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शनिवार, 13 मार्च, 2010
शिक्षा और प्रलय के बीच एक रेस
24 जनवरी 2010, 12:11 hrs IST
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अपनी मेगा बेस्टसेलर 'थ्री कप्स ऑफ टी' (अब तक 30 लाख प्रतियां बिक चुकी हैं) में ग्रेग मॉर्टेसन ने पाकिस्तान के दुर्गम इलाकों में लडकियों के लिए स्कूल बनाने के अपने प्रयासों का मार्मिक वृत्तांत दिया था। उसी किताब की अगली कडी है 'स्टोंस इनटू स्कूल्स : प्रोमोटिंग पीस विद बुक्स, नोट बॉम्ब्स, इन अफगानिस्तान एण्ड पाकिस्तान।' इस किताब में ग्रेग ने अफगानिस्तान में अपने स्त्री साक्षरता के प्रयासों का प्रेरक वृत्तांत प्रस्तुत किया है। ग्रेग मॉर्टेसन पिछले 16 बरसों से अपने एक गैर-लाभकारी संगठन सेंट्रल एशिया इंस्टीट्यूट के माध्यम से पाकिस्तान और अफगानिस्तान के दुर्गम इलाकों में 130 से ज्यादा स्कूल स्थापित कर अपनी तरह से शांति स्थापना के प्रयास में जुटे हैं। इन स्कूलों में से ज्यादातर लडकियों के लिए हैं।

ग्रेग की पिछली किताब 'थ्री कप्स ऑफ टी' की बुनियाद पाकिस्तान में एक स्कूल खोलने का  वादा थी, तो इस किताब के मूल में भी वैसा ही एक वादा है। 1999 में अफगानिस्तान के वाखन दर्रे से ए.के. 47 सज्जित चौदह  किरगिज घुडसवार पाकिस्तान आते  हैं और ग्रेग से वादा लेते हैं कि वह पामीर की पहाडियों के एक दुर्गम स्थल बोजाई गुंबद में एक स्कूल बनाएंगे। इसी स्कूल को बनाने की कहानी है यह किताब। ग्रेग को इस स्कूल को बनाने के प्रयास में कई और स्कूल भी बनाने पडे। एक बिलकुल नए देश अफगानिस्तान के सुदूर उत्तर पूर्वी एकांत इलाकों में, वाखन दर्रे में किस तरह ग्रेग और उनके निडर  मैनेजर के अथक प्रयासों से पहला स्कूल बन सका और फिर दर्जनों और स्कूल बने। यह वृत्तांत जितना रोचक है उतना ही प्रेरणास्पद भी।

एक जगह ग्रेग लिखते हैं, 'हम लोग अफगानिस्तान के हर गांव और कस्बे में जहां बच्चे शिक्षा के लिए तरसते हैं और मां-बाप ऎसे स्कूलों के निर्माण का सपना देखते हैं जिनके दरवाजे न सिर्फ उनके बेटों, बल्कि बेटियों के लिए भी खुले होंगे, आशा की एक किरण जगा सके थे। इन जगहों में वे जगहें भी खासतौर पर शामिल थीं जो कलाश्निकोव धारी ऎसे मदोंü के घेरे में हैं जिनकी पूरी ताकत इस झूठ को जिंदा रखने में खर्च होती है कि कुरआन शरीफ में यह सीख दी गई है कि जो लडकी गणित पढना चाहे उसके चेहरे पर तेजाब फेंक देना चाहिए।' ग्रेग अपने प्रयासों के लिए अमरीकी सैन्य सेवा से भी आर्थिक सहायता प्राप्त करते हैं। सैनिक लोग निजीतौर पर भी उन्हें आर्थिक मदद देते हैं और उनके कुछ प्रोजेक्ट्स के लिए सामग्री लाने-ले जाने में भी सहायता करते हैं, लेकिन वे अमरीकी सैन्य नीतियों के प्रतिकूल टिप्पणियां करने से भी कोई परहेज नहीं करते। एक टॉमहॉक क्रूज मिसाइल की लगभग साढे आठ लाख डॉलर की भारी कीमत पर अफसोस करते हुए कहते हैं, 'इतनी बडी धनराशि से तो आप दर्जनों ऎसे स्कूल बना सकते हैं, जो हजारों विद्यार्थियों को पीढियों के लिए एक संतुलित, गैर अतिवादी शिक्षा प्रदान करेगी और यह कहने के बाद वे मानो अपनी ही सरकार के सामने एक सवाल रखते हैं, 'आपके विचार में इनमें से किस से हम अधिक सुरक्षित महसूस करेंगे।' लेकिन उनका असली संबल तो स्थानीय लोग ही हैं। पूर्व कमांडो सरफराज खान ऎसे ही लोगों में से एक हैं, जो अब ग्रेग के संगठन के प्रोजेक्ट डाइरेक्टर  हैं। तालिबानों ने उनके कई स्कूलों को नुकसान भी पहुंचाया, लेकिन इन स्थानीय लोगों से जो सहयोग ग्रेग को मिला उसी के आधार पर वे यह कह सके हैं कि वे ही लोग तालिबान को कुचल कर लडकियों की शिक्षा के विरूद्ध प्रचलित सांस्कृतिक सोच में बदलाव ला सकते हैं।

