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सोमवार, 15 मार्च, 2010
कालिदास मेरे रचना आराध्य
24 जनवरी 2010, 12:09 hrs IST
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om joshi
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कालिदास मेरे रचना आराध्य
सर्वाधिक पांच लाख दोहे रचने का संभवत: विश्व कीर्तिमान बनाने और विश्व की सबसे लम्बी हिन्दी कविता 'जय गाथा' महाकाव्य का प्रणयन ढाई से पौने तीन लाख दोहों में करने वाले इन्दौर के डॉ. ओम जोशी से हाल ही बातचीत हुई। पेश हैं बातचीत के चुनिंदा अंश-

नई-पुरानी पीढी में काव्य के प्रति कम होते रूझान से सभी परिचित हैं। ऎसे में आपने महाकाव्य लिखने का साहस कैसे जुटाया
कालजयी रचनाएं हमेशा पढी जाती हैं। मुझे अपनी सृजन क्षमता और ईश्वर के प्रति दृढ विश्वास था इसलिए मैंने सहजता से विश्व की सबसे लंबी कविता और राम कथा महाकाव्य लेखन करने का संकल्प लिया। राम कथा महाकाव्य चार खंडों में प्रकाशित है। यह इसका प्रमाण है। मर्यादा पुरूषोत्तम राम का भारतीय साहित्य-संस्कृति में विशिष्ट स्थान है। ईश्वरीय प्रेरणा से प्रेरित होकर मैंने कार्य शुरू  किया।

विश्व की सबसे लंबी कविता 'जय गाथा' महाकाव्य के बारे में बताएं।
जय गाथा महाकाव्य महाभारत पर केन्द्रित रचना विशेष है। महाभारत जो मूलत: संस्कृत में है उससे समग्रत: हिन्दी दोहों में प्रस्तुत करने का यह प्रथम प्रयास है। वैसे यह ग्रंथ जमीन से प्राय: सात फिट ऊंचा है। इसमें लगभग 14 से 15 हजार कागज लगे हैं। महाभारत मूलत: एक लाख श्लोकों का महाग्रंथ है। इसका प्राय: ढाई से तीन लाख दोहों में पद्यानुवाद किया है।

सृजन के लिए महाभारत का चयन क्यों किया
महाभारत अजीव्य महाकाव्य है। इसमें मूलत: सब कृष्ण की अलौकिक महिमा के समानान्तर सब कुछ विद्यमान है। मूलत: कौरव-पाण्डव चन्द्रवंशी राजाओं, उनके पूर्वजों और इनके वंशजों का चरित्र चित्रण है। इसमें महाभारत काल की सभी संगतियों-विसंगतियों को अत्यन्त रोचक रूप में प्रस्तुत किया गया है। जयगाथा महाकाव्य की रचना करते समय मैंने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि कोई भी प्रसंग और मूल कथा किसी रू प में प्रभावित न हो।

वह रचना जो आपके मन को गुदगुदाती है...
विश्व का संभवत: सबसे बडा प्रणय-पत्र मैंने दस हजार दोहों में अपनी काल्पनिक प्रेयसी के नाम लिखा है। इसमें मेघदूत, गीता, प्रेम के सारे पक्ष और प्रसंग, प्रेम का उद्भव और विकास, प्रेम की व्यापकता, प्रेम के साधन, प्रेम के उपकरण, प्रेम की महिमा-गरिमा सहित अनेक संदर्भ मेरी प्रेयसी को समर्पित हैं।

रचनाकर्म को लेकर आपका नजरिया
रचनाकर्म प्रमुखत: तीन रू पों में होता है- सायास, अनायास और अवतरण। उदाहरण के लिए दो, चार-छह माह में बहुत प्रयास करने पर गीत का मुखडा लिख लिया। आठ-पन्द्रह दिन बाद उसके अंतरे लिख लिए। उनको जोड दिया और हो गया गीत तैयार। रचना धर्म की यह 'सायस' प्रक्रिया हुई। इसकी दूसरी प्रक्रिया है, 'अनायास रचना।' इसे ऎसे समझिए, आप बैठे हैं। किसी एक विषय विशेष पर आपके भाव जाग्रत हुए, वैचारिक मंथन हुआ, छंदों में विचार अपने आप बंध गए और वे पृष्ठ पर गीत या कविता के रू प में अंकित हो गए। यह है अनायास रचना प्रक्रिया। तीसरा रू प है रचना का सीधा-सीधा अवतरण।

उदाहरण के लिए एक-एक दिन, तीन-तीन मिनट में इक्कीस-इक्कीस रचनाओं का सृजन। वह भी स्तरीय, मानक पर खरी उतरने वाली, संप्रेषण में शीर्षस्थ, रस-भार छंदालंकारादि की दृष्टि से विशिष्ट भी। यह हुआ 'अवतरण।' मैंने प्रत्यक्षत: अनुभव किया है कि हमेशा कविता के चिंतन में मग्न भी हैं और किसी भी समय किसी भी विषय पर कविता रच सकते हैं। यानी रचना धर्मिता का अवतरण। ऎसी विलक्षण प्रतिभा प्राय: अन्य कवियों में दिखाई नहीं देती। इसलिए मौलिकता का अभाव देखने में आ रहा है।

