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रविवार, 14 मार्च, 2010
बदनामी
17 जनवरी 2010, 10:28 hrs IST
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Story Cartoon
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'यह आवाज तो चूमाचाटी की लगती है। कौन है अन्दर कौन है ये कौन मारफा से प्यार ले रहा है' यह आवाज बगल के कमरे में गूंजती सुनाई दी, साथ ही गंजा मास्टर वान्कन राहदारी से होकर रसोईघर की तरफ दौड लगाता नजर आया।

सुलेख के मास्टर अखनेफ की बेटी की शादी इतिहास और भूगोल के मास्टर लोशादनेच के साथ हो रही थी। शादी का आयोजन बखूबी हो रहा था। हवेली के बडे हॉल में मेजों के गिर्द बैठे मेहमान अपने-अपने खेल में मशगूल थे। नौजवान जोडे नाच-गानों से लुत्फ उठा रहे थे। एक खास किस्म की पोशाकें पहने और सफेद रंग की टाई बांधे हुए बैरे मेहमानों के दरमियान इधर से उधर गर्दिश करते दिखाई दे रहे थे। मेहमानों की आपसी बातचीत की मक्खियों जैसी भिनभिनाहट से हॉल लगातार गूंज रहा था। एक सोफे पर पहलू-ब-पहलू बैठे गणित के मास्टर नतोलोफ फ्रांसीसी पासदेकोई और कंट्रोल ऑफिस के सब इंसपेक्टर मुजदा किसी विषय पर सहमत नहीं थे, फिर भी वो उस वक्त मेहमानों को यह बतला रहे थे कि दुनिया अजीबो-गरीब घटनाओं से भरी पडी है। यहां यह भी देखने में आया है कि एक इंसान जिंदा है, मगर उसे मुर्दा मान लिया गया। न जाने कितने जिंदा लोगों को मुर्दा मान कर कब्ा्रों में दफन किया जा चुका है। उन तीनों का रूहानीयत पर जरा भी विश्वास नहीं था, फिर भी वो रू हानीयत के विषय पर अपने-अपने विचार का इजहार कर रहे थे। परस्पर मतभेदों के बावजूद वो इस नजरिए पर एक राय जरू र थे कि दुनिया में बहुत-सी रहस्यमय चीजें मौजूद हैं, जिनकी तह तक पहुंचने और उनकी असलियत को समझने में इंसानी जहन काम नहीं करता। दूसरी तरफ कानून के माहिर मेहमानों को यह समझाने में मसरू फ थे कि एक मामूली सिपाही को भी यह हक हासिल हो जाता है कि वो संगीन हालात में राहगीरों पर बेहिचक गोली चला दे।

बातचीत के ये विषय खुशी के इस माहौल में हालांकि बेतुके थे, फिर भी कोई बदमजगी नहीं हो रही थी। कुछ कम हैसियत मेहमान जो हीन भावना से ग्रस्त नजर आते थे, आंगन में खडे खिडकियों  से अंदर के माहौल का नजारा कर रहे थे।

ठीक बारह बजे मेजबान अखनेफ रसोईघर में दाखिल हुआ। उसे मुआयना करना था कि खाना सही तौर पर पक कर तैयार हुआ है या नहीं। जैसे ही उसने रसोई में कदम रखा मुर्गे, मछली और बतख के कोरमे की खुशगवार खुशबू (जो फर्श से लेकर छत तक बसी हुई थी) उसे बडी भली मालूम हुई। वहां शराब की बोतलें और कई किस्म के शर्बत ट्रे में रखे हुए थे। बैंचों पर बडे करीने से सजे हुए थे। घरेलू नौकरानी मारफा जिसका चेहरा एकदम लाल था, पेट गैर मामूली तौर पर बडा और कुछ आगे को निकला हुआ, खाने की मेजों पर झुकी अपने काम में मसरू फ थी। 'वैल, मुझे स्ट्रोजिन मछली दिखाओ। कहां रखी है 'अखनेफ ने हाथों को मल कर होंठों पर जबान फेरते हुए बडे जोशीले लहजे में कहा।

