|
कहानी जो दिल में उतर जाए
|
|
03 जनवरी 2010, 12:09 hrs IST
|
|
|
प्रख्यात कहानीकार मेहरून्निसा परवेज की कहानियों ने समाज की विसंगतियों को असरअंदाज तरीके से उठाया है। इनकी कहानियां अंग्रेजी, उर्दू, मलयालम, पंजाबी, गुजराती, उडिया और मराठी भी अनुवादित हो चुकी है। पेश हैं उनसे हाल ही हुई बातचीत के प्रमुख अंश।
आपने लेखन के लिए पहली बार कलम कब पकडी मेरे पिता मजिस्टे्रट थे। बीच में सीधा हाथ सुन्न होने से वे काम नहीं कर पाते थे। पिताजी ने मुझसे पहला पत्र जो सत्तर या अस्सी पेज का था लिखवाया, जब मैं अच्छे तरह लिख पाई, वे मुझसे जजमेंट लिखवाने लगे। पहले जज अपने जजमेंट हाथ से लिखा करते थे। सुबह घूमने जाना पिताजी के जजमेंट लिखना और स्कूल जाना, यह काम दो वर्षो तक चला। पिताजी ठीक हुए और मैं खाली।
पुन: लेखन कैसे शुरू हुआ इन दो वर्षो में मुझे पत्र लिखने के साथ-साथ जजमेंट की भी समझ आ गई थी। मैंने मां शहजाद खान को हिंदी पढाना शुरू किया वे धीरे-धीरे हिंदी में पता लिखना सीख गई, साथ ही वे चिटि्ठयां पढने लगीं, फिर तो वे मेरी लिखी कहानियां भी पढने लगीं, जिन्हें मैं सबसे छुपाकर रखती थी। वह समय ऎसा था कि खुलेआम लेखन का कार्य किया जा सके, उस पर लडकी तौबा...। मेरा पहला पत्र जो मंैने पिताजी को लिखा था, लेकिन कभी पोस्ट नहीं किया था, धर्मयुग में छपा। यह पत्र पिताजी ने दौरे के दौरान पढा, जिसमें मेरी ढेर सी फरमाइशें थीं, उस समय हमारे पिताजी दौरे से लौटने पर कुछ लाते नहीं थे। पत्र पढकर पिताजी को बहुत दु:ख भी हुआ था।
आपकी कहानियों ने कब पत्र-पत्रिकाओं में स्थान लिया 1963 में धर्मयुग में पहली कहानी 'जंगली हिरनी' छपी जो आदिवासी परिवेश में पली-बढी लडकी की कहानी थी। 1969 में 'आंखों की दहलीज' उपन्यास छपा। इस उपन्यास से जुडी एक रोचक बात बताती हंू। कुछ सालों बाद जब इस उपन्यास की नायिका तहमीना भोपाल मिलने आई तो मेरे आश्चर्य का अंत नहीं था, लखनऊ की इन्कम टैक्स अधिकारी तहमीना ने सवाल किया कि अब यह नायिका क्या करे मैं अपनी कलम की ताकत पर फख्र कर रही थी, सारी जिंदगी जिस कलम ने मुझे सहारा दिया, उसी का प्रत्यक्ष प्रमाण देखकर आत्मा की तृप्ति के साथ साथ कलम की सार्थकता के साक्षात दर्शन, अद्भुत था।
सम्मान अपको क्या महसूस करवाते हंै हमारे होने को प्रमाणित करते हैं। 1977 में लिखा उपन्यास 'कोरजा' को 1980 में मध्यप्रदेश सरकार का 'अखिल भारतीय महाराजा जूदेव' राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसी उपन्यास को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा सम्मानित किया गया। इसी वर्ष कहानी संग्रह 'गलत पुरूष' प्रकाशित हुआ।
आप कई संस्थानों से भी जुडी रही हैं। क्या आप समाज व देश के लिए कुछ बेहतर कर पाईं वेश्यावृत्ति जैसे सामाजिक अभिशाप पर टेलीफिल्म, 'लाजो बिटिया' 1997 में बनाई, स्वतंत्रता संग्राम पर आधरित लोकप्रिय घारावाहिक 'वीरांगना रानी अवंतिबाई' का निर्माण और निर्देशन 1998 में किया। मेरे संस्मरण तथा सामाजिक समस्याओं पर लेखों से कमजोर वर्गो में सामाजिक चेतना को बढावा मिला, साथ ही उनके उत्थान के लिए सरकार और सामाजिक संगठनों को वांछित सहयोग देने के लिए प्रेरित किया। मंैने बस्तर के आदिवासी तथा छाबडा जाति के लिए विशेष कार्य किए हैं।
आपके कहानी संग्रह 'लालगुलाब' ने काफी सराहना बटोरी, इस संग्रह का ख्याल कैसे आया मेरे बेटे की पहली बरसी पर कब्र पर गई तो देखा, मुझसे पहले कोई उसकी कब्र पर लालगुलाब की कली रख गया था। मन दु:खी तो था पर एक ख्याल यह भी रहा कि मेरे अलावा भी कोई है जो मेरे दुख में साथ है। यह 'लालगुलाब' उसी की देन है।
आपको कई सम्मान मिले हंै, आप उनमें से किस सम्मान को पाकर प्रफुçल्लत हुई सभी सम्मान से प्रसन्नता तो मिलती है, लेकिन 2005 में राष्ट्रपति भवन में समारोह के समय वहां सभी अपरिचित, अकेलापन घेरता कि तभी ध्यान उपर लटके झूमर से हवा के कारण छोटी-छोटी घंटियां ही कहेंगे उन्हें, मधुर स्वर लहरी प्रवाहित हो रही थी। मुझे लगा मैं अकेली कहां हंू। ये झूमर मेरे सम्मान में अपने स्वर दे रहा है यह अहसास दिल के तहखाने में सदा के लिए बैठ गया। मुझेे राष्ट्रपति द्वारा 'पद्मश्री' से सम्मानित किया गया। यह साहित्यकार की जिम्मेदारी को और पुख्ता करती हैं, मुझे और लेखन को तराशना होगा।
आप धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका जैसी पत्रिकाओं की प्रमुख कहानीकार रही हैं, रविवार, साप्ताहिक तथा नई दुनिया दैनिक, में नियमित रूप से स्तंभ लिखे, अभी आप क्या कर रही हैं इस समय मैं 'समर लोक' पत्रिका का संपादन कर रही हूं। इसी पत्रिका के लिए 19 जून 2003 को 'रामेश्वर गुरू पुरस्कार' से सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका के संपादन का पुरस्कार प्राप्त हुआ है। साथ ही उपन्यास 'मोहर' लिख रही हंू।
आपने अपने ही देश के साथ दूसरे देशों में भी सम्मान पाए हैं सितंबर 1999 में लंदन में आयोजित विश्व हिन्दी भाषा और साहित्य की विशिष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। कई आयोजनों में मैंने भारत की पृष्टभूमि को दूसरे देशों में उकेरा है। लेखन समृद्धि के चलते लंदन, फ्रांस, रूस, आदि देशों का भ्रमण कर कई सम्मेलनों में हिस्सा लिया। अंजना सवि
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|
|