श्रीमद्भगवत् गीता पर आधारित श्लोकों के पद्यानुवाद ने आपको लोकप्रिय बनाया...!
हिंदी में श्रीमद्भगवत् गीता के अनुवाद में मैने गीता को मौलिक और मूलत: ज्यों का त्यों रचने की कोशिश की है। ग्यारह सौ से अधिक दोहे रचने के पीछे यह भावना रही कि जन सामान्य गीता से जुडे।

श्रीमद्भगवत् गीता के किन तžवों ने आपको प्रभावित किया
ईश्वर का ईश्वरत्व और उस तक पहुंचने के जो जो साधन हैं, उन्होंने मुझे आकर्षित किया। ज्ञानयोग, कर्म योग और भक्ति योगों में सर्वाधिक कर्मयोग ने मुझे प्रभावित किया, क्योंकि बिना कर्म के शरीर और जीवन यात्रा संभव नहीं है।

कालिदास का भारतीय साहित्य और आपकी लेखनी में अनुपम स्थान है। कालिदास समग्र प्रकाशन प्रक्रिया के अंतिम चरण में चल रहा है...!
'कालिदास समग्र' में कालिदास की सातों संस्कृत रचनाओं को क्रमबद्ध रूप में हिन्दी में अनूदित किया गया है। विश्वकवि कालिदास भारतीय संस्कृति और साहित्य के एक मात्र ऎसे उन्नायक रचनाधर्मी हैं जिनकी सभी रचनाओं में भारत की तत्कालीन छवि, समाज, परम्पराएं उपलब्ध हैं। मेघदूत का पूर्व मेघ, रघुवंशम् का चतुर्थ सर्ग और अन्यत्र भी कालिदास ने भारत के अनेक क्षेत्रों, नगरों, गांवों विशेषकर उज्जयिनी (उज्जैन) का अलौकिक वर्णन किया है। इन वर्णनों से प्रतीत होता है कि कालिदास ने सारे भारत का भ्रमण किया और अपनी अलौकिक कल्पनाशीलता के माध्यम से समग्र भारत को शब्दों-छंदों में चित्रित किया। इसीलिए मेरी कालिदास समग्र के माध्यम से भारतीय साहित्य और संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने की इच्छा है।

कालीदास से आप प्रेरित रहे हैं
बचपन से ही कविता से मेरा लगाव है। मैं काव्य में श्ृंगार रस को ही प्रमुख रस मानता हूं। दस-बारह साल का था तब से कविता लिख रहा हूं। 1960-61 में 'कवि कालिदास' फिल्म आई थी। मां फिल्म देखकर आई और बोलीं कवि हो तो कालिदास जैसा। मां का यह वाक्य मेरे जीवन का प्रेरणा स्रोत बना। गिरधर कविराय की कुंडलियां पढता था। कबीर ने मुझे बहुत प्रभावित किया। मेरे जीवन आदर्श जगद्गुरू कृष्ण और रचना आराध्य कवि कालिदास रहे हैं।

आपके रचना कर्म के सर्वश्रेष्ठ पांच दोहे-
सखियों से आकाश में चिढकर बोली चील।
मनुज स्वार्थवश नगर की सूखी सुन्दर झील।।
सुखी लोग जब अनमने देख घटा घनघोर।
तो विरही कितना विकल अगर दूर चितचोर।।
उभानयन से प्रेम के मोती झरे अनेक।
अनुपम वीर 'कुमार' का उनसे ही अभिषेक।।
पल-पल ढमढम बज रहा, साक्षरता का ढोल।
पर हमको मालूम है, इसकी सारी पोल।
प्रेम प्रेम ही वस्तुत: अति-अद्भुत यह प्रेम।
प्रेम बिना सम्भव नहीं, सकल विश्व का क्षेम।।

प्रमुख रचनाएं
ढाई से तीन लाख दोहों में महाभारत पर केन्द्रित रचना 'जय गाथा', 'गीता चिन्तन' राम गाथा महाकाव्य (चार खंड), मेघदूत-गीता का दोहानुवाद, गुरू चालीसा, गणेश चालीसा, 'शक्ति गाथा', मालवी में 'तिरभिन्नाट' प्रतिनिधि काव्य, श्रीमद्भागवत् महापुराण के 42 हजार से अघिक दोहे, शीघ्र प्रकाशित - मेघदूतम्, ऋतुसंहार, कुमारसम्भवम्, रघुवंशम्, मालविकाग्नि मित्रम्, विक्रमोवशीयम् और अभिज्ञान शाकुन्तलम् का दोहा अनुवाद और 'कालिदास समग्र'।

 डॉ. सुनील सक्सेना
Comments
An amazing text on treasureful Indian culture,not only highlights ilk oasis character of the writer, ...
27 जनवरी 2010, 10:54 hrs IST , by Anupam Pandey from New Delhi
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