वाह! क्या खुशबू है क्या महक है खानों की, जी चाहता है, सब कुछ मैं ही खा जाऊं। आओ, जल्दी आओ, मुझे स्ट्रोजिन मछली दिखाओ।' मारफा लपक कर एक मेज तक पहुंची और घी से तर-ब-तर अखबार एक बडे थाल के ऊपर से हटा दिया। थाल में उसे झिलमिलाती हुई स्ट्रोजिन मछली नजर आई जो काफी बडी थी और तली हुई थी। उस मछली को गाजर, मूली और खीरे के छोटे-छोटे टुकडों से सजाया गया था। उस पर जैतून का तेल भी छिडका हुआ था। अखनेफ ने ललचायी हुई भूखी नजरों से मछली को गौर से देखा और ठंडी सांस भरी। उसके चेहरे पर असामान्य ताजगी फैल गई। आंखों की पुतलियां गर्दिश करने लगीं। होंठ आपस में भिंच कर झटके से अलग हुए और उन होंठों से कुछ ऎसी आवाज निकली जो तेल पी हुई धुरी से पहिया घूमने पर पैदा होती है। वहीं खडे-खडे उसने अपनी अंगुलियां चटखाई और मछली की खयाली लज्जत के एहसास से होंठों को आपस में टकरा कर उन्हें एकदम जुदा कर दिया और इस तरह इस बार भी कुछ ऎसी आवाज पैदा हुई जैसी किसी को जोर से पुचकारने पर पैदा होती है। ऎसी आवाज को लोग चटखारा भी कह देते हैं।

'यह आवाज तो चूमाचाटी की लगती है। कौन है अंदर कौन है ये कौन मारफा से प्यार ले रहा है' यह आवाज बगल के कमरे में गूंजती सुनाई दी, साथ ही गंजा मास्टर वांकन राहदारी से होकर रसोईघर की तरफ दौड लगाता नजर आया। 'ओह! तो ये आप हैं बडी खुशी हुई। खुशी की बात है भी कि अखनेफ जैसा अधेड भी अपने सीने में एक नौजवान जैसा उमंगों भरा दिल रखता है। सामने वाली अगर रजामंद हो तो ऎश करने और जिंदगी का मजा लेने में कोई हर्ज नहीं है। वो रसोइयन है तो हुआ करे, क्या फर्क पडता है। है तो वो औरत ही। खैर, मजे लो, मजे। मैं कबाब में हड्डी नहीं बनूंगा। मैं जा रहा हूं।' 'मैं चूमाचाटी नहीं कर रहा था',  अखनेफ का चेहरा फक्क था और उसकी आवाज कांप रही थी....आखिर तुमने यह कैसे तसव्वुर कर लिया बेवकूफ कि मैं प्यार....यह तो खुशबूदार मछली को देख कर मेरे मुंह से चटखारा निकल गया था और तुम कह रहे हो कि मैं मारफा के प्यार ले रहा था'

वांकन की आंखों में शरारत की चमक थी। उसकी बांछें खिल गई, बोला, 'खैर। कोई बात नहीं....कोई बात नहीं।' इतना कह कर वो लौट गया। अखनेफ का चेहरा अभी तक फक्क था। बेचैनी ने उसे घेर लिया....लानत हो साले पर। अब ये लोगों को बताएगा और खूब नमक-मिर्च लगा कर बताएगा। लगता है, अपनी अफवाहों से ये मुझे शहर में मुंह दिखाने लायक भी न छोडेगा। अहमक कहीं का।' अखनेफ किसी मुजरिम की तरह डरा-डरा और सहमा-सहमा हॉल में जा पहुंचा। उसकी भटकती नजरें वांकन को तलाश कर रही थीं। अचानक ही उसकी खोजी आंखें वांकन पर केंद्रित हो उठीं। उस समय वो पियानो पर झुका हुआ इंसपेक्टर की साली से सरगोशियों में कुछ कह रहा था और इंसपेक्टर की साली उसकी बातों पर हंसी से लोटपोट हुई जा रही थी।

