ओरियंटल इंश्योरेंस ने एक जुलाई से कैशलेस इलाज की सुविधा रोक दी थी।
इन कंपनियों का आरोप था कि कुछ निजी अस्पताल इस सुविधा के नाम पर जरूरत से ज्यादा बिल बना रहे हैं। हालांकि, बाद में इन कंपनियों ने कुछ मामलों में यह सुविधा देने का फैसला किया था। हरिनारायण ने कहा, मेरी नजर में यह मामला बीमा कंपनियाें, अस्पतालों और उनके नेटवर्क के बीच कमीशन के लेनदेन से संबंघित है। यह नियमन से जुडा मसला नहीं है।
उन्हाेंने कहा कि नियामक इस मामले में तभी हस्तक्षेप करेगा जब मेडिक्लेम पॉलिसी अनुबंध के बीच किसी तरह का उल्लंघन होता है।