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विदेशों में भारतीय सांस्कृतिक विरासत
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07 फरवरी 2010, 10:51 hrs IST
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भले ही लोक गीत-संगीत की मिठास नई पीढी को ज्यादा आकçष्ाüत नहीं कर पा रही है, लेकिन भारतीय सांस्कृतिक विरासत का विदेशों में डंका बज रहा है।
भारतीय लोक गीत-संगीत को लेकर दुनियाभर में आकर्षण लगातार बढ रहा है। भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुडने, उसमें रम जाने के लिए जहां दुनियाभर में विदेशी छात्रों में होड मची है, वहीं लोकगीतों पर हो रहे शोध भी इन्हें एक नई दिशा दे रहे हैं। अब झारखंड छऊ, पंजाब के भांगडा और उत्तर प्रदेश प्रदेश की नौटंकी दुनिया के कोने-कोने में अपनी गहरी छाप छोड रही हैं। ...और इस अहम काम में जुटी हैं कुछ विदेशी संस्थाएं भी। यानी ग्लोबल होती भारतीय कला-संस्कृति के जलवे अब खेत-खलिहानों से विदेश के विश्वविद्यालयों तक विस्तार पा रहे हैं।
इंडिया का नगाडा इंग्लिस्तान तक 1920 में शुरू हुई इस कला को नौटंकी का नाम देने का श्रेय पहली महिला कलाकार गुलाब बाई कानपुर को जाता है। गुलाबबाई ने पहली बार 1996 में नौटंकी (कंपनी गुलाब थिएट्रिकल) को त्रिनिडाड-टोबैगो रवाना किया। फिर तो इसके प्रति दीवानगी बढती गई। यह विदेशों में इस कदर छाई कि अब अमरीका के ओहायो विश्वविद्यालय के देवेंद्र शर्मा ने इस पर शोध शुरू कर दिया। उन्होंने नौटंकी पर शोध में कार्निवाल थ्योरी में लिखा कि नौटंकी से अधिनायकवाद के प्रति भडास निकालने अथवा दबी कुचली भावनाओं और कुंठाओं को सार्वजनिक करने का सहारा मिलता है। इसी तरह कोलंबिया विश्वविद्यालय, शिकागो विश्वविद्यालय में भी नौटंकी पर शोध किए गए हैं। दरअसल, नौंटंकी ने भारत के अलावा कुछ देशों में रंगमंच पर भी कब्जा जमाया। फिल्म 'मुझे जीने दो' का प्रसिद्ध दादरा गीत 'नदी नारे न जाओ श्याम पैंयां परूं' गुलाब बाई की नौंटंकी की स्थायी प्रस्तुति थी।
उत्तर प्रदेश में नौटंकी कला ने कई दशक तक राज किया। नगाडे की आवाज सुनाई पडते ही हर कोई उसकी तरफ खिंचा चला जाता। समय के साथ इसमें बदलाव भी हुआ, लेकिन बहर-ए-तबील पर गायन के साथ 'कड ड ड ड ड गम' का नगाडा सुनने की बेताबी अभी भी पुरानी पीढी में देखी जा सकती है। यह संस्कृति के साथ ही आर्थिक रूप से भी लोगों से जुडी थी। स्थिति यह हो गई कि हर दो चार गांव में एक दो नौटंकी टीम बनने लगी। शादी-विवाह में यह मनोरंजन का साधन न होकर शान समझी जाती थी। लेकिन 80 के दशक के बाद कम से कम उत्तर प्रदेश से इसके पांव उखडने लगे। इससे जुडे कलाकार दूसरे कामों में लग गए, लेकिन विदेशों में नौटंकी की डिमांड तेजी से बढ गई है। विदेशों में इसके विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए शोध भी शुरू हो गया है। नौटंकी को यूनेस्को ने विशेष नाट्य विधा बता विश्व धरोहर घोषित किया है।