'ओह! तो इस बातचीत का विषय मैं ही हूं।' अखनेफ ने सोचा। खुदा इसे गारत करे। हो न हो, यह नमक-मिर्च लगा कर इसे मेरे बारे में ही बता रहा है। हैरत तो इस बात पर है कि इंस्पेक्टर की साली को इस झूठे व फितनेबाज पर यकीन है। वो कैसी खिलखिला कर हंस रही है। ओह गॉड। मैं यह बर्दाश्त नहीं कर सकता। अब मुझे  ही कुछ करना होगा, जिससे लोग इस झूठे अफवाहबाज की बातों पर विश्वास करना बंद कर दें। अब अस्ल बात मैं सब को बताऊंगा और इस मक्कार को मजबूर कर दूंगा, यह मानने के लिए कि ये परले दरजे का झूठा है। अगर इसे बगलें झांकने पर मजबूर  न कर दिया, तो मेरा नाम भी अखनेफ नहीं है। अफवाह फैलाने और दूसरों को बदनाम करने वालों को सजा तो मिलनी ही चाहिए।

अखनेफ की घबराहट बदस्तूर कायम थी। वो पांव घसीटता हुआ पास्देकोई के पास जा पहुंचा और उससे बोला, 'मैं रसोईघर में खाने के बारे में कुछ हिदायतें दे रहा था। मुझे मालूम है, आप मछलियां बहुत पसन्द करते हैं। खासकर हम रूसियों की पसंदीदा मछली स्ट्रोजिन.. मैंने स्ट्रोजिन का ही बंदोबस्त किया है।

हीं..हीं...हीं...ओह! मैं क्या कह रहा था, यह तो भूल ही गया। हां, तो मैं कह रहा था कि मेरे मुंह में पानी भर आया और होंठों से चटखारे की आवाज निकल गई। इतने में क्या होता है कि अहमक वांकन राहदारी से होता हुआ वहां आ जाता है और कहता है : आह! तो यहां बोसेबाजी चल रही है। अब आप ही बताइए, मैं इज्जतदार आदमी क्या बोसे लूंगा और वो भी अपनी घरेलू नौकरानी मारफा के। अब आप इस अहमक के तसव्वुर की उडान तो देखिए, मुझे मारफा से लगा समझ कर दुनिया भर में बदनाम करता फिर रहा है। अब इस औरत को ही देखिए। क्या कशिश है इसमें कुछ भी तो नहीं और वो है कि बिना रूके कहे चला जा रहा है कि मैं चूमाचाटी कर रहा था। प्यार ले रहा था मारफा के। बदमाश कहीं का।' 'वही वांकन...वो रहा..मैं रसोईघर में पहुंचा...मेरा मतलब है कि...' और उसने वांकन की सारी बात उसे बता दी।' आप ही बताइए, क्या ये इसकी ज्यादती नहीं है। लफंगा बदमाश। सच पूछिए तो मैं किसी कुतिया का बोसा ले लूंगा, मगर मारफा का नहीं। आखिर इस बदसूरत और बेकशिश औरत के प्यार मैं क्यों लेने लगा'
उसने पीछे मुड कर देखा, तो वहां मुजदा खडा था।

'हम लोग वांकन के बारे में बात कर रहे थे,' उसने मुजदा को बताया, 'वो रसोई में आता है और वहां मुझे मारफा के बाजू में खडा देख लेता है। बस, वो वहां से आता है और शुरू  कर देता है उल्टी-सीधी और गलत-सलत बातें। कहता है, मारफा के प्यार ले रहा था। शायद इसने कुछ ज्यादा ही चढा रखी थी तभी इसके शराबी दिमाग ने ऎसी कहानी गढ ली है। कितनी अजीब बात है। मैं कोई कुआंरा या रंडुवा नहीं हूं। मेरी अपनी बीवी मौजूद है। कहता है, मारफा का प्यार लिया। अहमक है अहमक।'