ग्रेग मॉर्टेसन तंजानिया में अपने बचपन में एक अफ्रीकी कहावत सुनते रहे हैं कि अगर आप एक लडके को शिक्षित करते हैं, तो आप महज एक व्यक्ति को ही शिक्षित करते हैं, लेकिन अगर आप एक लडकी को शिक्षित करते हैं तो आप पूरे समुदाय को शिक्षित करते हैं। ग्रेग ने बाद में पाया कि  बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। उन्होंने जाना कि विश्व बैंक के आंकडों के अनुसार शिक्षा बाद की जिंदगी में एक औरत की आय को 10 से 20 प्रतिशत तक बढा देती है। कुछ दूसरे अध्ययनों से यह भी पता चला कि अगर लडकी पांचवीं तक भी पढ लेती है, तो शिशु मृत्यु दर काफी घट जाती है, लेकिन इसी के साथ ग्रेग मॉर्टेसन ने यह भी पाया कि लडकियों को प्राथमिक शिक्षा दे देना ही पर्याप्त नहीं है। विकासशील देशों में ऎसी ग्रामीण çस्त्रयों के लिए करीब-करीब कोई काम सुलभ नहीं है। उन्हें कोई अर्थपूर्ण रोजगार मिले, जैसे वे अध्यापिकाएं, डॉक्टर, नर्स वगैरह बन सकें, इसके लिए जरूरी है कि उन्हें उच्च शिक्षा मिले। अपनी बात के प्रमाण के तौर पर वे 22 वर्षीया शकीला का उदाहरण देते हैं, जो उनके यहां की प्रथम स्नातिका और तीन लाख की आबादी वाले इलाके की पहली महिला चिकित्सक होगी।

यह सारा काम करते हुए खुद ग्रेग ने काफी कुछ सीखा। उन्होंने पाया कि महज किताबी शिक्षा ही काफी नहीं है। खुद उनकी बेटी ने उन्हें यह पाठ पढाया कि बच्चों के लिए खेल भी जरूरी है। शायद इसी सीख का परिणाम यह रहा कि ग्रेग ने लडकियों के कूदने के लिए सात हजार रस्सियां मंगवाईं और स्कूलों में खेल के मैदान भी बनवाए।

ग्रेग ने एक जगह एच जी वेल्स को उद्धृत किया है,'इतिहास शिक्षा और प्रलय के बीच एक रेस है।' खुद ग्रेग ने किताब में एक जगह बहुत खूबसूरत और महžपूर्ण बात कही है - बस, एक बार दिल के दरवाजे खुल जाएं और वह पढना सीख ले, फिर तो पेड की हर पत्ती किताब का एक पन्ना बन जाती है।

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल
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