तमिलनाडु से फिलाडेल्फिया तक भरतनाट्यम को लेकर तमिलनाडु के लोग भले उदासीन हों, लेकिन यह विदेशों में खूब पसंद किया जा रहा है। फिलाडेल्फिया में भरतनाट्यम इंस्टीट्यूट खुल गए हैं। फिलाडेल्फिया में खुले इंस्टीट्यूट ऑफ परफार्मिग आट्र्स की जिम्मेदारी प्रसिद्ध नृत्यांगना विजी राव ने संभाल रखी है। विजी राव इस बारे में बताती हैं, 'भरतनाट्यम में बौद्धिकता के साथ ही रचनात्मकता का दर्शन भी है। यही वजह है कि यहां भरतनाट्यम सीखने के लिए फिलाडेल्फिया के अलावा दूसरे देशों से भी युवा आ रहे हैं। भरतनाट्यम में शरीर के अंगों के साथ 108 मुद्राएं बनती हंै, लेकिन हमारे इंस्टीट्यूट में 32 मुद्राओं का प्रशिक्षण चल रहा है।' बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में मास्टर डिग्री लेने के बाद भी विजी ने भरतनाट्यम को ही अपना जीवन माना और आज वह विदेशों में भारत का झंडा लहरा रही हैं। इसी तरह कनाडा में अलकनंदा किशोर भरतनाट्यम का प्रशिक्षण दे रहे हैं।
छऊ छाया दुनियाभर में झारखंड के सरायकेला का छऊ डांस सेंटर अब आयरलैंड, फ्रांस, न्यूजीलैंड, डेनमार्क और जापान के विद्यार्थियों के लिए बडा आकर्षण बन गया है। 1960-61 में शुरू हुए इस सेंटर में इस लोक कला को संरक्षित करने का काम किया जा रहा है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के तहत छऊ का प्रदर्शन देश के विभिन्न हिस्सों में हुआ, साथ ही रशिया, जापान, फ्रांस, कोरिया, इंडोनेशिया, मलेशिया और कई यूरोपियन तथा एशियाई देशों के कलाकारों ने दौरा किया। इन लोगों ने भी छऊ नृत्य को खूब सराहा। सेंटर संचालन कमेटी से जुडे पंकज बताते हैैं कि बचपन में उन्हें यह नृत्य खूब भाता था। युवावस्था में देखा कि यह नृत्य कोमा में जा रहा है। फिर इसे संवारने की कोशिश शुरू की। अभियान कठिन था, लेकिन कदम बढे तो बढते ही गए। पंकज बताते हैैं कि इससे बॉलीवुड के प्रसिद्ध कोरियोग्राफर रेमों इतने प्रभावित हैैं कि उन्होंने एक फिल्म में खुद यह डांस किया। इसके बाद डांस इंडिया डांस में भी एक खास एक्ट को रेमो ने कोरियोग्राफ किया। बंगलुरू के कंटेस्टेंट सलमान ने यह छऊ एक्ट पेश किया, जिसमें उसने स्टेज पर ही अपने हाथ और पैरों पर आग भी लगाई।
अमरीका में भांगडा अमरीकी विश्वविद्यालयों में भी भांगडा का चलन दिनोंदिन बढता जा रहा है। जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी अब पाश्चात्य गीत-संगीत और कला के साथ भांगडा की ब्लोआउट प्रतियोगिता भी आयोजित करने लगी है। बीते साल इस प्रतियोगिता के विजेता रह चुके टीम लीडर सोहेल हसनैन कहते हैं, 'हमें भांगडा पर गर्व है और अमरीका में भी हमारा भांगडा प्रसिद्धि का डंका बजा रहा है। यह वाकई सांस्कृतिक विरासत के विस्तार का बेमिसाल दौर है। 1993 में यूनिवर्सिटी की साउथ एशियन सोसायटी ने भांगडा प्रतियोगिता शुरू की और आज इस बडे आयोजन पर एक लाख डॉलर से ज्यादा खर्च किया जा रहा है। इसी तरह कोलंबिया, कैलीर्फोनिया, न्यूयॉर्क यूनिवसिर्टी में भी भांगडा तेजी से प्रचलित हुआ है।
चंद्रभान यादव
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