'वही है वांकन। और कौन होगा मैं रसोई में खाने का मुआयना कर रहा हूं कि अचानक वहां चला आता है और....' और तकरीबन पंद्रह मिनट में उसने अपनी सारी कहानी तफसील से बयान कर दी और इस बीच शादी के आयोजन में आए हुए तकरीबन सभी मेहमानों ने वांकन और स्ट्रोजिन वाली कहानी सुन ली। अब अखनेफ को यह सोच कर जरा सुकून नसीब हुआ कि हकीकत सब पर अच्छी तरह जाहिर हो चुकी है। अब भी वांकन अगर बकवास करता है, तो करता रहे। अब उसकी झूठी बातों पर कोई भी कान धरने वाला नहीं है। सुनने वाले यही कहेंगे कि हमें तुम्हारी बकवास नहीं सुननी। सच्चाई क्या है हम अच्छी तरह जान चुके हैं। अखनेफ के सीने से अंदेशों का पत्थर हट चुका था और वो खुद को हल्का-फुल्का महसूस कर रहा था। इत्मीनान और खुशी के आलम में उसने वोदका जैसी नशीली शराब के एक के बाद एक चार गिलास चढा लिए। उसने दूल्हा-दुल्हन को उनके कमरे में पहुंचाया। खूब डट कर खाना खाया और अपने बेडरू म में पहुंच कर नींद के मजे लेने लगा।

फिर अगले दिन सवेरे जब वो घोडा बेच नींद से जागा, तो उसे बडी ताजगी का एहसास हुआ। अब तक वो बीती रात के सारे वाकिए मय वांकन और स्ट्रोजिन मुकम्मल तौर पर भूल चुका था। लेकिन अब इसे क्या कहा जाए कि इन्सान सोचता कुछ है और होता कुछ है। मुंह से निकली बुरी बात कमान से निकले तीर की तरह दूर तक जा कर ही दम लेती है।

ठीक एक हफ्ते के बाद यानी बुध के दिन अखनेफ छात्रों को तीसरा सबक पढा कर कॉमन रू म में जा पहुंचा। वहां वो एक छात्र वेसिकिन की बुरी हरकतों का जिक्र किसी से पूरी तरह कर भी न पाया था कि तभी स्कूल के हैड मास्टर साहब तशरीफ ले आए और आते ही अखनेफ को एक तरफ आने का इशारा किया। अखनेफ लपक कर उनके पास पहुंचा, तो वो फौरन शुरू  हो गए, 'देखिए मि. अखनेफ।' उनके लहजे में हिचकिचाहट थी, 'मैं मुआफी चाहता हूं, क्योंकि मेरा इस मामले से सीधा कोई संबंध नहीं है। फिर भी हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम लोग अध्यापक हैं। हमें कोई बात कभी ऎसी नहीं करनी चाहिए जिससे हमारे छात्रों पर बुरा असर पडता हो। आप खुद भी जानते हैं कि राज अब राज नहीं रहा है। आपकी हरकतें हर कोई जान गया है। सारे कस्बे में हर जगह आप ही का जिक्र है। यह खबर हर जगह गश्त कर रही है कि आप उसके साथ... अरे अपनी उसी रखैल रसोइयन मारफा के साथ रहने लगे हैं। आपके इस निजी मामले से मेरा कोई संबंध नहीं है। क्यों नहीं... क्यों नहीं....जरूर रहो उसके साथ... उसके खूब प्यार लो... सारी हदें फलांग कर ऎश करो... जिंदगी के खूब मजे लूटो, लेकिन महाशय, खुले में सबके सामने नहीं। ये सब कुछ पर्दे के पीछे हो तो बेहतर है। आपको याद रखना चाहिए कि आप एक टीचर हैं। मुझे अफसोस है मैं आपको टोक रहा हूं। मुझे इसके लिए मुआफ कर देना ब्ा्रदर।' अखनेफ भौचक्का रह गया।

उसकी जबान गुंग होकर रह गई थी। घर के रास्ते पर चलते हुए उसे महसूस हो रहा था कि उसके गले में गुनहगार की तख्ती लटकी हुई हैं और सारे राहगीर उसे घूर-घूर कर देख रहे है और उस पर अंगुलियां उठा रहे हैं। उपहासात्मक हंसी हंस रहे हैं। उसके माथे से पसीने की बूंदें टपक रही थीं। उसे अभी यह तो पता ही नहीं था कि मुसीबत घर में बैठी उसके इंतजार में है। घर में वो खाने की मेज पर खामोश बैठा था कि उसकी बीवी ने कहा, 'क्यों क्या बात है खाते क्यों नहीं क्या खाना अच्छा नहीं लगता' फिर वो ज्वालामुखी की तरह फट पडी, 'अय्याश। भूखे भेडिए। वासना के गंदे कीडे। मुझे सब मालूम है, तू मारफा के ख्यालों में गुम है। तू कब से मेरी आंखों में धूल झोंक रहा है। लोगों ने मेरी आंखें खोल दी हैं। आवारा पापी। अब मैं तेरी असलियत जान चुकी हूं।' और इसके साथ ही गुस्से से थर-थर कांपते हुए उसने एक जन्नाटेदार थप्पड उसे गाल पर जड दिया। वो जिस वक्त मेज से उठा, उसे लगा उसके पैरों तले जमीन नहीं है, सर पर हैट नहीं है और न जिस्म पर कोट है। उसका जहन और जिस्म सुन्न हो कर रह गया था। वो घर से बाहर निकल आया और अब उसकी मंजिल वान्कन का मकान था। किस्मत से वान्कन उसे घर पर ही मिल गया।

'कमीने! तुम कितने नीच, कितने गिरे हुए जलील इंसान हो। आखिर तुमने क्यों की यह जलील हरकत क्यों सुनाई सब को मनघडंत कहानियां शहर भर में क्यों किया मुझे सबकी नजरों में जलील व ख्वार क्यों आखिर  क्यों तुम्हें मुझ से किस बात की दुश्मनी थी क्या बिगाडा था मैंने तुम्हारा'
'कैसी दुश्मनी कैसी मनघडंत कहानियां यह आप क्या कह रहे हैं आपको जरू र कोई गलतफहमी हुई है।

'यह बात किसने फैलाई कि मैंने मारफा के बोसे लिए तुमने डकैत, तुमने। तुमने ही मुझे दुनिया भर में बदनाम किया है और अब कैसे अनजान बन रहे हो।' वांकन हैरत व बदहवासी का पुतला बना हुआ था। उसने पलकें झपकाई और बोला। 'अगर मैंने कुछ भी ऎसा किया हो जिससे आपकी इज्जत पर आंच आती है, आपकी रूस्वाई होती है, तो गॉड मुझ पर कहर नाजिल करे। मैं अंधा और अपाहिज हो जाऊं। गॉड मुझे गारत कर दे। मैं इसी वक्त मर जाऊं।' गॉड को गवाह बना कर वांकन ने जिस अंदाज में कस्में खाकर जो कुछ कहा, उसकी रोशनी में शक व शुबहे की गुंजाइश नहीं रही, मगर सवाल पैदा होता है कि अगर वांकन ने ऎसा नहीं किया, तो फिर किसने ऎसा किया कौन है वो, जिसने उसे कस्बे भर में बदनाम करके रख दिया कौन आखिर कौन

अनुवाद: हसन जमाल
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